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प्रदोष व्रत सितंबर 2026: 8 सितंबर को भौम प्रदोष, जानें पूजा मुहूर्त
Digital Desk
सितंबर 2026 का पहला प्रदोष व्रत 8 सितंबर को रखा जाएगा। जानें भौम प्रदोष की तिथि, उज्जैन पूजा मुहूर्त, व्रत विधि, महत्व और अगले प्रदोष की तारीख।
सितंबर 2026 का पहला प्रदोष व्रत मंगलवार, 8 सितंबर को रखा जाएगा। यह व्रत भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को पड़ रहा है। मंगलवार को आने वाले प्रदोष व्रत को भौम प्रदोष कहा जाता है। यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है।
प्रदोष व्रत हर चंद्र मास में दो बार आता है। एक बार शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी और दूसरी बार कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को यह व्रत रखा जाता है। सितंबर में दूसरा प्रदोष व्रत 24 सितंबर 2026 को होगा।
8 सितंबर को भौम प्रदोष
भाद्रपद कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 8 सितंबर को दोपहर 2:43 बजे शुरू होगी और 9 सितंबर को दोपहर 12:31 बजे समाप्त होगी। तिथि के अनुसार 8 सितंबर को प्रदोष व्रत रखा जाएगा।
प्रदोष काल सूर्यास्त के आसपास का समय होता है। भगवान शिव की पूजा के लिए इस अवधि को विशेष महत्व दिया जाता है। भक्त इस दौरान शिवलिंग का अभिषेक कर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करते हैं।
प्रदोष पूजा का शुभ समय
उज्जैन के अनुसार 8 सितंबर को प्रदोष पूजा का समय शाम 6:34 बजे से रात 8:54 बजे तक रहेगा।
इस दिन सूर्योदय सुबह 6:15 बजे और सूर्यास्त शाम 6:34 बजे होगा। प्रदोष काल स्थानीय सूर्यास्त पर निर्भर करता है, इसलिए अलग-अलग शहरों में पूजा का समय बदल सकता है।
श्रद्धालुओं को अपने शहर के स्थानीय पंचांग के अनुसार प्रदोष काल निर्धारित करना चाहिए।
प्रदोष व्रत की तिथि और समय
उज्जैन के आधार पर 8 सितंबर के प्रमुख समय इस प्रकार हैं:
| विवरण | समय |
|---|---|
| त्रयोदशी तिथि प्रारंभ | 8 सितंबर, दोपहर 2:43 बजे |
| त्रयोदशी तिथि समाप्त | 9 सितंबर, दोपहर 12:31 बजे |
| प्रदोष पूजा मुहूर्त | 8 सितंबर, शाम 6:34 से रात 8:54 बजे तक |
| सूर्योदय | सुबह 6:15 बजे |
| सूर्यास्त | शाम 6:34 बजे |
| स्थान | उज्जैन, मध्य प्रदेश |
अन्य शहरों में सूर्योदय, सूर्यास्त और प्रदोष काल अलग होने के कारण पूजा के समय में भी अंतर हो सकता है।
ऐसे करें प्रदोष व्रत पूजा
प्रदोष व्रत रखने वाले भक्त सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लेते हैं। व्रत की विधि परिवार और क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है। कुछ भक्त पूरे दिन उपवास रखते हैं, जबकि कुछ शाम की पूजा तक व्रत रखते हैं।
शाम को प्रदोष काल शुरू होने से पहले स्नान करके पूजा स्थल तैयार किया जाता है। भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश, भगवान कार्तिकेय और नंदी की पूजा की जाती है।
शिवलिंग का जल, दूध, दही और घी आदि से अभिषेक किया जाता है। इसके बाद बेलपत्र, फूल, फल, धूप और दीप अर्पित किए जाते हैं। भक्त महामृत्युंजय मंत्र का जाप और प्रदोष व्रत कथा का पाठ या श्रवण भी कर सकते हैं।
क्यों रखा जाता है प्रदोष व्रत
प्रदोष व्रत भगवान शिव की उपासना के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक परंपराओं में सूर्यास्त के आसपास के प्रदोष काल को शिव पूजा के लिए विशेष शुभ समय माना गया है।
भक्त इस व्रत को शांति, आध्यात्मिक कल्याण, सुख-समृद्धि और मनोकामना पूर्ति की कामना से रखते हैं। व्रत से जुड़े धार्मिक महत्व और मान्यताएं अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में भिन्न हो सकती हैं।
मंगलवार को क्यों है खास
सप्ताह के जिस दिन त्रयोदशी तिथि पड़ती है, उसी के आधार पर प्रदोष व्रत का नाम निर्धारित किया जाता है। सोमवार को आने वाला प्रदोष सोम प्रदोष, मंगलवार का भौम प्रदोष, गुरुवार का गुरु प्रदोष, शुक्रवार का भृगु प्रदोष और शनिवार का शनि प्रदोष कहलाता है।
8 सितंबर 2026 को प्रदोष व्रत मंगलवार को पड़ रहा है। इसलिए इसे भौम प्रदोष व्रत कहा जाएगा।
सितंबर में दूसरा प्रदोष
सितंबर 2026 में पहला प्रदोष व्रत 8 सितंबर को होगा। इसके बाद दूसरा प्रदोष व्रत 24 सितंबर 2026 को रखा जाएगा।
दोनों व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को संबंधित त्रयोदशी तिथि और अपने शहर के प्रदोष काल की जानकारी पहले से देख लेनी चाहिए। खासकर पूजा का मुख्य समय स्थानीय सूर्यास्त के आधार पर निर्धारित होता है।
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