रोहिणी व्रत के दिन पूजा के समय जरूर पढ़ें ये कथा, जीवन में दूर होंगी बाधाएं!

Dharm Desk

जैन धर्म में रोहिणी व्रत को बहुत विशेष और पावन माना गया है. इस व्रत को महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और घर की शुख शांति के लिए करती हैं. इस दिन पूजा के समय कथा भी अवश्य सुननी या पढ़नी चाहिए. इससे जीवन की सारी बाधाएं दूर हो जाती हैं.

रोहिणी व्रत जैन समुदाय के लोगों के लिए बहुत महत्व रखता है. रोहिणी व्रत महिलाएं और पुरुष दोनों ही रख सकते हैं. ये व्रत हर माह में पड़ता है. महीने में जिस दिन रोहणी नक्षत्र पड़ता है. जैन समुदाय के लोग उसी दिन ये व्रत रखते हैं. जैन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को रखने से व्यक्ति कर्म बंधन से मुक्त हो जाता है. रोहिणी व्रत महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुख-शांति के लिए रखती हैं. रोहिणी व्रत का संबध माता रोहिणी से बताया गया है. मान्यता है कि इस दिन पूजा करने के साथ ही व्रत कथा पढ़ने और सुनने से जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं.

आज है रोहिणी व्रत

पंचांग के मुताबिक, रोहिणी व्रत आज यानी बुधवार 6 मार्च को है. इस व्रत को लगातार 3, 5 या फिर 7 सालों तक किया जा सकता है. फिर इसके बाद रोहिणी व्रत का उद्यापन कर दिया जाता है.

रोहिणी व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में चंपापुरी नाम का एक राज्य था. इस राज्य में राजा माधवा और रानी लक्ष्मीपति शासन किया करते थे. उन दोनों के सात पुत्र और एक पुत्री थी. एक बार राजा ने बेटी रोहिणी के जीवन के बारे में ज्योतिषी से पूछा. इस पर ज्योतिषी ने हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक के साथ रोहीणी के विवाह होने की बात राजा को बताई. फिर राजा ने स्वयंवर आयोजित कराकर रोहिणी-अशोक का विवाह करा दिया. बाद में रोहिणी-अशोक राजा रानी बने.

एक समय पर हस्तिनापुर के वन में श्री चारण मुनिराज पहुंचे. राजा अशोक को उनके पहुंचने का पता चला तो वो भी वन में पहुंचे और श्री चारण मुनिराज धर्मोपदेश ग्रहण किया. बाद में राजा अशोक ने पूछा कि उनकी रानी शांतचित्त क्यों हैं. तब श्री चारण मुनिराज ने राजा को बताया कि इसी नगर में एक समय में वस्तुपाल नाम का राजा था. उसका एक धनमित्र नाम का मित्र था. धनमित्र के यहां दुर्गंधा नाम की कन्या का जन्म हुआ. धनमित्र पुत्री के विवाह को लेकर परेशान रहा करता था. बाद में उसने धन का लालच देकर वस्तुपाल के बेटे श्रीषेण से दुर्गंधा का विवाह कर दिया. हालांकि दुर्गंधा की दुर्गंध से परेशान होकर एक माह में ही श्रीषेण कहीं चला गया.

श्री चारण मुनिराज ने बताया कि इसी दौरान अमृतसेन मुनि वहां पहुंचे. धनमित्र और दुर्गंधा उनके दर्शन के लिए गए. धनमित्र ने अमृतसेन मुनिराज से दुर्गंधा के भविष्य के विषय में जानना चाहा. इस पर उन्होंने बताया कि गिरनार पर्वत के पास एक नगर था. वहां भूपाल नाम का राजा का शासन था. राजा की सिंधुमती नाम की रानी थी. एक दिन राजा रानी वन जा रहे थे, तभी राजा ने मुनिराज को देखा तो रानी से कहा कि वो घर जाकर आहार की व्यवस्था करे. इस पर रानी को गुस्सा आया.

अमृतसेन मुनिराज ने बताया कि रानी ने गुस्से में घर जाकर मुनिराज के लिए कड़वी तुम्बी का आहार तैयार कराया. इससे मुनिराज को बहुत कष्ट हुआ. यहां तक की उनकी मृत्यु हो गई. जब इस बात की खबर राजा को हुई तो उन्होंने रानी को महल से निकाल दिया. रानी ने पाप किया था. उसकी वजह वो कोढ़ से पीड़ित हो गई. अंत में उसकी मृत्यु हो गई और नर्क में स्थान मिला. नर्क में यातनाएं भोगने के बाद उसे पहले पशु योनि में जन्म मिला और बाद उसी ने तुम्हारे घर दुर्गंधा नाम की कन्या के रूप में जन्म लिया.

इस पर धनमित्र ने अमृतसेन मुनिराज से ऐसे व्रत के बारे जानना चाहा, जिससे उसकी पुत्री का पाप कटे. इस पर मुनि अमृतसेन ने उन्हें रोहिणी व्रत का महत्व और विधि बताई. दुर्गंधा विधि-पूर्वक रोहिणी व्रत रखा, जिससे संन्यास और मृत्यु के बाद उसे स्वर्ग में स्थान मिला. वहां से तुम्हारी रानी बनी. इसके बाद राजा अशोक ने अपनी कहानी के बारे में पूछा. श्री चारण मुनिराज ने बताया कि भील के जन्म में तुमने भी मुनिराज को कष्ट दिए थे. इसकी वजह से तुमने भी मृत्यु के बाद नर्क की यातनाएं भोगीं. फिर कई योनियों में भ्रमण करते हुए व्यापारी के घर जन्म लिया. इसके बाद मुनिराज के बताने पर रोहिणी व्रत किया और अगले जन्म में राजा बने. इस तरह राजा, रानी ने रोहिणी व्रत के प्रभाव से मोक्ष को प्राप्त किया.

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06 Mar 2025 By दैनिक जागरण

रोहिणी व्रत के दिन पूजा के समय जरूर पढ़ें ये कथा, जीवन में दूर होंगी बाधाएं!

Dharm Desk

रोहिणी व्रत जैन समुदाय के लोगों के लिए बहुत महत्व रखता है. रोहिणी व्रत महिलाएं और पुरुष दोनों ही रख सकते हैं. ये व्रत हर माह में पड़ता है. महीने में जिस दिन रोहणी नक्षत्र पड़ता है. जैन समुदाय के लोग उसी दिन ये व्रत रखते हैं. जैन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को रखने से व्यक्ति कर्म बंधन से मुक्त हो जाता है. रोहिणी व्रत महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुख-शांति के लिए रखती हैं. रोहिणी व्रत का संबध माता रोहिणी से बताया गया है. मान्यता है कि इस दिन पूजा करने के साथ ही व्रत कथा पढ़ने और सुनने से जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं.

आज है रोहिणी व्रत

पंचांग के मुताबिक, रोहिणी व्रत आज यानी बुधवार 6 मार्च को है. इस व्रत को लगातार 3, 5 या फिर 7 सालों तक किया जा सकता है. फिर इसके बाद रोहिणी व्रत का उद्यापन कर दिया जाता है.

रोहिणी व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में चंपापुरी नाम का एक राज्य था. इस राज्य में राजा माधवा और रानी लक्ष्मीपति शासन किया करते थे. उन दोनों के सात पुत्र और एक पुत्री थी. एक बार राजा ने बेटी रोहिणी के जीवन के बारे में ज्योतिषी से पूछा. इस पर ज्योतिषी ने हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक के साथ रोहीणी के विवाह होने की बात राजा को बताई. फिर राजा ने स्वयंवर आयोजित कराकर रोहिणी-अशोक का विवाह करा दिया. बाद में रोहिणी-अशोक राजा रानी बने.

एक समय पर हस्तिनापुर के वन में श्री चारण मुनिराज पहुंचे. राजा अशोक को उनके पहुंचने का पता चला तो वो भी वन में पहुंचे और श्री चारण मुनिराज धर्मोपदेश ग्रहण किया. बाद में राजा अशोक ने पूछा कि उनकी रानी शांतचित्त क्यों हैं. तब श्री चारण मुनिराज ने राजा को बताया कि इसी नगर में एक समय में वस्तुपाल नाम का राजा था. उसका एक धनमित्र नाम का मित्र था. धनमित्र के यहां दुर्गंधा नाम की कन्या का जन्म हुआ. धनमित्र पुत्री के विवाह को लेकर परेशान रहा करता था. बाद में उसने धन का लालच देकर वस्तुपाल के बेटे श्रीषेण से दुर्गंधा का विवाह कर दिया. हालांकि दुर्गंधा की दुर्गंध से परेशान होकर एक माह में ही श्रीषेण कहीं चला गया.

श्री चारण मुनिराज ने बताया कि इसी दौरान अमृतसेन मुनि वहां पहुंचे. धनमित्र और दुर्गंधा उनके दर्शन के लिए गए. धनमित्र ने अमृतसेन मुनिराज से दुर्गंधा के भविष्य के विषय में जानना चाहा. इस पर उन्होंने बताया कि गिरनार पर्वत के पास एक नगर था. वहां भूपाल नाम का राजा का शासन था. राजा की सिंधुमती नाम की रानी थी. एक दिन राजा रानी वन जा रहे थे, तभी राजा ने मुनिराज को देखा तो रानी से कहा कि वो घर जाकर आहार की व्यवस्था करे. इस पर रानी को गुस्सा आया.

अमृतसेन मुनिराज ने बताया कि रानी ने गुस्से में घर जाकर मुनिराज के लिए कड़वी तुम्बी का आहार तैयार कराया. इससे मुनिराज को बहुत कष्ट हुआ. यहां तक की उनकी मृत्यु हो गई. जब इस बात की खबर राजा को हुई तो उन्होंने रानी को महल से निकाल दिया. रानी ने पाप किया था. उसकी वजह वो कोढ़ से पीड़ित हो गई. अंत में उसकी मृत्यु हो गई और नर्क में स्थान मिला. नर्क में यातनाएं भोगने के बाद उसे पहले पशु योनि में जन्म मिला और बाद उसी ने तुम्हारे घर दुर्गंधा नाम की कन्या के रूप में जन्म लिया.

इस पर धनमित्र ने अमृतसेन मुनिराज से ऐसे व्रत के बारे जानना चाहा, जिससे उसकी पुत्री का पाप कटे. इस पर मुनि अमृतसेन ने उन्हें रोहिणी व्रत का महत्व और विधि बताई. दुर्गंधा विधि-पूर्वक रोहिणी व्रत रखा, जिससे संन्यास और मृत्यु के बाद उसे स्वर्ग में स्थान मिला. वहां से तुम्हारी रानी बनी. इसके बाद राजा अशोक ने अपनी कहानी के बारे में पूछा. श्री चारण मुनिराज ने बताया कि भील के जन्म में तुमने भी मुनिराज को कष्ट दिए थे. इसकी वजह से तुमने भी मृत्यु के बाद नर्क की यातनाएं भोगीं. फिर कई योनियों में भ्रमण करते हुए व्यापारी के घर जन्म लिया. इसके बाद मुनिराज के बताने पर रोहिणी व्रत किया और अगले जन्म में राजा बने. इस तरह राजा, रानी ने रोहिणी व्रत के प्रभाव से मोक्ष को प्राप्त किया.

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