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Satua Sankranti 2026: बिहार में क्यों मनती है सतुआ संक्रांति, जानें क्या करें दान
धर्म डेस्क
सतुआ संक्रांति 2026 पर जानें मेष संक्रांति का महत्व, सत्तू दान की परंपरा और बैसाखी पर क्यों मनाई जाती है सतुआनी।
Satua Sankranti 2026: साल 2026 में सतुआ संक्रांति का पर्व 14 अप्रैल, मंगलवार को मनाया जाएगा। इस दिन सूर्य देव सुबह 9 बजकर 31 मिनट पर मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करेंगे। इसी खगोलीय परिवर्तन को मेष संक्रांति कहा जाता है। कई क्षेत्रों में इसे नए वर्ष की शुरुआत के रूप में भी देखा जाता है। इस दिन से खरमास समाप्त हो जाता है और शुभ तथा मांगलिक कार्यों की फिर से शुरुआत हो जाती है।
बिहार में क्यों मनाई जाती है सतुआनी
सतुआ संक्रांति को खासतौर पर बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। स्थानीय भाषा में इसे सतुआनी भी कहा जाता है। यह पर्व मौसम के बदलाव और गर्मी की शुरुआत का संकेत देता है। इसी कारण इस दिन सत्तू जैसे ठंडक देने वाले खाद्य पदार्थों का सेवन किया जाता है, ताकि शरीर को गर्मी से राहत मिल सके।
मेष संक्रांति का ज्योतिषीय महत्व
ज्योतिष के अनुसार सूर्य का मेष राशि में प्रवेश अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। सूर्य को आत्मा, ऊर्जा और तेज का प्रतीक माना जाता है, जबकि मेष राशि के स्वामी मंगल हैं, जो साहस और ऊर्जा के कारक हैं। जब सूर्य इस राशि में प्रवेश करते हैं तो उनकी शक्ति और प्रभाव बढ़ जाता है। इसका असर प्रकृति और मौसम दोनों पर दिखाई देता है, जिससे गर्मी का प्रभाव तेज हो जाता है।
सतुआनी पर सत्तू का महत्व
इस पर्व का मुख्य आकर्षण सत्तू होता है, जिसे चने या जौ से तैयार किया जाता है। यह शरीर को ठंडा रखने के साथ-साथ पोषण भी देता है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग सत्तू को पानी, गुड़ और नमक के साथ मिलाकर खाते हैं। इसे स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है।
सतुआ संक्रांति पर दान का महत्व
इस दिन दान करने की परंपरा बहुत प्राचीन है। मान्यता है कि इस दिन सत्तू, गुड़, कच्चे आम और मिट्टी के घड़े का दान करना शुभ फल देता है। घड़ा दान करने से पितरों की तृप्ति होती है और उन्हें परलोक में जल की कमी नहीं होती। घड़े को ढककर उसके ऊपर सत्तू, गुड़ और दक्षिणा रखकर दान करने की परंपरा है। यदि कोई व्यक्ति इस दिन दान नहीं कर पाता है, तो वह अक्षय तृतीया के दिन भी दान कर सकता है।
सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
सतुआ संक्रांति केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि सामाजिक रूप से भी महत्वपूर्ण पर्व है। यह लोगों को प्रकृति के अनुरूप जीवन जीने और मौसम के बदलाव के साथ खुद को ढालने की सीख देता है। साथ ही, दान और सेवा की भावना को बढ़ावा देता है।
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Satua Sankranti 2026: बिहार में क्यों मनती है सतुआ संक्रांति, जानें क्या करें दान
धर्म डेस्क
Satua Sankranti 2026: साल 2026 में सतुआ संक्रांति का पर्व 14 अप्रैल, मंगलवार को मनाया जाएगा। इस दिन सूर्य देव सुबह 9 बजकर 31 मिनट पर मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करेंगे। इसी खगोलीय परिवर्तन को मेष संक्रांति कहा जाता है। कई क्षेत्रों में इसे नए वर्ष की शुरुआत के रूप में भी देखा जाता है। इस दिन से खरमास समाप्त हो जाता है और शुभ तथा मांगलिक कार्यों की फिर से शुरुआत हो जाती है।
बिहार में क्यों मनाई जाती है सतुआनी
सतुआ संक्रांति को खासतौर पर बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। स्थानीय भाषा में इसे सतुआनी भी कहा जाता है। यह पर्व मौसम के बदलाव और गर्मी की शुरुआत का संकेत देता है। इसी कारण इस दिन सत्तू जैसे ठंडक देने वाले खाद्य पदार्थों का सेवन किया जाता है, ताकि शरीर को गर्मी से राहत मिल सके।
मेष संक्रांति का ज्योतिषीय महत्व
ज्योतिष के अनुसार सूर्य का मेष राशि में प्रवेश अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। सूर्य को आत्मा, ऊर्जा और तेज का प्रतीक माना जाता है, जबकि मेष राशि के स्वामी मंगल हैं, जो साहस और ऊर्जा के कारक हैं। जब सूर्य इस राशि में प्रवेश करते हैं तो उनकी शक्ति और प्रभाव बढ़ जाता है। इसका असर प्रकृति और मौसम दोनों पर दिखाई देता है, जिससे गर्मी का प्रभाव तेज हो जाता है।
सतुआनी पर सत्तू का महत्व
इस पर्व का मुख्य आकर्षण सत्तू होता है, जिसे चने या जौ से तैयार किया जाता है। यह शरीर को ठंडा रखने के साथ-साथ पोषण भी देता है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग सत्तू को पानी, गुड़ और नमक के साथ मिलाकर खाते हैं। इसे स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है।
सतुआ संक्रांति पर दान का महत्व
इस दिन दान करने की परंपरा बहुत प्राचीन है। मान्यता है कि इस दिन सत्तू, गुड़, कच्चे आम और मिट्टी के घड़े का दान करना शुभ फल देता है। घड़ा दान करने से पितरों की तृप्ति होती है और उन्हें परलोक में जल की कमी नहीं होती। घड़े को ढककर उसके ऊपर सत्तू, गुड़ और दक्षिणा रखकर दान करने की परंपरा है। यदि कोई व्यक्ति इस दिन दान नहीं कर पाता है, तो वह अक्षय तृतीया के दिन भी दान कर सकता है।
सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
सतुआ संक्रांति केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि सामाजिक रूप से भी महत्वपूर्ण पर्व है। यह लोगों को प्रकृति के अनुरूप जीवन जीने और मौसम के बदलाव के साथ खुद को ढालने की सीख देता है। साथ ही, दान और सेवा की भावना को बढ़ावा देता है।
