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उज्जैन का अनोखा शक्तिपीठ हरसिद्धि
अशोक त्रिपाठी, संजय शुक्ल
यहां राजा विक्रमादित्य हर 12वें वर्ष में अपना सिर काटकर देवी को अर्पित करते थे
मध्य प्रदेश के उच्जैन में स्थित हरसिद्धि मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। 2000 साल पुराने इस मंदिर की चर्चा पुराणों और देवी भागवत में भी है। जितना खास यह मंदिर है, मंदिर खास परंपराएं इन्हें अन्य देवी मंदिरों से भिन्नता प्रदान करती हैं । माना जाता है कि यहां आने वाले हर भक्त की मनोकामना सिद्ध होती है। हरसिद्धि मंदिर का वास्तु भी भिन्न है, यहां चार प्रवेश द्वार हैं। सभी द्वारों पर सुंदर बंगले बने हुए हैं। मंदिर के दक्षिण-पूर्व कोण में एक बावड़ी है, जिसके अंदर एक स्तंभ है। यहां श्रीयंत्र बना हुआ है। मंदिर के ठीक सामने दो बड़े दीप स्तंभ हैं। नवरात्रि के दौरान नौ दिनों तक इन पर दीप मालाएं अनिवार्यत: लगाई जाती थी।
माना जाता है कि उच्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर भैरव पर्वत पर मां सती के ओठ गिरे थे। हरसिद्धि मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यह जहां स्थित है, वहां सती माता की कोहनी गिरी थी। इसीलिए इस मंदिर को शक्तिपीठों में स्थान प्राप्त है। यही वजह है कि इस स्थान को सिद्धि होने के कारण यहां तांत्रिक पूजा का विशेष महत्व भी है। कई तांत्रिक यहां महाकाल वन में तपस्या करके भी देवी सिद्ध करते देखे जाते हैं, हालांकि कई गुप्त साधनाएं भी यहां होती है।
धार्मिक मान्यताओं के साथ साथ देवी भागवत के अनुसार चंड और मुंड नामक दो दैत्यों ने एक बार कैलाश पर कब्जा करने की योजना बनाई। दोनों जब वहां पहुंचे तब माता पार्वती और भगवान शंकर द्यूत-क्रीड़ा में व्यस्त थे। चंड और मुंड ने अंदर प्रवेश का प्रयास किया, लेकिन द्वार पर ही शिव के नंदीगण ने उन्हें रोक दिया। दोनों दैत्यों ने नंदीगण को शस्त्र से घायल कर दिया। भगवान शिव को जब इस घटना का पता लगा तो उन्होंने चंडी देवी का आह्वान किया। शिव की आज्ञा से देवी ने दोनों दैत्यों का वध कर दिया। इससे प्रसन्न होकर शिवजी ने कहा कि आपने दुष्टों का वध करके आपने शक्ति को सिद्ध किया है इसलिए आप हरसिद्धि नाम से प्रसिद्ध होंगी। तभी से महाकाल वन में हरसिद्धि विराजमान हैं।
हरसिद्धि मंदिर का संबंध राजा विक्रमादित्य से भी माना जाता है। जिस क्षेत्र में मंदिर स्थित है, उसे विक्रमादित्य की तपोभूमि माना जाता है। यहीं मंदिर के ठीक सामने विक्रमादित्य का टीला भी देखने को मिलता है, जहां कहा जाता है राजा विक्रमादित्य का सिंहासन था, जिसका लोप कालांतर में हो गया। मंदिर के ठीक पीछे एक कोने में कुछ सिर रखे हैं, जिन पर सिंदूर लगा हुआ है। कहा जाता है कि ये मुंड राजा विक्रमादित्य के सिर हैं। लोक कथाओं के मुताबिक विक्रमादित्य ने देवी को प्रसन्न करने के लिए हर 12वें वर्ष में अपने सिर की बलि दी थी। उन्होंने 11 बार ऐसा किया, लेकिन हर बार देवी उनका सिर प्रसन्नता से वापस कर देती थीं। जब 12वीं बार उन्होंने सिर की बलि दी तो यह वापस नहीं आया। इसे उनके शासन का अंत माना गया। इसी से राजा विक्रमादित्य की उम्र का निर्धारण भी माना गया, ऐसा कहा जाता है राजा की उम्र लगभग 144 वर्ष की रही होगी।
इस शक्तिपीठ हरसिद्धि मंदिर की परंपराएं भी बेहद खास हैं। यहां बलि नहीं चढ़ाई जाती क्योंकि देवी वैष्णव रूप से प्रतिष्ठित हैं। वे परमारवंशी राजाओं की कुलदेवी हैं। यहां पूजा का विधान भिन्न है, श्रीसूक्त और वेद मंत्रों के साथ पूजा यहां होती है। यहां पर स्तंभ दीप जलाने का सौभाग्य हर किसी को प्राप्त नहीं होता। माना जाता है कि स्तंभ दीप जलाते वक्त बोली गई हर मनोकामना सिद्ध होती है। पहले यहां चैत्र और आश्विन मास की नवरात्र में ही दीप स्तंभ के दीप प्रच्वलित किए जाते थे, लेकिन अब यहां पूरे वर्ष दीप स्तंभ के दीप संध्या काल में प्रच्जवलित किए जाते हैं। इसके लिए मंदिर प्रबंध समिति में बुकिंग की जाती है, जिसमे अधिकांशत: अब श्रद्धालुओं को वेटिंग का भी सामना करना होता है।
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बारहवीं बार सिर चढ़ाने के साथ हुआ था विक्रमादित्य शासन का अंत
उज्जैन के इस शक्तिपीठ मंदिर के ठीक पीछे एक कोने में कुछ सिर रखे हैं, जिन पर सिंदूर लगा हुआ है। कहा जाता है कि ये मुंड राजा विक्रमादित्य के सिर हैं। लोक कथाओं के मुताबिक विक्रमादित्य ने देवी को प्रसन्न करने के लिए हर 12वें वर्ष में अपने सिर की बलि दी थी। उन्होंने 11 बार ऐसा किया, लेकिन हर बार देवी उनका सिर प्रसन्नता से वापस कर देती थीं। जब 12वीं बार उन्होंने सिर की बलि दी तो यह वापस नहीं आया। इसे उनके शासन का अंत माना गया। इसी से राजा विक्रमादित्य की उम्र का निर्धारण भी माना गया, ऐसा कहा जाता है राजा की उम्र लगभग 144 वर्ष की रही होगी।
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उज्जैन का अनोखा शक्तिपीठ हरसिद्धि
अशोक त्रिपाठी, संजय शुक्ल
मध्य प्रदेश के उच्जैन में स्थित हरसिद्धि मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। 2000 साल पुराने इस मंदिर की चर्चा पुराणों और देवी भागवत में भी है। जितना खास यह मंदिर है, मंदिर खास परंपराएं इन्हें अन्य देवी मंदिरों से भिन्नता प्रदान करती हैं । माना जाता है कि यहां आने वाले हर भक्त की मनोकामना सिद्ध होती है। हरसिद्धि मंदिर का वास्तु भी भिन्न है, यहां चार प्रवेश द्वार हैं। सभी द्वारों पर सुंदर बंगले बने हुए हैं। मंदिर के दक्षिण-पूर्व कोण में एक बावड़ी है, जिसके अंदर एक स्तंभ है। यहां श्रीयंत्र बना हुआ है। मंदिर के ठीक सामने दो बड़े दीप स्तंभ हैं। नवरात्रि के दौरान नौ दिनों तक इन पर दीप मालाएं अनिवार्यत: लगाई जाती थी।
माना जाता है कि उच्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर भैरव पर्वत पर मां सती के ओठ गिरे थे। हरसिद्धि मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यह जहां स्थित है, वहां सती माता की कोहनी गिरी थी। इसीलिए इस मंदिर को शक्तिपीठों में स्थान प्राप्त है। यही वजह है कि इस स्थान को सिद्धि होने के कारण यहां तांत्रिक पूजा का विशेष महत्व भी है। कई तांत्रिक यहां महाकाल वन में तपस्या करके भी देवी सिद्ध करते देखे जाते हैं, हालांकि कई गुप्त साधनाएं भी यहां होती है।
धार्मिक मान्यताओं के साथ साथ देवी भागवत के अनुसार चंड और मुंड नामक दो दैत्यों ने एक बार कैलाश पर कब्जा करने की योजना बनाई। दोनों जब वहां पहुंचे तब माता पार्वती और भगवान शंकर द्यूत-क्रीड़ा में व्यस्त थे। चंड और मुंड ने अंदर प्रवेश का प्रयास किया, लेकिन द्वार पर ही शिव के नंदीगण ने उन्हें रोक दिया। दोनों दैत्यों ने नंदीगण को शस्त्र से घायल कर दिया। भगवान शिव को जब इस घटना का पता लगा तो उन्होंने चंडी देवी का आह्वान किया। शिव की आज्ञा से देवी ने दोनों दैत्यों का वध कर दिया। इससे प्रसन्न होकर शिवजी ने कहा कि आपने दुष्टों का वध करके आपने शक्ति को सिद्ध किया है इसलिए आप हरसिद्धि नाम से प्रसिद्ध होंगी। तभी से महाकाल वन में हरसिद्धि विराजमान हैं।
हरसिद्धि मंदिर का संबंध राजा विक्रमादित्य से भी माना जाता है। जिस क्षेत्र में मंदिर स्थित है, उसे विक्रमादित्य की तपोभूमि माना जाता है। यहीं मंदिर के ठीक सामने विक्रमादित्य का टीला भी देखने को मिलता है, जहां कहा जाता है राजा विक्रमादित्य का सिंहासन था, जिसका लोप कालांतर में हो गया। मंदिर के ठीक पीछे एक कोने में कुछ सिर रखे हैं, जिन पर सिंदूर लगा हुआ है। कहा जाता है कि ये मुंड राजा विक्रमादित्य के सिर हैं। लोक कथाओं के मुताबिक विक्रमादित्य ने देवी को प्रसन्न करने के लिए हर 12वें वर्ष में अपने सिर की बलि दी थी। उन्होंने 11 बार ऐसा किया, लेकिन हर बार देवी उनका सिर प्रसन्नता से वापस कर देती थीं। जब 12वीं बार उन्होंने सिर की बलि दी तो यह वापस नहीं आया। इसे उनके शासन का अंत माना गया। इसी से राजा विक्रमादित्य की उम्र का निर्धारण भी माना गया, ऐसा कहा जाता है राजा की उम्र लगभग 144 वर्ष की रही होगी।
इस शक्तिपीठ हरसिद्धि मंदिर की परंपराएं भी बेहद खास हैं। यहां बलि नहीं चढ़ाई जाती क्योंकि देवी वैष्णव रूप से प्रतिष्ठित हैं। वे परमारवंशी राजाओं की कुलदेवी हैं। यहां पूजा का विधान भिन्न है, श्रीसूक्त और वेद मंत्रों के साथ पूजा यहां होती है। यहां पर स्तंभ दीप जलाने का सौभाग्य हर किसी को प्राप्त नहीं होता। माना जाता है कि स्तंभ दीप जलाते वक्त बोली गई हर मनोकामना सिद्ध होती है। पहले यहां चैत्र और आश्विन मास की नवरात्र में ही दीप स्तंभ के दीप प्रच्वलित किए जाते थे, लेकिन अब यहां पूरे वर्ष दीप स्तंभ के दीप संध्या काल में प्रच्जवलित किए जाते हैं। इसके लिए मंदिर प्रबंध समिति में बुकिंग की जाती है, जिसमे अधिकांशत: अब श्रद्धालुओं को वेटिंग का भी सामना करना होता है।
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बारहवीं बार सिर चढ़ाने के साथ हुआ था विक्रमादित्य शासन का अंत
उज्जैन के इस शक्तिपीठ मंदिर के ठीक पीछे एक कोने में कुछ सिर रखे हैं, जिन पर सिंदूर लगा हुआ है। कहा जाता है कि ये मुंड राजा विक्रमादित्य के सिर हैं। लोक कथाओं के मुताबिक विक्रमादित्य ने देवी को प्रसन्न करने के लिए हर 12वें वर्ष में अपने सिर की बलि दी थी। उन्होंने 11 बार ऐसा किया, लेकिन हर बार देवी उनका सिर प्रसन्नता से वापस कर देती थीं। जब 12वीं बार उन्होंने सिर की बलि दी तो यह वापस नहीं आया। इसे उनके शासन का अंत माना गया। इसी से राजा विक्रमादित्य की उम्र का निर्धारण भी माना गया, ऐसा कहा जाता है राजा की उम्र लगभग 144 वर्ष की रही होगी।
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