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काशी की मां विशालाक्षी......बनारस : बाबा विश्वनाथ धाम के नजदीक स्थित है विशालाक्षी गौरी और विशालाक्षेश्वर महादेव का चमत्कारी मंदिर
वाराणसी से सौरभ मिश्रा
काशी और बनारस के नाम से भी दुनिया भर में मशहूर वाराणसी वैसे को अपनी गलियों, गंगा घाट, साड़ी और विश्वनाथ मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। बनारस शायद देश का इकलौता शहर है जहां पर्यटक और तीर्थयात्री दोनों का बराबर आना जाना लगा रहता। विदेशी भी वाराणसी को उतना ही पसंद करते हैं जितना शिव और गंगा के भक्तों की इस शहर में आस्था है....
भारत की सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी पुरातत्व, पौराणिक कथाओं, भूगोल, कला और इतिहास का संजोए हुए है। हिंदुओं के सात पवित्र पुरियों में से एक काशी भी हैं। काशी को मंदिरों एवं घाटों का नगर भी कहा जाता है
भगवान शिव और काशी का एक दूसरे से अभिन्न संबंध माना जाता है। भगवान शिव और देवी पार्वती के काशी में बसने के पीछे एक कहानी है। जब भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह हुआ, तो उन्होंने कैलाश छोड़कर सिद्ध क्षेत्र में बसने का फैसला किया। पूरी दुनिया देखने क़े बाद लेने के बाद उन्होंने काशी को चुना। वही काशी जहाँ माता सती का भी वर्णन मिलता है....
जब महादेव शिवजी की पत्नी सती अपने पिता राजा दक्ष के यज्ञ में अपने पति का अपमान सहन नहीं कर पाई तो उसी यज्ञ में कूदकर भस्म हो गई। शिवजी जो जब यह पता चला तो उन्होंने अपने गण वीरभद्र को भेजकर यज्ञ स्थल को उजाड़ दिया और राजा दक्ष का सिर काट दिया। बाद में शिवजी अपनी पत्नी सती की जली हुई लाश लेकर विलाप करते हुए सभी ओर घूमते रहे। जहां-जहां माता के अंग और आभूषण गिरे वहां वहां शक्तिपीठ निर्मित हो गए।
पौराणिक कथा पुराणों के अनुसार माँ सती के अंग के टुकड़े, धारण किए वस्त्र या आभूषण गिरे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ अस्तित्व में आये। इन शक्तिपीठों मे पुर्णागिरि, कामाख्या असम, महाकाली कलकत्ता, ज्वालामुखी कांगड़ा, शाकम्भरी सहारनपुर, हिंगलाज कराची आदि प्रमुख है ये अत्यंत पावन तीर्थस्थान कहलाते हैं।
अविमुक्ते विशालाक्षी महाभागा महालये।
वारणस्यां विशालाक्षी गौरीमुख निवासिनी।।
विशालाक्षी शक्तिपीठ हैं जो बाबा क़े 12 ज्योतिर्लिंग में एक हैं उसी मंदिर से सौ मीटर की दुरी पे मीरघाट मोहल्ला स्थित हैं जहां विशालाक्षी गौरी का प्रसिद्ध मंदिर तथा विशालाक्षेश्वर महादेव का शिवलिंग भी है।
मंदिर के महंत राजनाथ तिवारी के अनुसार मंदिर का जीर्णोद्धार सन् 1908 में मद्रासियों ने कराया। गर्भगृह को छोड़कर मंदिर का अन्य भाग दक्षिण भारतीय मंदिर शैली का बना हुआ है। मंदिर के बाहरी भाग पर रंग-बिरंगे रूप में गणेश जी, शंकर जी समेत कई अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां बनी हुई हैं। यहां की शक्ति विशालाक्षी माता तथा भैरव काल भैरव हैं।
माता के दरबार में भादों माह की कृष्ण पक्ष तृतीया को मां विशालाक्षी का जन्म दिन धूम-धाम से मनाया जाता है।
इस मौके पर मां का भव्य शृंगार किया जाता है। जिसका दर्शन करने के लिए आस-पास के श्रद्धालुओं के अलावा काफी संख्या में दक्षिण भारतीय भी आते हैं। चैत्र नवरात्र में मां के दर्शन-पूजन के लिए भी भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है। माना जाता है कि नवरात्र की पंचमी को नौ गौरी स्वरूप में भी मां विशालाक्षी का दर्शन होता है। मां विशालाक्षी के दर्शन से सभी प्रकार के कष्ट दूर होते हैं और सुख, समृद्धि व यश बढ़ता है।
प्रचीनकाल से मान्यता है कि माता विशालाक्षी की पूजा उपासना से सौंदर्य और धन की प्राप्ति होती है। यहां दान, जप और यज्ञ करने पर मुक्ति प्राप्त होती है। ऐसी मान्यता है कि यदि आप यहां 41 मंगलवार कुमकुम का प्रसाद चढ़ाते हैं तो इससे देवी मां आपकी झोली भर देंगी।
मान्यता के अनुसार इस स्थान पर मां सती का कर्ण कुण्डल और उनकी आंख गिरी थी। जिससे इस स्थान की महिमा और महात्म्य दोनों काफी बढ़ गए। मां की उपस्थिति जानकर दर्शन-पूजन करने लगे। बाद में इस स्थान पर मंदिर का निर्माण किया गया। जिसमें मां की दिव्य प्रतिमा स्थापित है। का यह स्थान मां सती के 51 शक्ति पीठों में से भी एक है। इनका महत्व कांची की मां (कृपा दृष्टा) कामाक्षी और मदुरै की (मत्स्य नेत्री) मीनाक्षी के समान है। शास्त्रों के अनुसार काशी के कर्ताधर्ता बाबा विश्वनाथ मां विशालाक्षी के मंदिर में विश्राम करते हैं।
स्कंद पुराण कथा के अनुसार जब ऋषि व्यास को वाराणसी में कोई भी भोजन अर्पण नहीं कर रहा था, तब विशालाक्षी एक गृहिणी की भूमिका में प्रकट हुईं और ऋषि व्यास को भोजन दिया।
अन्नपूर्णा, भोजन की देवी और पार्वती का एक रूप हैं, उन्हें विशालाक्षी, यानी बड़ी आंखों वाली की उपाधि दी गई है। उनका सबसे प्रसिद्ध मंदिर वाराणसी में है, जहाँ उन्हें संरक्षक देवी माना जाता है। यहां भोर की मंगला आरती क़े बाद 5 बजे आम भक्तों का प्रवेश अपराहन भोग आरती फिऱ सांयकाल आरती और रात्रि सयन रात्रि क़े बाद 11 बजे माता पट बंद हो जाता हैं।

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काशी की मां विशालाक्षी......बनारस : बाबा विश्वनाथ धाम के नजदीक स्थित है विशालाक्षी गौरी और विशालाक्षेश्वर महादेव का चमत्कारी मंदिर
वाराणसी से सौरभ मिश्रा
भारत की सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी पुरातत्व, पौराणिक कथाओं, भूगोल, कला और इतिहास का संजोए हुए है। हिंदुओं के सात पवित्र पुरियों में से एक काशी भी हैं। काशी को मंदिरों एवं घाटों का नगर भी कहा जाता है
भगवान शिव और काशी का एक दूसरे से अभिन्न संबंध माना जाता है। भगवान शिव और देवी पार्वती के काशी में बसने के पीछे एक कहानी है। जब भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह हुआ, तो उन्होंने कैलाश छोड़कर सिद्ध क्षेत्र में बसने का फैसला किया। पूरी दुनिया देखने क़े बाद लेने के बाद उन्होंने काशी को चुना। वही काशी जहाँ माता सती का भी वर्णन मिलता है....
जब महादेव शिवजी की पत्नी सती अपने पिता राजा दक्ष के यज्ञ में अपने पति का अपमान सहन नहीं कर पाई तो उसी यज्ञ में कूदकर भस्म हो गई। शिवजी जो जब यह पता चला तो उन्होंने अपने गण वीरभद्र को भेजकर यज्ञ स्थल को उजाड़ दिया और राजा दक्ष का सिर काट दिया। बाद में शिवजी अपनी पत्नी सती की जली हुई लाश लेकर विलाप करते हुए सभी ओर घूमते रहे। जहां-जहां माता के अंग और आभूषण गिरे वहां वहां शक्तिपीठ निर्मित हो गए।
पौराणिक कथा पुराणों के अनुसार माँ सती के अंग के टुकड़े, धारण किए वस्त्र या आभूषण गिरे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ अस्तित्व में आये। इन शक्तिपीठों मे पुर्णागिरि, कामाख्या असम, महाकाली कलकत्ता, ज्वालामुखी कांगड़ा, शाकम्भरी सहारनपुर, हिंगलाज कराची आदि प्रमुख है ये अत्यंत पावन तीर्थस्थान कहलाते हैं।
अविमुक्ते विशालाक्षी महाभागा महालये।
वारणस्यां विशालाक्षी गौरीमुख निवासिनी।।
विशालाक्षी शक्तिपीठ हैं जो बाबा क़े 12 ज्योतिर्लिंग में एक हैं उसी मंदिर से सौ मीटर की दुरी पे मीरघाट मोहल्ला स्थित हैं जहां विशालाक्षी गौरी का प्रसिद्ध मंदिर तथा विशालाक्षेश्वर महादेव का शिवलिंग भी है।
मंदिर के महंत राजनाथ तिवारी के अनुसार मंदिर का जीर्णोद्धार सन् 1908 में मद्रासियों ने कराया। गर्भगृह को छोड़कर मंदिर का अन्य भाग दक्षिण भारतीय मंदिर शैली का बना हुआ है। मंदिर के बाहरी भाग पर रंग-बिरंगे रूप में गणेश जी, शंकर जी समेत कई अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां बनी हुई हैं। यहां की शक्ति विशालाक्षी माता तथा भैरव काल भैरव हैं।
माता के दरबार में भादों माह की कृष्ण पक्ष तृतीया को मां विशालाक्षी का जन्म दिन धूम-धाम से मनाया जाता है।
इस मौके पर मां का भव्य शृंगार किया जाता है। जिसका दर्शन करने के लिए आस-पास के श्रद्धालुओं के अलावा काफी संख्या में दक्षिण भारतीय भी आते हैं। चैत्र नवरात्र में मां के दर्शन-पूजन के लिए भी भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है। माना जाता है कि नवरात्र की पंचमी को नौ गौरी स्वरूप में भी मां विशालाक्षी का दर्शन होता है। मां विशालाक्षी के दर्शन से सभी प्रकार के कष्ट दूर होते हैं और सुख, समृद्धि व यश बढ़ता है।
प्रचीनकाल से मान्यता है कि माता विशालाक्षी की पूजा उपासना से सौंदर्य और धन की प्राप्ति होती है। यहां दान, जप और यज्ञ करने पर मुक्ति प्राप्त होती है। ऐसी मान्यता है कि यदि आप यहां 41 मंगलवार कुमकुम का प्रसाद चढ़ाते हैं तो इससे देवी मां आपकी झोली भर देंगी।
मान्यता के अनुसार इस स्थान पर मां सती का कर्ण कुण्डल और उनकी आंख गिरी थी। जिससे इस स्थान की महिमा और महात्म्य दोनों काफी बढ़ गए। मां की उपस्थिति जानकर दर्शन-पूजन करने लगे। बाद में इस स्थान पर मंदिर का निर्माण किया गया। जिसमें मां की दिव्य प्रतिमा स्थापित है। का यह स्थान मां सती के 51 शक्ति पीठों में से भी एक है। इनका महत्व कांची की मां (कृपा दृष्टा) कामाक्षी और मदुरै की (मत्स्य नेत्री) मीनाक्षी के समान है। शास्त्रों के अनुसार काशी के कर्ताधर्ता बाबा विश्वनाथ मां विशालाक्षी के मंदिर में विश्राम करते हैं।
स्कंद पुराण कथा के अनुसार जब ऋषि व्यास को वाराणसी में कोई भी भोजन अर्पण नहीं कर रहा था, तब विशालाक्षी एक गृहिणी की भूमिका में प्रकट हुईं और ऋषि व्यास को भोजन दिया।
अन्नपूर्णा, भोजन की देवी और पार्वती का एक रूप हैं, उन्हें विशालाक्षी, यानी बड़ी आंखों वाली की उपाधि दी गई है। उनका सबसे प्रसिद्ध मंदिर वाराणसी में है, जहाँ उन्हें संरक्षक देवी माना जाता है। यहां भोर की मंगला आरती क़े बाद 5 बजे आम भक्तों का प्रवेश अपराहन भोग आरती फिऱ सांयकाल आरती और रात्रि सयन रात्रि क़े बाद 11 बजे माता पट बंद हो जाता हैं।

