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शीतला अष्टमी के दिन लोग क्यों खाते हैं बासी भोजन? जानें इसका धार्मिक महत्व और लाभ
Dharm Desk
शीतला अष्टमी के दिन माता को बासी भोजन का भोग लगाने के साथ ही लोग खुद भी बासी खाना खाते हैं। शीतला अष्टमी के दिन बासी भोजन का क्या महत्व है, आइए जानते हैं।
शीतला अष्टमी हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। इसको बसोड़ा भी कहा जाता है। होली के बाद चैत्र माह में अष्टमी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है। उत्तर भारत के साथ ही राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश में इस दिन माता शीतला की पूजा की जाती है और उन्हें बासी खाने का भोग लगाया जाता है। यह पर्व 2025 में कब है और इस दिन का क्या महत्व है, आइए इसके बारे में जानते हैं विस्तार से।
शीतला अष्टमी तिथि 2025
हिंदू पंचांग के अनुसार, शीतला अष्टमी का त्योहार चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। साल 2025 में यह तिथि 22 मार्च को है। आइए अब जान लेते हैं कि शीतला अष्टमी के दिन लोग माता शीतला को बासी भोजन का भोग क्यों लगाते हैं और बासी भोजन क्यों खाते हैं।
शीतला अष्टमी पर बासी भोजन क्यों किया जाता है?
शीतला अष्टमी का पर्व ऐसे समय में आता है जब गर्मी बढ़ने लग जाती है। मौसम में हो रहे बदलाव के कारण संक्रमण रोग हो सकते हैं, इसलिए इस समय बासी भोजन करना अच्छा माना जाता है। वहीं माता शीतला को भी इस दिन बासी भोजन का ही भोग लगता है, क्योंकि माता शीतला को बासी भोजन अतिप्रिय है। भारत में कई जगहों पर लोग इस दिन घर में चूल्हा भी नहीं जलाते और केवल बासी भोजन ही करते हैं। शीतला अष्टमी से पहले लोग पूड़ी, पकौड़े, कढ़ी, चने की दाल, हलवा आदि बना के रख देते हैं। इन्हीं चीजों का भोग भक्त माता शीतला को पूजा के बाद लगाते हैं और साथ ही इन चीजों का सेवन खुद भी करते हैं। ऐसे करने से भक्त माता शीतला के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं।
शीतला अष्टमी का धार्मिक महत्व
धार्मिक शास्त्रों में देवी शीतला को रोगों विशेष रूप से चेचक, खसरा और त्वचा संबंधी रोगों से रक्षा करने वाली देवी के रूप में जाना जाता है। इसलिए शीतला अष्टमी के दिन पूजा करने और व्रत रखने से भक्तों को इन सब रोगों से मुक्ति मिलती है और साथ ही परिवार में भी सुख-समृद्धि आती है।
शीतला अष्टमी व्रत रखने के लाभ
शीतला अष्टमी के दिन व्रत रखने और माता की पूजा करने से आपको रोग-दोषों से मुक्ति मिलती है। माता अपने भक्तों के सभी कष्टों का निवारण करने वाली मानी जाती हैं। इनके पूजा करने से चेचक, छोटी माता जैसे भयंकर रोग भी दूर हो जाते हैं। परिवार के लोगों को आरोग्य की प्राप्ति होती है और वो जीवन का आनंद ले पाते हैं। संक्रमण और बार-बार लगने वाली बीमारियों से भी माता भक्तों की रक्षा करती हैं।
शीतला अष्टमी पूजा समय
शीतला अष्टमी शनिवार, मार्च 22, 2025 को
शीतला अष्टमी पूजा मुहूर्त - 06:23 ए एम से 06:33 पी एम
अवधि - 12 घण्टे 11 मिनट्स
शीतला सप्तमी शुक्रवार, मार्च 21, 2025 को
अष्टमी तिथि प्रारम्भ - मार्च 22, 2025 को 04:23 ए एम बजे
अष्टमी तिथि समाप्त - मार्च 23, 2025 को 05:23 ए एम बजे
2025 शीतला अष्टमी
बासोड़ा पूजा, देवी शीतला को समर्पित पूजा है, जो होली के उपरान्त कृष्ण पक्ष अष्टमी पर की जाती है। बासोड़ा को शीतला अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। सामान्यतः यह पर्व होली के आठ दिन पश्चात् आता है, किन्तु अनेक लोग इसे होली के पश्चात् आने वाले प्रथम सोमवार अथवा शुक्रवार को मनाते हैं। शीतला अष्टमी उत्तर भारतीय राज्यों जैसे गुजरात, राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश में अधिक लोकप्रिय है।
बासोड़ा पर्व की परम्परा के अनुसार, इस दिन घरों में भोजन पकाने हेतु अग्नि नहीं जलायी जाती है। इसीलिये अधिकांश परिवार एक दिन पूर्व भोजन बनाते हैं तथा शीतला अष्टमी के दिन बासी भोजन का सेवन करते हैं। ऐसा माना जाता है कि, देवी शीतला चेचक, खसरा आदि रोगों को नियन्त्रित करती हैं तथा लोग इन रोगों के प्रकोप से सुरक्षा हेतु उनकी पूजा-आराधना करते हैं।
गुजरात में, बासोड़ा के समान ही एक पर्व कृष्ण जन्माष्टमी से ठीक एक दिन पूर्व मनाया जाता है तथा इसे शीतला सातम के नाम से जाना जाता है। शीतला सातम भी देवी शीतला को समर्पित है एवं शीतला सातम के दिन भी किसी प्रकार का ताजा भोजन नहीं पकाया जाता है।
शीतला माता की आरती
जय शीतला माता माँ शीतला की सबसे प्रसिद्ध आरती है। यह प्रसिद्ध आरती शीतला माता से सम्बन्धित अधिकांश अवसरों पर गायी जाती है।
॥ श्री शीतला माता की आरती ॥
जय शीतला माता,मैया जय शीतला माता।
आदि ज्योति महारानीसब फल की दाता॥
ॐ जय शीतला माता...।
रतन सिंहासन शोभित,श्वेत छत्र भाता।
ऋद्धि-सिद्धि चँवर डोलावें,जगमग छवि छाता॥
ॐ जय शीतला माता...।
विष्णु सेवत ठाढ़े,सेवें शिव धाता।
वेद पुराण वरणतपार नहीं पाता॥
ॐ जय शीतला माता...।
इन्द्र मृदङ्ग बजावतचन्द्र वीणा हाथा।
सूरज ताल बजावैनारद मुनि गाता॥
ॐ जय शीतला माता...।
घण्टा शङ्ख शहनाईबाजै मन भाता।
करै भक्त जन आरतीलखि लखि हर्षाता॥
ॐ जय शीतला माता...।
ब्रह्म रूप वरदानीतुही तीन काल ज्ञाता।
भक्तन को सुख देतीमातु पिता भ्राता॥
ॐ जय शीतला माता...।
जो जन ध्यान लगावेप्रेम शक्ति पाता।
सकल मनोरथ पावेभवनिधि तर जाता॥
ॐ जय शीतला माता...।
रोगों से जो पीड़ित कोईशरण तेरी आता।
कोढ़ी पावे निर्मल कायाअन्ध नेत्र पाता॥
ॐ जय शीतला माता...।
बांझ पुत्र को पावेदारिद्र कट जाता।
ताको भजै जो नाहींसिर धुनि पछताता॥
ॐ जय शीतला माता...।
शीतल करती जन कीतू ही है जग त्राता।
उत्पत्ति बाला बिनाशनतू सब की माता॥
ॐ जय शीतला माता...।
दास नारायणकर जोरी माता।
भक्ति आपनी दीजैऔर न कुछ माता॥
ॐ जय शीतला माता...।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। dainikjagranmpcg.com एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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शीतला अष्टमी के दिन लोग क्यों खाते हैं बासी भोजन? जानें इसका धार्मिक महत्व और लाभ
Dharm Desk
शीतला अष्टमी हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। इसको बसोड़ा भी कहा जाता है। होली के बाद चैत्र माह में अष्टमी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है। उत्तर भारत के साथ ही राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश में इस दिन माता शीतला की पूजा की जाती है और उन्हें बासी खाने का भोग लगाया जाता है। यह पर्व 2025 में कब है और इस दिन का क्या महत्व है, आइए इसके बारे में जानते हैं विस्तार से।
शीतला अष्टमी तिथि 2025
हिंदू पंचांग के अनुसार, शीतला अष्टमी का त्योहार चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। साल 2025 में यह तिथि 22 मार्च को है। आइए अब जान लेते हैं कि शीतला अष्टमी के दिन लोग माता शीतला को बासी भोजन का भोग क्यों लगाते हैं और बासी भोजन क्यों खाते हैं।
शीतला अष्टमी पर बासी भोजन क्यों किया जाता है?
शीतला अष्टमी का पर्व ऐसे समय में आता है जब गर्मी बढ़ने लग जाती है। मौसम में हो रहे बदलाव के कारण संक्रमण रोग हो सकते हैं, इसलिए इस समय बासी भोजन करना अच्छा माना जाता है। वहीं माता शीतला को भी इस दिन बासी भोजन का ही भोग लगता है, क्योंकि माता शीतला को बासी भोजन अतिप्रिय है। भारत में कई जगहों पर लोग इस दिन घर में चूल्हा भी नहीं जलाते और केवल बासी भोजन ही करते हैं। शीतला अष्टमी से पहले लोग पूड़ी, पकौड़े, कढ़ी, चने की दाल, हलवा आदि बना के रख देते हैं। इन्हीं चीजों का भोग भक्त माता शीतला को पूजा के बाद लगाते हैं और साथ ही इन चीजों का सेवन खुद भी करते हैं। ऐसे करने से भक्त माता शीतला के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं।
शीतला अष्टमी का धार्मिक महत्व
धार्मिक शास्त्रों में देवी शीतला को रोगों विशेष रूप से चेचक, खसरा और त्वचा संबंधी रोगों से रक्षा करने वाली देवी के रूप में जाना जाता है। इसलिए शीतला अष्टमी के दिन पूजा करने और व्रत रखने से भक्तों को इन सब रोगों से मुक्ति मिलती है और साथ ही परिवार में भी सुख-समृद्धि आती है।
शीतला अष्टमी व्रत रखने के लाभ
शीतला अष्टमी के दिन व्रत रखने और माता की पूजा करने से आपको रोग-दोषों से मुक्ति मिलती है। माता अपने भक्तों के सभी कष्टों का निवारण करने वाली मानी जाती हैं। इनके पूजा करने से चेचक, छोटी माता जैसे भयंकर रोग भी दूर हो जाते हैं। परिवार के लोगों को आरोग्य की प्राप्ति होती है और वो जीवन का आनंद ले पाते हैं। संक्रमण और बार-बार लगने वाली बीमारियों से भी माता भक्तों की रक्षा करती हैं।
शीतला अष्टमी पूजा समय
शीतला अष्टमी शनिवार, मार्च 22, 2025 को
शीतला अष्टमी पूजा मुहूर्त - 06:23 ए एम से 06:33 पी एम
अवधि - 12 घण्टे 11 मिनट्स
शीतला सप्तमी शुक्रवार, मार्च 21, 2025 को
अष्टमी तिथि प्रारम्भ - मार्च 22, 2025 को 04:23 ए एम बजे
अष्टमी तिथि समाप्त - मार्च 23, 2025 को 05:23 ए एम बजे
2025 शीतला अष्टमी
बासोड़ा पूजा, देवी शीतला को समर्पित पूजा है, जो होली के उपरान्त कृष्ण पक्ष अष्टमी पर की जाती है। बासोड़ा को शीतला अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। सामान्यतः यह पर्व होली के आठ दिन पश्चात् आता है, किन्तु अनेक लोग इसे होली के पश्चात् आने वाले प्रथम सोमवार अथवा शुक्रवार को मनाते हैं। शीतला अष्टमी उत्तर भारतीय राज्यों जैसे गुजरात, राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश में अधिक लोकप्रिय है।
बासोड़ा पर्व की परम्परा के अनुसार, इस दिन घरों में भोजन पकाने हेतु अग्नि नहीं जलायी जाती है। इसीलिये अधिकांश परिवार एक दिन पूर्व भोजन बनाते हैं तथा शीतला अष्टमी के दिन बासी भोजन का सेवन करते हैं। ऐसा माना जाता है कि, देवी शीतला चेचक, खसरा आदि रोगों को नियन्त्रित करती हैं तथा लोग इन रोगों के प्रकोप से सुरक्षा हेतु उनकी पूजा-आराधना करते हैं।
गुजरात में, बासोड़ा के समान ही एक पर्व कृष्ण जन्माष्टमी से ठीक एक दिन पूर्व मनाया जाता है तथा इसे शीतला सातम के नाम से जाना जाता है। शीतला सातम भी देवी शीतला को समर्पित है एवं शीतला सातम के दिन भी किसी प्रकार का ताजा भोजन नहीं पकाया जाता है।
शीतला माता की आरती
जय शीतला माता माँ शीतला की सबसे प्रसिद्ध आरती है। यह प्रसिद्ध आरती शीतला माता से सम्बन्धित अधिकांश अवसरों पर गायी जाती है।
॥ श्री शीतला माता की आरती ॥
जय शीतला माता,मैया जय शीतला माता।
आदि ज्योति महारानीसब फल की दाता॥
ॐ जय शीतला माता...।
रतन सिंहासन शोभित,श्वेत छत्र भाता।
ऋद्धि-सिद्धि चँवर डोलावें,जगमग छवि छाता॥
ॐ जय शीतला माता...।
विष्णु सेवत ठाढ़े,सेवें शिव धाता।
वेद पुराण वरणतपार नहीं पाता॥
ॐ जय शीतला माता...।
इन्द्र मृदङ्ग बजावतचन्द्र वीणा हाथा।
सूरज ताल बजावैनारद मुनि गाता॥
ॐ जय शीतला माता...।
घण्टा शङ्ख शहनाईबाजै मन भाता।
करै भक्त जन आरतीलखि लखि हर्षाता॥
ॐ जय शीतला माता...।
ब्रह्म रूप वरदानीतुही तीन काल ज्ञाता।
भक्तन को सुख देतीमातु पिता भ्राता॥
ॐ जय शीतला माता...।
जो जन ध्यान लगावेप्रेम शक्ति पाता।
सकल मनोरथ पावेभवनिधि तर जाता॥
ॐ जय शीतला माता...।
रोगों से जो पीड़ित कोईशरण तेरी आता।
कोढ़ी पावे निर्मल कायाअन्ध नेत्र पाता॥
ॐ जय शीतला माता...।
बांझ पुत्र को पावेदारिद्र कट जाता।
ताको भजै जो नाहींसिर धुनि पछताता॥
ॐ जय शीतला माता...।
शीतल करती जन कीतू ही है जग त्राता।
उत्पत्ति बाला बिनाशनतू सब की माता॥
ॐ जय शीतला माता...।
दास नारायणकर जोरी माता।
भक्ति आपनी दीजैऔर न कुछ माता॥
ॐ जय शीतला माता...।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। dainikjagranmpcg.com एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
