बसंत पंचमी पर विद्या की अधिष्ठात्री मां सरस्वती की आराधना

धर्म डेस्क

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माघ शुक्ल पंचमी को शुभ योग में पूजा, स्नान और दान से ज्ञान, वाणी और विवेक की प्राप्ति

आज देशभर में बसंत पंचमी का पर्व श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जा रहा है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व ज्ञान, विद्या और वाणी की देवी मां सरस्वती की उपासना को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी तिथि को मां सरस्वती का पृथ्वी पर प्राकट्य हुआ था। इसलिए इस दिन की गई साधना, पूजा और दान को विशेष फलदायी माना जाता है।

ज्योतिषीय दृष्टि से भी इस वर्ष बसंत पंचमी को शुभ संयोग प्राप्त है। पंचमी तिथि पूरे दिन प्रभावी रहेगी, जबकि चंद्रमा का संचार गुरु की राशि मीन में हो रहा है। मान्यता है कि इस योग में की गई सरस्वती आराधना से विद्या, स्मरण शक्ति और रचनात्मकता में वृद्धि होती है। यही कारण है कि विद्यालयों, शिक्षण संस्थानों और घरों में सरस्वती पूजन का विशेष आयोजन किया गया।

प्रयागराज में माघ मेले का प्रमुख स्नान पर्व
तीर्थराज प्रयागराज में बसंत पंचमी माघ मेले का प्रमुख स्नान पर्व माना जाता है। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम तट पर सुबह से ही श्रद्धालुओं का जमावड़ा देखा गया। साधु-संतों के प्रवचन, वेद-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच श्रद्धालु स्नान कर मां सरस्वती से ज्ञान और सद्बुद्धि की कामना कर रहे हैं। प्रशासन के अनुसार, सुरक्षा और व्यवस्था के व्यापक इंतजाम किए गए हैं ताकि श्रद्धालु निर्बाध रूप से धार्मिक कर्मकांड कर सकें।

पूजन की परंपरा और धार्मिक मान्यता
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, बसंत पंचमी के दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ पीले या हल्के रंग के वस्त्र धारण कर पूजा करना शुभ माना जाता है। पूजा स्थल पर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख कर मां सरस्वती का ध्यान किया जाता है। पीले पुष्प, धूप, दीप, अक्षत और मीठे पीले व्यंजन जैसे खीर या हलवा अर्पित करने की परंपरा है। कई स्थानों पर भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण-राधा के पूजन की भी परंपरा देखी जाती है।

शिक्षा और संस्कृति से जुड़ा पर्व
बसंत पंचमी को बच्चों की शिक्षा से जोड़कर भी देखा जाता है। इस दिन ‘विद्यारंभ’ संस्कार का विशेष महत्व है, जिसमें छोटे बच्चों को पहली बार अक्षर ज्ञान कराया जाता है। कलाकार, विद्यार्थी और लेखक मां सरस्वती से अपनी विद्या और कला में निखार की कामना करते हैं। पीले रंग का उपयोग बसंत ऋतु के आगमन और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।

धार्मिक विशेषज्ञों के अनुसार, पंचमी तिथि देर रात तक प्रभावी रहने से श्रद्धालु पूरे दिन पूजा-पाठ और दान कर सकते हैं। मान्यता है कि शुद्ध मन, संयमित आचरण और सात्त्विक भाव से की गई आराधना से मां सरस्वती की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यही कारण है कि बसंत पंचमी को केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि चेतना, शिक्षा और संस्कृति के जागरण का दिन माना जाता है।

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www.dainikjagranmpcg.com
23 Jan 2026 By Nitin Trivedi

बसंत पंचमी पर विद्या की अधिष्ठात्री मां सरस्वती की आराधना

धर्म डेस्क

आज देशभर में बसंत पंचमी का पर्व श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जा रहा है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व ज्ञान, विद्या और वाणी की देवी मां सरस्वती की उपासना को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी तिथि को मां सरस्वती का पृथ्वी पर प्राकट्य हुआ था। इसलिए इस दिन की गई साधना, पूजा और दान को विशेष फलदायी माना जाता है।

ज्योतिषीय दृष्टि से भी इस वर्ष बसंत पंचमी को शुभ संयोग प्राप्त है। पंचमी तिथि पूरे दिन प्रभावी रहेगी, जबकि चंद्रमा का संचार गुरु की राशि मीन में हो रहा है। मान्यता है कि इस योग में की गई सरस्वती आराधना से विद्या, स्मरण शक्ति और रचनात्मकता में वृद्धि होती है। यही कारण है कि विद्यालयों, शिक्षण संस्थानों और घरों में सरस्वती पूजन का विशेष आयोजन किया गया।

प्रयागराज में माघ मेले का प्रमुख स्नान पर्व
तीर्थराज प्रयागराज में बसंत पंचमी माघ मेले का प्रमुख स्नान पर्व माना जाता है। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम तट पर सुबह से ही श्रद्धालुओं का जमावड़ा देखा गया। साधु-संतों के प्रवचन, वेद-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच श्रद्धालु स्नान कर मां सरस्वती से ज्ञान और सद्बुद्धि की कामना कर रहे हैं। प्रशासन के अनुसार, सुरक्षा और व्यवस्था के व्यापक इंतजाम किए गए हैं ताकि श्रद्धालु निर्बाध रूप से धार्मिक कर्मकांड कर सकें।

पूजन की परंपरा और धार्मिक मान्यता
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, बसंत पंचमी के दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ पीले या हल्के रंग के वस्त्र धारण कर पूजा करना शुभ माना जाता है। पूजा स्थल पर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख कर मां सरस्वती का ध्यान किया जाता है। पीले पुष्प, धूप, दीप, अक्षत और मीठे पीले व्यंजन जैसे खीर या हलवा अर्पित करने की परंपरा है। कई स्थानों पर भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण-राधा के पूजन की भी परंपरा देखी जाती है।

शिक्षा और संस्कृति से जुड़ा पर्व
बसंत पंचमी को बच्चों की शिक्षा से जोड़कर भी देखा जाता है। इस दिन ‘विद्यारंभ’ संस्कार का विशेष महत्व है, जिसमें छोटे बच्चों को पहली बार अक्षर ज्ञान कराया जाता है। कलाकार, विद्यार्थी और लेखक मां सरस्वती से अपनी विद्या और कला में निखार की कामना करते हैं। पीले रंग का उपयोग बसंत ऋतु के आगमन और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।

धार्मिक विशेषज्ञों के अनुसार, पंचमी तिथि देर रात तक प्रभावी रहने से श्रद्धालु पूरे दिन पूजा-पाठ और दान कर सकते हैं। मान्यता है कि शुद्ध मन, संयमित आचरण और सात्त्विक भाव से की गई आराधना से मां सरस्वती की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यही कारण है कि बसंत पंचमी को केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि चेतना, शिक्षा और संस्कृति के जागरण का दिन माना जाता है।

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