भोपाल में “सिल्क एक्सपो ” प्रदर्शनी में दिख रही पीढ़ियों तक चलने वाली शाही साड़ियां

Digital Desk

देशभर के 100 से अधिक वीवर्स के डिजाइनर कलेक्शन 12 अप्रैल तक चलेगी प्रदर्शनी

भारतीय परंपरा और शिल्पकला की समृद्ध विरासत को दर्शाती दुर्लभ और शाही साड़ियों का आकर्षक संग्रह इन दिनों भोपाल में आयोजित “ सिल्क एक्सपो” प्रदर्शनी में देखने को मिल रहा है। दशहरा मैदान, बिट्टन मार्केट पर लगी इस प्रदर्शनी में देशभर के 100 से अधिक बुनकरों और डिजाइनरों के विशेष कलेक्शन प्रदर्शित किए गए हैं। यह प्रदर्शनी 12 अप्रैल तक प्रतिदिन सुबह 11 बजे से रात 9 बजे तक आम लोगों के लिए खुली रहेगी।


प्रदर्शनी का शुभारंभ मंत्री श्रीमती कृष्णा गौर ने किया। इस प्रदर्शनी में गुजरात के कच्छ क्षेत्र की पारंपरिक पानेतर घरचोला साड़ी विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। गजराज (हाथी), हिरन, मयूर और राजवाड़ी आकृतियों जैसे पारंपरिक डिजाइनों से सजी यह साड़ी भारतीय संस्कृति और शाही परंपरा का प्रतीक मानी जाती है। कच्छ के अनुभवी कारीगर भोला प्रधान के अनुसार, इस साड़ी को तैयार करने में 60 वर्षों का अनुभव रखने वाले कारीगर 7 से 10 दिन का समय लगाते हैं।

असली मलबरी सिल्क पर हैंडलूम से बुनी जाने वाली यह साड़ी इतनी टिकाऊ होती है कि इसे पीढ़ियों तक सहेजकर रखा जा सकता है। नेचुरल रंगों से तैयार होने के बाद इसमें मनचाहे रंग तीन बार तक चढ़ाए जा सकते हैं। गुजरात की सांस्कृतिक पहचान मानी जाने वाली यह साड़ी खासतौर पर विवाह और पारिवारिक आयोजनों में पहनी जाती है।

 

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प्रदर्शनी में दक्षिण भारत की प्रसिद्ध कांजीवरम साड़ियों का भी विशेष संग्रह मौजूद है। बेंगलुरु की श्री लक्ष्मी सोसायटी सिल्क के प्रतिनिधियों द्वारा लाई गई इन साड़ियों में शुद्ध जरी का काम किया गया है। एक कांजीवरम साड़ी को तैयार करने में एक कारीगर को लगभग तीन महीने का समय लगता है। कई साड़ियों में सोने और चांदी के धागों से बारीक बुनाई की जाती है, जिसके कारण उनकी कीमत भी उनके काम और डिजाइन के अनुसार तय होती है।


आयोजक आशीष गुप्ता ने बताया कि प्रदर्शनी में सिल्क और कॉटन साड़ियों के साथ डिजाइनर ड्रेस, बनारसी, पटोला और कांजीवरम साड़ियों का भी आकर्षक कलेक्शन उपलब्ध है। इसके अलावा एथनिक ड्रेस, सिल्क व कॉटन ड्रेस मटेरियल, पंजाबी कॉटन सूट, साड़ी और बेडशीट्स की विविध रेंज भी प्रदर्शित की गई है।


गर्मियों को ध्यान में रखते हुए जयपुर से लाया गया कॉटन मटेरियल भी लोगों को खूब आकर्षित कर रहा है। मोहम्मद शोहेब द्वारा प्रस्तुत इस मल कॉटन कपड़े को वेजिटेबल रंगों से डाय कर ब्लॉक प्रिंट तकनीक से तैयार किया जाता है, जो गर्मियों में पहनने के लिए बेहद आरामदायक माना जाता है।


इसके साथ ही कच्छ के रूहान द्वारा तैयार आरी, पेचवर्क और गोटा पट्टी वर्क से सजे कुशन कवर, बेडशीट, वॉल हैंगिंग, बैग्स और टेबल रनर्स भी प्रदर्शनी में उपलब्ध हैं। वहीं कर्नाटक से आए विजय चौधरी मैसूर की मशरूम मोडल सिल्क से बनी राजवाड़ी डिजाइन की विशेष साड़ियां लेकर आए हैं, जिन्हें तैयार करने में दो कारीगरों को लगभग चार महीने का समय लगता है।


प्रदर्शनी में खरीदारी करने वाले ग्राहकों के लिए विशेष छूट भी दी जा रही है, जिसके कारण शहर की महिलाओं में इस आयोजन को लेकर खास उत्साह देखा जा रहा है।

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03 Apr 2026 By दैनिक जागरण

भोपाल में “सिल्क एक्सपो ” प्रदर्शनी में दिख रही पीढ़ियों तक चलने वाली शाही साड़ियां

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भारतीय परंपरा और शिल्पकला की समृद्ध विरासत को दर्शाती दुर्लभ और शाही साड़ियों का आकर्षक संग्रह इन दिनों भोपाल में आयोजित “ सिल्क एक्सपो” प्रदर्शनी में देखने को मिल रहा है। दशहरा मैदान, बिट्टन मार्केट पर लगी इस प्रदर्शनी में देशभर के 100 से अधिक बुनकरों और डिजाइनरों के विशेष कलेक्शन प्रदर्शित किए गए हैं। यह प्रदर्शनी 12 अप्रैल तक प्रतिदिन सुबह 11 बजे से रात 9 बजे तक आम लोगों के लिए खुली रहेगी।


प्रदर्शनी का शुभारंभ मंत्री श्रीमती कृष्णा गौर ने किया। इस प्रदर्शनी में गुजरात के कच्छ क्षेत्र की पारंपरिक पानेतर घरचोला साड़ी विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। गजराज (हाथी), हिरन, मयूर और राजवाड़ी आकृतियों जैसे पारंपरिक डिजाइनों से सजी यह साड़ी भारतीय संस्कृति और शाही परंपरा का प्रतीक मानी जाती है। कच्छ के अनुभवी कारीगर भोला प्रधान के अनुसार, इस साड़ी को तैयार करने में 60 वर्षों का अनुभव रखने वाले कारीगर 7 से 10 दिन का समय लगाते हैं।

असली मलबरी सिल्क पर हैंडलूम से बुनी जाने वाली यह साड़ी इतनी टिकाऊ होती है कि इसे पीढ़ियों तक सहेजकर रखा जा सकता है। नेचुरल रंगों से तैयार होने के बाद इसमें मनचाहे रंग तीन बार तक चढ़ाए जा सकते हैं। गुजरात की सांस्कृतिक पहचान मानी जाने वाली यह साड़ी खासतौर पर विवाह और पारिवारिक आयोजनों में पहनी जाती है।

 

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प्रदर्शनी में दक्षिण भारत की प्रसिद्ध कांजीवरम साड़ियों का भी विशेष संग्रह मौजूद है। बेंगलुरु की श्री लक्ष्मी सोसायटी सिल्क के प्रतिनिधियों द्वारा लाई गई इन साड़ियों में शुद्ध जरी का काम किया गया है। एक कांजीवरम साड़ी को तैयार करने में एक कारीगर को लगभग तीन महीने का समय लगता है। कई साड़ियों में सोने और चांदी के धागों से बारीक बुनाई की जाती है, जिसके कारण उनकी कीमत भी उनके काम और डिजाइन के अनुसार तय होती है।


आयोजक आशीष गुप्ता ने बताया कि प्रदर्शनी में सिल्क और कॉटन साड़ियों के साथ डिजाइनर ड्रेस, बनारसी, पटोला और कांजीवरम साड़ियों का भी आकर्षक कलेक्शन उपलब्ध है। इसके अलावा एथनिक ड्रेस, सिल्क व कॉटन ड्रेस मटेरियल, पंजाबी कॉटन सूट, साड़ी और बेडशीट्स की विविध रेंज भी प्रदर्शित की गई है।


गर्मियों को ध्यान में रखते हुए जयपुर से लाया गया कॉटन मटेरियल भी लोगों को खूब आकर्षित कर रहा है। मोहम्मद शोहेब द्वारा प्रस्तुत इस मल कॉटन कपड़े को वेजिटेबल रंगों से डाय कर ब्लॉक प्रिंट तकनीक से तैयार किया जाता है, जो गर्मियों में पहनने के लिए बेहद आरामदायक माना जाता है।


इसके साथ ही कच्छ के रूहान द्वारा तैयार आरी, पेचवर्क और गोटा पट्टी वर्क से सजे कुशन कवर, बेडशीट, वॉल हैंगिंग, बैग्स और टेबल रनर्स भी प्रदर्शनी में उपलब्ध हैं। वहीं कर्नाटक से आए विजय चौधरी मैसूर की मशरूम मोडल सिल्क से बनी राजवाड़ी डिजाइन की विशेष साड़ियां लेकर आए हैं, जिन्हें तैयार करने में दो कारीगरों को लगभग चार महीने का समय लगता है।


प्रदर्शनी में खरीदारी करने वाले ग्राहकों के लिए विशेष छूट भी दी जा रही है, जिसके कारण शहर की महिलाओं में इस आयोजन को लेकर खास उत्साह देखा जा रहा है।

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