राजस्थान के ब्यावर ज़िले के विजयनगर कस्बे में घटित यह घटना तब सामने आई, जब एक मध्यमवर्गीय परिवार के घर से अचानक कुछ रुपये गायब हो गए। मामूली लगने वाली यह बात जल्द ही एक ऐसे भयावह अपराध की परतें खोलने लगी, जिसने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया।
परिवार की 16 वर्षीय बेटी (बदला हुआ नाम – रमा) से जब रुपये के बारे में पूछा गया, तो उसका घबरा जाना माता-पिता के लिए असामान्य था। अगले ही दिन माँ ने उसके पास एक छुपा हुआ मोबाइल फोन देख लिया। सख्ती से पूछताछ करने पर किशोरी टूट गई और उसने जो बताया, वह किसी भी माता-पिता के लिए डरावना सपना था।
रमा ने बताया कि बीते कई महीनों से वह और उसकी कुछ सहेलियाँ कुछ युवकों के एक समूह के शिकार बने हुए थे। शुरुआत स्कूल आते-जाते पीछा करने से हुई, फिर बातचीत, भरोसा और उसके बाद धमकी व ब्लैकमेलिंग तक बात पहुँच गई। आरोपियों ने वीडियो रिकॉर्डिंग के ज़रिये किशोरियों को डराया और उनसे पैसे मंगवाने का दबाव बनाया।
जब रमा के पिता अन्य सहेलियों के घर पहुँचे, तो चौंकाने वाला सच सामने आया। कई नाबालिग छात्राएँ इसी तरह शोषण का शिकार हुई थीं। सभी को छोटे मोबाइल दिए गए थे, ताकि वे चोरी-छिपे संपर्क में रहें। डर, शर्म और धमकी के कारण कोई भी पहले सच नहीं बता सकी।
परिवारों ने एकजुट होकर पुलिस से संपर्क किया। मामले की गंभीरता को देखते हुए वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी में जाँच शुरू हुई। मेडिकल जाँच, मोबाइल फोन की फॉरेंसिक पड़ताल और पीड़िताओं के बयान के आधार पर कई आरोपियों के खिलाफ पॉक्सो एक्ट, बलात्कार, ब्लैकमेलिंग और आईटी एक्ट की धाराओं में प्रकरण दर्ज किया गया। कुछ आरोपी गिरफ्तार किए गए, जबकि अन्य की तलाश जारी रही।
जाँच में सामने आया कि यह कोई एकल अपराध नहीं था, बल्कि एक संगठित तरीका अपनाया गया था। एक पीड़िता को फँसाकर उससे दूसरी लड़कियों तक पहुँच बनाई जाती थी। धमकी दी जाती थी कि यदि नई लड़की नहीं लाई गई, तो वीडियो सार्वजनिक कर दिए जाएंगे या परिवार को नुकसान पहुँचाया जाएगा।
यह मामला केवल एक कस्बे की घटना नहीं था, बल्कि यह उस बड़ी सच्चाई की ओर इशारा करता है, जहाँ नाबालिगों को भावनात्मक रूप से फँसाकर, डराकर और तकनीक के ज़रिये शोषण किया जाता है। कई पीड़िताएँ अभी भी सामने आने से डर रही थीं।
पुलिस के अनुसार, जाँच का दायरा बढ़ाया जा रहा है और यह आशंका है कि पीड़ितों की संख्या अधिक हो सकती है। प्रशासन ने परिवारों से अपील की कि डर या सामाजिक दबाव के कारण चुप न रहें।यह सत्यकथा हमें याद दिलाती है कि
अपराध का कोई धर्म, जाति या पहचान नहीं होती—लेकिन चुप्पी हमेशा अपराधी के पक्ष में जाती है।
समय पर संवाद, सतर्कता और भरोसा ही ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है।
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