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जब कविता समय से टकराती है: ‘असमय का अंधेरा’ की समीक्षा
समीक्षा: डॉ. सुधीर सक्सेना
"हम राजनीतिक युग की संतानें हैं..."
— विश्वावा शिंबोर्स्का
नोबेल पुरस्कार विजेता पोलिश कवयित्री शिंबोर्स्का की यह पंक्ति कवि के सामाजिक-राजनीतिक दायित्व का स्मरण कराती है। इसी आत्मचेतस भावना के साथ कवि सुरेश गुप्ता का प्रथम कविता-संग्रह ‘असमय का अंधेरा’ पाठकों के समक्ष आता है — और यह मात्र शीर्षक नहीं, समय के असमंजस और व्यग्रता की सार्थक पहचान है।
यह संग्रह न केवल आज के जटिल यथार्थ से टकराने की हिम्मत दिखाता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि कवि अपने समय, समाज और सन्नाटे के विरुद्ध खड़ा है — शब्दों के माध्यम से, संवेदनाओं की तीव्रता के साथ।
समय के आईने में कविता की उजास
‘असमय का अंधेरा’ शीर्षक ही मानो किसी मौन त्रासदी का उद्घोष करता है। कवि कहते हैं:
"बहुत कचोटता है यह असमय का / दिन का अंधेरा।"
यह दिन में पसरा अंधकार केवल रूपक नहीं, आज के सामाजिक परिदृश्य की विडंबना है। कवि यह कहकर केवल स्थिति नहीं दर्शाता, बल्कि अपनी पीड़ा, चिंता और जागरूकता को भी स्वर देता है।
धूमिल की प्रसिद्ध पंक्ति “कविता घेराव में बौखलाए हुए आदमी का संक्षिप्त एकालाप है” को खंडित करते हुए, सुरेश गुप्ता संवाद की मुद्रा में कविता रचते हैं। वे मानते हैं कि कविता केवल आत्मकेंद्रित गुंजार नहीं, सामाजिक व संवेदनशील संवाद है।
प्रेम, स्मृति और मानवीय संबंधों की परतें
संग्रह की कविताओं में प्रेम के कई रूप हैं — आत्मीय, अस्वीकारा गया, साझा, जिद्दी और पारस्परिक। कवि लिखते हैं:
"प्रेम किस्मत को नहीं मानता।"
यह प्रेम केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि उसमें ‘हम’ की सामूहिकता है। कविता एकांत की तलाश करती है, पर वह समाज-विमुख नहीं।
पारिवारिक बंधनों की छवियां — माँ, पिता, बेटा, सभी गहरे आत्मीय भावों के साथ मौजूद हैं। पिता से जुड़ी कविताएं कुर्सी, आईना जैसे प्रतीकों के माध्यम से स्मृति की गहराइयों में ले जाती हैं। मनु के बहाने वह छूटे हुए समय की धूल को फिर से झाड़ते हैं।
खिलचीपुर कविता में केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि समूचे भारत के छोटे कस्बों की सामूहिक स्मृति मौजूद है। वहां गाड़गंगा बहती है, कोरोना की त्रासदी भी है, और साथ ही मित्रता की जीवंत ऊर्जा भी— महेन्द्र गगन और मनोज पाठक को समर्पित कविताएं इस आत्मीय दुनिया को और गहराई देती हैं।
कविता का दायित्व और चेतनशीलता
कवि की दृष्टि केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक रूप से भी सजग है। वह लिखते हैं:
"कविता जिसे कोई पढ़ना नहीं चाहता / चाहती है युद्ध में शांति / शांति में समरसता।"
यह कविता की नैतिक ज़िम्मेदारी का साक्ष्य है, जहाँ कविता केवल सौंदर्य नहीं, एक हस्तक्षेप है। वह असत्य के बरक्स सत्य, हिंसा के बरक्स शांति और अंधकार के बरक्स उजाले की कामना करती है — ठीक उसी परंपरा में जैसे कायसिन कुलियेव की कविताएं करती हैं।
और जब कवि लिखता है—
“जो डर रहे हैं / अपने खिलाफ / आवाज़ उठने के डर से”,
तो यह एक साहसी, सजग और गहन रूप से राजनीतिक कवि की पहचान है।
यह पंक्तियाँ मुक्तिबोध की अमर पंक्ति “पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?” की अनुगूंज हैं — और सुरेश गुप्ता का उत्तर उनकी कविता में साफ झलकता है।
भाषा, शिल्प और आत्मविश्वास
संग्रह की भाषा सरल, आत्मीय और प्रभावशाली है। वहाँ न तो बौद्धिक छलावे हैं, न दुरूह प्रतीकों की भरमार। कवि संवाद करता है — पाठक से, अपने समय से और स्वयं से।
“कविता तुम्हें उजाड़ेगी नहीं / और सिकोड़ेगी भी नहीं।”
यह कविता के आत्मिक स्पेस का सूचक है — एक ऐसा स्थान जो पाठक को अपनाता है, उसका भार कम करता है और उसे दिशा भी देता है।
एक सधी हुई शुरुआत, एक प्रामाणिक स्वर
‘असमय का अंधेरा’ कवि सुरेश गुप्ता की रचनात्मक यात्रा का पहला मुकाम है, पर यह शुरुआत परिपक्वता, आत्मविश्वास और कलात्मक ईमानदारी से भरी हुई है। यह संग्रह कविता को फिर से प्रासंगिक, जागरूक और संवेदनशील बनाता है।
यह केवल कवि के लिए नहीं, पाठकों और समूचे कवितालोक के लिए एक स्वागतयोग्य दस्तावेज़ है।
पुस्तक विवरण:
नाम: असमय का अंधेरा
कवि: सुरेश गुप्ता
प्रकाशक: प्रथमेश प्रिंटर्स, भोपाल
मूल्य: ₹100/-
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जब कविता समय से टकराती है: ‘असमय का अंधेरा’ की समीक्षा
समीक्षा: डॉ. सुधीर सक्सेना
"हम राजनीतिक युग की संतानें हैं..."
— विश्वावा शिंबोर्स्का
नोबेल पुरस्कार विजेता पोलिश कवयित्री शिंबोर्स्का की यह पंक्ति कवि के सामाजिक-राजनीतिक दायित्व का स्मरण कराती है। इसी आत्मचेतस भावना के साथ कवि सुरेश गुप्ता का प्रथम कविता-संग्रह ‘असमय का अंधेरा’ पाठकों के समक्ष आता है — और यह मात्र शीर्षक नहीं, समय के असमंजस और व्यग्रता की सार्थक पहचान है।
यह संग्रह न केवल आज के जटिल यथार्थ से टकराने की हिम्मत दिखाता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि कवि अपने समय, समाज और सन्नाटे के विरुद्ध खड़ा है — शब्दों के माध्यम से, संवेदनाओं की तीव्रता के साथ।
समय के आईने में कविता की उजास
‘असमय का अंधेरा’ शीर्षक ही मानो किसी मौन त्रासदी का उद्घोष करता है। कवि कहते हैं:
"बहुत कचोटता है यह असमय का / दिन का अंधेरा।"
यह दिन में पसरा अंधकार केवल रूपक नहीं, आज के सामाजिक परिदृश्य की विडंबना है। कवि यह कहकर केवल स्थिति नहीं दर्शाता, बल्कि अपनी पीड़ा, चिंता और जागरूकता को भी स्वर देता है।
धूमिल की प्रसिद्ध पंक्ति “कविता घेराव में बौखलाए हुए आदमी का संक्षिप्त एकालाप है” को खंडित करते हुए, सुरेश गुप्ता संवाद की मुद्रा में कविता रचते हैं। वे मानते हैं कि कविता केवल आत्मकेंद्रित गुंजार नहीं, सामाजिक व संवेदनशील संवाद है।
प्रेम, स्मृति और मानवीय संबंधों की परतें
संग्रह की कविताओं में प्रेम के कई रूप हैं — आत्मीय, अस्वीकारा गया, साझा, जिद्दी और पारस्परिक। कवि लिखते हैं:
"प्रेम किस्मत को नहीं मानता।"
यह प्रेम केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि उसमें ‘हम’ की सामूहिकता है। कविता एकांत की तलाश करती है, पर वह समाज-विमुख नहीं।
पारिवारिक बंधनों की छवियां — माँ, पिता, बेटा, सभी गहरे आत्मीय भावों के साथ मौजूद हैं। पिता से जुड़ी कविताएं कुर्सी, आईना जैसे प्रतीकों के माध्यम से स्मृति की गहराइयों में ले जाती हैं। मनु के बहाने वह छूटे हुए समय की धूल को फिर से झाड़ते हैं।
खिलचीपुर कविता में केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि समूचे भारत के छोटे कस्बों की सामूहिक स्मृति मौजूद है। वहां गाड़गंगा बहती है, कोरोना की त्रासदी भी है, और साथ ही मित्रता की जीवंत ऊर्जा भी— महेन्द्र गगन और मनोज पाठक को समर्पित कविताएं इस आत्मीय दुनिया को और गहराई देती हैं।
कविता का दायित्व और चेतनशीलता
कवि की दृष्टि केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक रूप से भी सजग है। वह लिखते हैं:
"कविता जिसे कोई पढ़ना नहीं चाहता / चाहती है युद्ध में शांति / शांति में समरसता।"
यह कविता की नैतिक ज़िम्मेदारी का साक्ष्य है, जहाँ कविता केवल सौंदर्य नहीं, एक हस्तक्षेप है। वह असत्य के बरक्स सत्य, हिंसा के बरक्स शांति और अंधकार के बरक्स उजाले की कामना करती है — ठीक उसी परंपरा में जैसे कायसिन कुलियेव की कविताएं करती हैं।
और जब कवि लिखता है—
“जो डर रहे हैं / अपने खिलाफ / आवाज़ उठने के डर से”,
तो यह एक साहसी, सजग और गहन रूप से राजनीतिक कवि की पहचान है।
यह पंक्तियाँ मुक्तिबोध की अमर पंक्ति “पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?” की अनुगूंज हैं — और सुरेश गुप्ता का उत्तर उनकी कविता में साफ झलकता है।
भाषा, शिल्प और आत्मविश्वास
संग्रह की भाषा सरल, आत्मीय और प्रभावशाली है। वहाँ न तो बौद्धिक छलावे हैं, न दुरूह प्रतीकों की भरमार। कवि संवाद करता है — पाठक से, अपने समय से और स्वयं से।
“कविता तुम्हें उजाड़ेगी नहीं / और सिकोड़ेगी भी नहीं।”
यह कविता के आत्मिक स्पेस का सूचक है — एक ऐसा स्थान जो पाठक को अपनाता है, उसका भार कम करता है और उसे दिशा भी देता है।
एक सधी हुई शुरुआत, एक प्रामाणिक स्वर
‘असमय का अंधेरा’ कवि सुरेश गुप्ता की रचनात्मक यात्रा का पहला मुकाम है, पर यह शुरुआत परिपक्वता, आत्मविश्वास और कलात्मक ईमानदारी से भरी हुई है। यह संग्रह कविता को फिर से प्रासंगिक, जागरूक और संवेदनशील बनाता है।
यह केवल कवि के लिए नहीं, पाठकों और समूचे कवितालोक के लिए एक स्वागतयोग्य दस्तावेज़ है।
पुस्तक विवरण:
नाम: असमय का अंधेरा
कवि: सुरेश गुप्ता
प्रकाशक: प्रथमेश प्रिंटर्स, भोपाल
मूल्य: ₹100/-
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