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वक़्त के आईने में अमिट मित्रता: लॉ कॉलेज से लेकर जीवन की संध्या तक की भावुक कहानी
Special News BY Devendra Patel
कुछ रिश्ते समय की धूल से कभी धुंधले नहीं होते, बल्कि वर्षों बीत जाने के बाद भी वे उसी चमक और गर्मजोशी के साथ सामने आते हैं, जैसे कल की ही बात हो।
ऐसा ही एक मार्मिक और प्रेरणादायक दृश्य हाल ही में भोपाल में देखने को मिला, जब लॉ कॉलेज के तीन पुराने सहपाठी— राजकुमार जैन, असदुल्लाह पाशा और विकास कुमार जैन —लगभग छः दशक बाद एक बार फिर आमने-सामने आए।
कक्षा से कोर्टरूम तक का प्रेरणादायक सफर
तीनों मित्रों की मुलाकात का आरंभिक पड़ाव था — लॉ कॉलेज। जहां साथ पढ़ते हुए न केवल कानून की किताबें साझा कीं, बल्कि हंसी, जज़्बात और सपनों की दुनिया भी एक-दूसरे के साथ बांटी। कॉलेज के दिनों की वही अनकही भावनाएं, वही बेपरवाह मुस्कानें और वही दिल से निकली मित्रता—समय के किसी कोने में गुम नहीं हुईं, बल्कि एक अमूल्य धरोहर बनकर जीवित रहीं।

असदुल्लाह पाशा, जो आज हैदराबाद के एक प्रतिष्ठित वरिष्ठ अधिवक्ता हैं, अपने चार पीढ़ियों पुराने वकालत कार्यालय को संभाल रहे हैं। गौरव की बात यह है कि उनके इसी कार्यालय से दो प्रमुख हाईकोर्ट मुख्य न्यायाधीश बन चुके हैं, जो उनकी कानूनी सेवा और विद्वता का प्रमाण हैं।
वहीं विकास कुमार जैन ने मध्य प्रदेश न्यायिक सेवा में दीर्घकालीन सेवाएं दीं और अंततः जिला न्यायाधीश के पद से सम्मानपूर्वक सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने न्यायपालिका में अपनी सादगी, ईमानदारी और कठोर परिश्रम से एक अलग पहचान बनाई।
राजकुमार जैन ने भी लंबे समय तक सिरोंज में वकालत कर आमजन की सेवा की और अब भोपाल में वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में सक्रिय हैं। वे अपने स्नेही स्वभाव और सामाजिक सहभागिता के लिए जाने जाते हैं।
जब यादें फिर से जीवंत हुईं
समय की धारा तीनों को अलग-अलग दिशाओं में बहा ले गई थी, परंतु दिलों के तार कभी टूटे नहीं। दस-बीस वर्षों के लंबे अंतराल के बाद जब ये तीनों मित्र भोपाल में एक साथ मिले, तो ऐसा लगा जैसे कोई समय यात्रा हो रही हो। इस मिलन के लिए राजकुमार जैन ने विशेष लंच का आयोजन किया।
इस आत्मीय आयोजन में न्यायमूर्ति अभय गोयल, कई वरिष्ठ पत्रकार, और सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी भी शामिल हुए। पुराने दिनों की हंसी-मजाक, किस्से-कहानियां, कॉलेज के किस्से और जीवन की गहराई से जुड़ी बातें एक बार फिर उसी गर्मजोशी के साथ दोहराई गईं।

वक़्त थम-सा गया...
जिस मिलन की तैयारी हफ्तों से चल रही थी, वह कुछ घंटों में कैसे समाप्त हो गया, किसी को अहसास ही नहीं हुआ। तीन-चार घंटे ऐसे बीते जैसे कोई पलकों की झपक। इन घंटों में न कोई औपचारिकता रही, न कोई संकोच। सिर्फ दोस्ती की गहराई, उम्र की परिपक्वता और रिश्तों की मिठास का संगम देखने को मिला।
किसी ने ठीक ही कहा है—"कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जो मिलते नहीं, बस जुड़ जाते हैं।" इस मिलन ने यह सिद्ध कर दिया कि सच्ची मित्रता न समय की मोहताज होती है, न दूरी की।
यह कहानी सिर्फ तीन मित्रों की मुलाकात की नहीं है, बल्कि यह उन सभी के लिए प्रेरणा है जो जीवन की आपाधापी में अपने पुराने दोस्तों से दूर हो चुके हैं। शायद यह लेख उन्हें भी प्रेरित कर दे, एक कॉल करने के लिए... या कोई पुराना रिश्ता फिर से जी लेने के लिए।
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वक़्त के आईने में अमिट मित्रता: लॉ कॉलेज से लेकर जीवन की संध्या तक की भावुक कहानी
Special News BY Devendra Patel
ऐसा ही एक मार्मिक और प्रेरणादायक दृश्य हाल ही में भोपाल में देखने को मिला, जब लॉ कॉलेज के तीन पुराने सहपाठी— राजकुमार जैन, असदुल्लाह पाशा और विकास कुमार जैन —लगभग छः दशक बाद एक बार फिर आमने-सामने आए।
कक्षा से कोर्टरूम तक का प्रेरणादायक सफर
तीनों मित्रों की मुलाकात का आरंभिक पड़ाव था — लॉ कॉलेज। जहां साथ पढ़ते हुए न केवल कानून की किताबें साझा कीं, बल्कि हंसी, जज़्बात और सपनों की दुनिया भी एक-दूसरे के साथ बांटी। कॉलेज के दिनों की वही अनकही भावनाएं, वही बेपरवाह मुस्कानें और वही दिल से निकली मित्रता—समय के किसी कोने में गुम नहीं हुईं, बल्कि एक अमूल्य धरोहर बनकर जीवित रहीं।

असदुल्लाह पाशा, जो आज हैदराबाद के एक प्रतिष्ठित वरिष्ठ अधिवक्ता हैं, अपने चार पीढ़ियों पुराने वकालत कार्यालय को संभाल रहे हैं। गौरव की बात यह है कि उनके इसी कार्यालय से दो प्रमुख हाईकोर्ट मुख्य न्यायाधीश बन चुके हैं, जो उनकी कानूनी सेवा और विद्वता का प्रमाण हैं।
वहीं विकास कुमार जैन ने मध्य प्रदेश न्यायिक सेवा में दीर्घकालीन सेवाएं दीं और अंततः जिला न्यायाधीश के पद से सम्मानपूर्वक सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने न्यायपालिका में अपनी सादगी, ईमानदारी और कठोर परिश्रम से एक अलग पहचान बनाई।
राजकुमार जैन ने भी लंबे समय तक सिरोंज में वकालत कर आमजन की सेवा की और अब भोपाल में वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में सक्रिय हैं। वे अपने स्नेही स्वभाव और सामाजिक सहभागिता के लिए जाने जाते हैं।
जब यादें फिर से जीवंत हुईं
समय की धारा तीनों को अलग-अलग दिशाओं में बहा ले गई थी, परंतु दिलों के तार कभी टूटे नहीं। दस-बीस वर्षों के लंबे अंतराल के बाद जब ये तीनों मित्र भोपाल में एक साथ मिले, तो ऐसा लगा जैसे कोई समय यात्रा हो रही हो। इस मिलन के लिए राजकुमार जैन ने विशेष लंच का आयोजन किया।
इस आत्मीय आयोजन में न्यायमूर्ति अभय गोयल, कई वरिष्ठ पत्रकार, और सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी भी शामिल हुए। पुराने दिनों की हंसी-मजाक, किस्से-कहानियां, कॉलेज के किस्से और जीवन की गहराई से जुड़ी बातें एक बार फिर उसी गर्मजोशी के साथ दोहराई गईं।

वक़्त थम-सा गया...
जिस मिलन की तैयारी हफ्तों से चल रही थी, वह कुछ घंटों में कैसे समाप्त हो गया, किसी को अहसास ही नहीं हुआ। तीन-चार घंटे ऐसे बीते जैसे कोई पलकों की झपक। इन घंटों में न कोई औपचारिकता रही, न कोई संकोच। सिर्फ दोस्ती की गहराई, उम्र की परिपक्वता और रिश्तों की मिठास का संगम देखने को मिला।
किसी ने ठीक ही कहा है—"कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जो मिलते नहीं, बस जुड़ जाते हैं।" इस मिलन ने यह सिद्ध कर दिया कि सच्ची मित्रता न समय की मोहताज होती है, न दूरी की।
यह कहानी सिर्फ तीन मित्रों की मुलाकात की नहीं है, बल्कि यह उन सभी के लिए प्रेरणा है जो जीवन की आपाधापी में अपने पुराने दोस्तों से दूर हो चुके हैं। शायद यह लेख उन्हें भी प्रेरित कर दे, एक कॉल करने के लिए... या कोई पुराना रिश्ता फिर से जी लेने के लिए।
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