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छत्तीसगढ़ में ‘मोर गांव-मोर पानी’ से जल संरक्षण को रफ्तार, 6.60 लाख काम पूरे
छत्तीसगढ़
33 जिलों की 11 हजार से ज्यादा ग्राम पंचायतें अभियान से जुड़ीं, मनरेगा के जरिए 6.08 लाख से अधिक कार्य; गांवों में वर्षा जल सहेजने के साथ रोजगार और जनभागीदारी पर जोर
छत्तीसगढ़ के गांवों में पानी बचाने और वर्षा जल को स्थानीय स्तर पर सहेजने के लिए चलाए जा रहे ‘मोर गांव-मोर पानी’ अभियान का दायरा लगातार बढ़ा है। राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार अभियान के तहत अब तक 6 लाख 60 हजार 105 जल संरक्षण से जुड़े काम पूरे किए जा चुके हैं। प्रदेश के सभी 33 जिलों की 11 हजार से ज्यादा ग्राम पंचायतें इस मुहिम से जुड़ी हैं।
पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने इस अभियान की शुरुआत 24 अप्रैल 2025 को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस के अवसर पर की थी। योजना के केंद्र में गांव और वहां रहने वाले लोगों को रखा गया। किस इलाके में किस तरह का जल संरक्षण कार्य ज्यादा जरूरी है, इसका फैसला स्थानीय जरूरत और भौगोलिक स्थिति को देखकर करने पर जोर दिया गया।
‘मोर गांव-मोर पानी’ को केवल सरकारी निर्माण योजना के रूप में लागू करने के बजाय जनभागीदारी आधारित अभियान का रूप दिया गया है। ग्रामीणों को जल संरक्षण के कामों की पहचान, उनकी प्राथमिकता तय करने और क्रियान्वयन से जोड़ने की कोशिश की गई। इससे गांव के लोग विकास कार्यों में सीधे भागीदार बने हैं।
अभियान के तहत बड़े बजट वाली कुछ चुनिंदा परियोजनाओं के बजाय गांव-गांव में छोटे और उपयोगी जल संरक्षण ढांचे तैयार करने पर जोर दिया गया। इसके पीछे सोच यह रही कि स्थानीय स्तर पर वर्षा का पानी रोका जाए और उसे जमीन में पहुंचने का ज्यादा अवसर मिले। मनरेगा को इस अभियान का प्रमुख आधार बनाया गया है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के माध्यम से गांवों में जल संरक्षण से जुड़े लाखों काम कराए गए। इससे पानी बचाने के साथ ग्रामीण परिवारों को स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराने की कोशिश भी हुई।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार पूरे हो चुके 6 लाख 60 हजार 105 कार्यों में सबसे बड़ा हिस्सा मनरेगा का है। अकेले मनरेगा के माध्यम से 6 लाख 8 हजार 909 जल संरक्षण कार्य पूरे किए गए हैं। यानी अभियान के अधिकांश काम ग्रामीण रोजगार योजना से जुड़े संसाधनों और श्रमिकों के जरिए किए गए।
इसके अलावा अलग-अलग सरकारी विभागों के बीच समन्वय बनाकर 51 हजार 196 अतिरिक्त कार्य कराए गए हैं। इसमें संबंधित क्षेत्रों की जरूरत के अनुसार विभागों की योजनाओं और उपलब्ध संसाधनों को जोड़ा गया। इसका उद्देश्य एक ही गांव में अलग-अलग योजनाओं को जल संरक्षण के साझा लक्ष्य के साथ आगे बढ़ाना रहा।
अभियान अब छत्तीसगढ़ के सभी 33 जिलों तक पहुंच चुका है। मैदानी क्षेत्रों से लेकर वनांचल और आदिवासी बहुल इलाकों तक स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार काम किए गए हैं। पानी की जरूरत और उपलब्धता हर क्षेत्र में अलग होने के कारण एक जैसा मॉडल लागू करने के बजाय स्थानीय समाधान पर जोर दिया गया है। प्रदेश की 146 जनपद पंचायतों को भी इस अभियान से जोड़ा गया है। जनपद स्तर पर ग्राम पंचायतों के प्रस्तावों, उपलब्ध संसाधनों और कामों की प्रगति के बीच समन्वय बनाया जा रहा है। इससे कई पंचायतों में जल संरक्षण के छोटे काम एक साथ शुरू किए जा सके।
राज्य की 11 हजार से अधिक ग्राम पंचायतों की भागीदारी इस अभियान का सबसे बड़ा आधार बनी है। गांव के स्तर पर पंचायत प्रतिनिधियों और ग्रामीणों को यह तय करने में शामिल किया गया कि उनके क्षेत्र में पानी रोकने के लिए किस तरह के काम की सबसे ज्यादा जरूरत है। कहीं पुराने तालाबों और जल स्रोतों को सुधारने की जरूरत सामने आई तो कहीं वर्षा जल को बहकर बाहर जाने से रोकने वाले छोटे ढांचों को प्राथमिकता दी गई। खेत और गांव की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए कार्ययोजनाएं तैयार करने की व्यवस्था अपनाई गई।
सरकार ने अभियान में ‘बॉटम-टू-टॉप’ मॉडल पर काम करने का दावा किया है। सामान्य तौर पर बड़ी योजनाएं ऊपर से तय होकर गांवों तक पहुंचती हैं, लेकिन इस मॉडल में जरूरत की पहचान स्थानीय स्तर से शुरू करने पर जोर दिया गया। गांव से मिले प्रस्तावों को आगे की योजना से जोड़ा गया।
इस प्रक्रिया में ग्रामीणों को केवल सरकारी योजना का लाभ लेने वाला व्यक्ति नहीं माना गया। उन्हें योजना तैयार करने और काम की प्राथमिकता तय करने की प्रक्रिया में शामिल किया गया। विभाग का मानना है कि स्थानीय भागीदारी से बनाए गए जल संरक्षण ढांचे की उपयोगिता और देखरेख दोनों बेहतर हो सकती हैं।
अभियान का प्रमुख उद्देश्य बारिश के पानी को ज्यादा से ज्यादा गांव की सीमा के भीतर रोकना है। मानसून के दौरान बड़ी मात्रा में पानी नालों और दूसरे प्राकृतिक रास्तों से बहकर निकल जाता है। छोटे जल संरक्षण ढांचे इस बहाव की गति कम करने और पानी को जमीन में पहुंचाने में मदद कर सकते हैं। वर्षा जल को रोकने से भूजल पुनर्भरण की संभावना भी बढ़ती है। गांवों में पेयजल और सिंचाई के लिए भूजल पर काफी निर्भरता रहती है। गर्मी के महीनों में जलस्तर नीचे जाने पर कई इलाकों में हैंडपंप, कुएं और दूसरे स्रोत प्रभावित होते हैं।
ऐसे क्षेत्रों में स्थानीय जल स्रोतों को मजबूत करने के लिए वर्षा के पानी को सहेजने पर जोर दिया गया है। खेतों के आसपास पानी रोकने से मिट्टी में नमी ज्यादा समय तक बनी रह सकती है। इससे खेती और दूसरी ग्रामीण आजीविका गतिविधियों को भी अप्रत्यक्ष लाभ मिलने की उम्मीद रहती है।
जल संरक्षण को रोजगार से जोड़ना भी अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मनरेगा के तहत कराए गए कार्यों में स्थानीय मजदूरों को काम उपलब्ध कराया गया। इससे ग्रामीणों को गांव में रोजगार मिलने के साथ ऐसी परिसंपत्तियां तैयार हुईं जिनका उपयोग लंबे समय तक किया जा सकता है।
ग्रामीण इलाकों में मनरेगा के माध्यम से बनने वाले जल संरक्षण ढांचे खेती से भी सीधे जुड़े होते हैं। पानी की उपलब्धता बेहतर होने पर किसान एक से ज्यादा फसल लेने की योजना बना सकते हैं। पशुपालन और दूसरे कृषि आधारित कामों के लिए भी स्थानीय जल स्रोत महत्वपूर्ण होते हैं।
अभियान में केवल निर्माण कार्यों पर ध्यान नहीं दिया गया है। जल संरक्षण को लेकर लोगों की सोच और व्यवहार में बदलाव लाने के लिए प्रशिक्षण तथा जागरूकता गतिविधियां भी आयोजित की गई हैं। पंचायत प्रतिनिधियों और स्थानीय लोगों को पानी के सही उपयोग के बारे में जानकारी दी गई। राज्य में अब तक 500 से अधिक प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए जाने की जानकारी दी गई है। इन कार्यक्रमों में जल संरक्षण की जरूरत, गांव स्तर पर योजना तैयार करने और उपलब्ध जल स्रोतों के बेहतर प्रबंधन जैसे विषयों पर चर्चा की गई।
पंचायत प्रतिनिधियों की भूमिका को इसमें महत्वपूर्ण माना गया है। गांव में किस स्थान पर पानी की सबसे ज्यादा समस्या है, कौन सा पुराना जल स्रोत सुधारने की जरूरत है और कहां नया ढांचा उपयोगी हो सकता है, इसकी जानकारी स्थानीय लोगों के पास सबसे ज्यादा होती है। इसी वजह से ग्राम पंचायत स्तर पर स्थानीय जानकारी को तकनीकी योजना से जोड़ने का प्रयास किया गया। पंचायतों के प्रस्तावों के आधार पर कामों को मनरेगा या अन्य विभागीय योजनाओं से स्वीकृति देकर आगे बढ़ाया गया।
जल संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए सामूहिक संकल्प कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार एक लाख से ज्यादा लोगों ने पानी बचाने और जल स्रोतों के संरक्षण का संकल्प लिया है। इसमें ग्रामीण परिवारों के साथ पंचायत प्रतिनिधि और स्थानीय समूह भी शामिल हुए। लोगों को रोजमर्रा की जिंदगी में पानी की बर्बादी रोकने, पुराने जल स्रोतों की देखरेख करने और वर्षा जल को सहेजने के प्रयासों में भाग लेने के लिए प्रेरित किया गया।
अभियान में विभागीय समन्वय को भी महत्वपूर्ण रखा गया है। केवल पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग पर निर्भर रहने के बजाय दूसरे विभागों के संसाधनों और योजनाओं को जल संरक्षण से जोड़ने का प्रयास किया गया। इसी मॉडल के तहत 51 हजार से ज्यादा काम विभिन्न विभागों के सहयोग से पूरे हुए हैं।
कई ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण सीधे खेती से जुड़ा मुद्दा है। बारिश का पैटर्न बदलने या कम समय में ज्यादा वर्षा होने की स्थिति में पानी तेजी से बह जाता है। ऐसे में छोटे जल ढांचे पानी को स्थानीय स्तर पर रोकने में उपयोगी हो सकते हैं। खेतों में नमी लंबे समय तक रहने से सिंचाई की जरूरत कुछ हद तक कम हो सकती है। वहीं भूजल स्तर में सुधार होने पर कुओं और अन्य स्रोतों में पानी की उपलब्धता बढ़ सकती है। इन्हीं कारणों से अभियान में जल संरक्षण को ग्रामीण आजीविका से जोड़कर देखा गया है।
छत्तीसगढ़ के अलग-अलग हिस्सों की भौगोलिक परिस्थितियां भी अलग हैं। बस्तर और सरगुजा जैसे वन क्षेत्र, मध्य छत्तीसगढ़ का मैदानी इलाका और कृषि प्रधान जिले पानी की अलग-अलग चुनौतियों का सामना करते हैं। इसलिए स्थानीय जरूरत के अनुसार काम चुनने की व्यवस्था रखी गई है। अभियान के तहत गांवों में पहले से मौजूद जल संरचनाओं को उपयोगी बनाने पर भी जोर है। पुराने जल स्रोतों की क्षमता बढ़ाने और बारिश का पानी उनके कैचमेंट तक पहुंचाने जैसे काम स्थानीय योजना के आधार पर किए जा सकते हैं।
पंचायत स्तर पर तैयार योजनाओं को मनरेगा से जोड़ने के कारण बड़ी संख्या में कार्य एक साथ शुरू करना संभव हुआ। अब तक पूरे हुए 6 लाख से ज्यादा मनरेगा कार्यों के जरिए ग्रामीण श्रमिकों को रोजगार भी मिला और गांवों में जल संरक्षण की परिसंपत्तियां तैयार हुईं। 24 अप्रैल 2025 को शुरू हुए ‘मोर गांव-मोर पानी’ अभियान के तहत अब तक कुल 6,60,105 कार्य पूरे किए जाने की जानकारी है। इनमें 6,08,909 काम मनरेगा से और 51,196 काम दूसरे विभागों के समन्वय से कराए गए हैं।
अभियान का नेटवर्क प्रदेश के सभी 33 जिलों, 146 जनपद पंचायतों और 11 हजार से अधिक ग्राम पंचायतों तक पहुंच चुका है। इसके साथ 500 से ज्यादा प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं और एक लाख से अधिक लोगों को जल संरक्षण के संकल्प से जोड़ा गया है।
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छत्तीसगढ़ के गांवों में पानी बचाने और वर्षा जल को स्थानीय स्तर पर सहेजने के लिए चलाए जा रहे ‘मोर गांव-मोर पानी’ अभियान का दायरा लगातार बढ़ा है। राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार अभियान के तहत अब तक 6 लाख 60 हजार 105 जल संरक्षण से जुड़े काम पूरे किए जा चुके हैं। प्रदेश के सभी 33 जिलों की 11 हजार से ज्यादा ग्राम पंचायतें इस मुहिम से जुड़ी हैं।
पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने इस अभियान की शुरुआत 24 अप्रैल 2025 को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस के अवसर पर की थी। योजना के केंद्र में गांव और वहां रहने वाले लोगों को रखा गया। किस इलाके में किस तरह का जल संरक्षण कार्य ज्यादा जरूरी है, इसका फैसला स्थानीय जरूरत और भौगोलिक स्थिति को देखकर करने पर जोर दिया गया।
‘मोर गांव-मोर पानी’ को केवल सरकारी निर्माण योजना के रूप में लागू करने के बजाय जनभागीदारी आधारित अभियान का रूप दिया गया है। ग्रामीणों को जल संरक्षण के कामों की पहचान, उनकी प्राथमिकता तय करने और क्रियान्वयन से जोड़ने की कोशिश की गई। इससे गांव के लोग विकास कार्यों में सीधे भागीदार बने हैं।
अभियान के तहत बड़े बजट वाली कुछ चुनिंदा परियोजनाओं के बजाय गांव-गांव में छोटे और उपयोगी जल संरक्षण ढांचे तैयार करने पर जोर दिया गया। इसके पीछे सोच यह रही कि स्थानीय स्तर पर वर्षा का पानी रोका जाए और उसे जमीन में पहुंचने का ज्यादा अवसर मिले। मनरेगा को इस अभियान का प्रमुख आधार बनाया गया है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के माध्यम से गांवों में जल संरक्षण से जुड़े लाखों काम कराए गए। इससे पानी बचाने के साथ ग्रामीण परिवारों को स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराने की कोशिश भी हुई।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार पूरे हो चुके 6 लाख 60 हजार 105 कार्यों में सबसे बड़ा हिस्सा मनरेगा का है। अकेले मनरेगा के माध्यम से 6 लाख 8 हजार 909 जल संरक्षण कार्य पूरे किए गए हैं। यानी अभियान के अधिकांश काम ग्रामीण रोजगार योजना से जुड़े संसाधनों और श्रमिकों के जरिए किए गए।
इसके अलावा अलग-अलग सरकारी विभागों के बीच समन्वय बनाकर 51 हजार 196 अतिरिक्त कार्य कराए गए हैं। इसमें संबंधित क्षेत्रों की जरूरत के अनुसार विभागों की योजनाओं और उपलब्ध संसाधनों को जोड़ा गया। इसका उद्देश्य एक ही गांव में अलग-अलग योजनाओं को जल संरक्षण के साझा लक्ष्य के साथ आगे बढ़ाना रहा।
अभियान अब छत्तीसगढ़ के सभी 33 जिलों तक पहुंच चुका है। मैदानी क्षेत्रों से लेकर वनांचल और आदिवासी बहुल इलाकों तक स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार काम किए गए हैं। पानी की जरूरत और उपलब्धता हर क्षेत्र में अलग होने के कारण एक जैसा मॉडल लागू करने के बजाय स्थानीय समाधान पर जोर दिया गया है। प्रदेश की 146 जनपद पंचायतों को भी इस अभियान से जोड़ा गया है। जनपद स्तर पर ग्राम पंचायतों के प्रस्तावों, उपलब्ध संसाधनों और कामों की प्रगति के बीच समन्वय बनाया जा रहा है। इससे कई पंचायतों में जल संरक्षण के छोटे काम एक साथ शुरू किए जा सके।
राज्य की 11 हजार से अधिक ग्राम पंचायतों की भागीदारी इस अभियान का सबसे बड़ा आधार बनी है। गांव के स्तर पर पंचायत प्रतिनिधियों और ग्रामीणों को यह तय करने में शामिल किया गया कि उनके क्षेत्र में पानी रोकने के लिए किस तरह के काम की सबसे ज्यादा जरूरत है। कहीं पुराने तालाबों और जल स्रोतों को सुधारने की जरूरत सामने आई तो कहीं वर्षा जल को बहकर बाहर जाने से रोकने वाले छोटे ढांचों को प्राथमिकता दी गई। खेत और गांव की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए कार्ययोजनाएं तैयार करने की व्यवस्था अपनाई गई।
सरकार ने अभियान में ‘बॉटम-टू-टॉप’ मॉडल पर काम करने का दावा किया है। सामान्य तौर पर बड़ी योजनाएं ऊपर से तय होकर गांवों तक पहुंचती हैं, लेकिन इस मॉडल में जरूरत की पहचान स्थानीय स्तर से शुरू करने पर जोर दिया गया। गांव से मिले प्रस्तावों को आगे की योजना से जोड़ा गया।
इस प्रक्रिया में ग्रामीणों को केवल सरकारी योजना का लाभ लेने वाला व्यक्ति नहीं माना गया। उन्हें योजना तैयार करने और काम की प्राथमिकता तय करने की प्रक्रिया में शामिल किया गया। विभाग का मानना है कि स्थानीय भागीदारी से बनाए गए जल संरक्षण ढांचे की उपयोगिता और देखरेख दोनों बेहतर हो सकती हैं।
अभियान का प्रमुख उद्देश्य बारिश के पानी को ज्यादा से ज्यादा गांव की सीमा के भीतर रोकना है। मानसून के दौरान बड़ी मात्रा में पानी नालों और दूसरे प्राकृतिक रास्तों से बहकर निकल जाता है। छोटे जल संरक्षण ढांचे इस बहाव की गति कम करने और पानी को जमीन में पहुंचाने में मदद कर सकते हैं। वर्षा जल को रोकने से भूजल पुनर्भरण की संभावना भी बढ़ती है। गांवों में पेयजल और सिंचाई के लिए भूजल पर काफी निर्भरता रहती है। गर्मी के महीनों में जलस्तर नीचे जाने पर कई इलाकों में हैंडपंप, कुएं और दूसरे स्रोत प्रभावित होते हैं।
ऐसे क्षेत्रों में स्थानीय जल स्रोतों को मजबूत करने के लिए वर्षा के पानी को सहेजने पर जोर दिया गया है। खेतों के आसपास पानी रोकने से मिट्टी में नमी ज्यादा समय तक बनी रह सकती है। इससे खेती और दूसरी ग्रामीण आजीविका गतिविधियों को भी अप्रत्यक्ष लाभ मिलने की उम्मीद रहती है।
जल संरक्षण को रोजगार से जोड़ना भी अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मनरेगा के तहत कराए गए कार्यों में स्थानीय मजदूरों को काम उपलब्ध कराया गया। इससे ग्रामीणों को गांव में रोजगार मिलने के साथ ऐसी परिसंपत्तियां तैयार हुईं जिनका उपयोग लंबे समय तक किया जा सकता है।
ग्रामीण इलाकों में मनरेगा के माध्यम से बनने वाले जल संरक्षण ढांचे खेती से भी सीधे जुड़े होते हैं। पानी की उपलब्धता बेहतर होने पर किसान एक से ज्यादा फसल लेने की योजना बना सकते हैं। पशुपालन और दूसरे कृषि आधारित कामों के लिए भी स्थानीय जल स्रोत महत्वपूर्ण होते हैं।
अभियान में केवल निर्माण कार्यों पर ध्यान नहीं दिया गया है। जल संरक्षण को लेकर लोगों की सोच और व्यवहार में बदलाव लाने के लिए प्रशिक्षण तथा जागरूकता गतिविधियां भी आयोजित की गई हैं। पंचायत प्रतिनिधियों और स्थानीय लोगों को पानी के सही उपयोग के बारे में जानकारी दी गई। राज्य में अब तक 500 से अधिक प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए जाने की जानकारी दी गई है। इन कार्यक्रमों में जल संरक्षण की जरूरत, गांव स्तर पर योजना तैयार करने और उपलब्ध जल स्रोतों के बेहतर प्रबंधन जैसे विषयों पर चर्चा की गई।
पंचायत प्रतिनिधियों की भूमिका को इसमें महत्वपूर्ण माना गया है। गांव में किस स्थान पर पानी की सबसे ज्यादा समस्या है, कौन सा पुराना जल स्रोत सुधारने की जरूरत है और कहां नया ढांचा उपयोगी हो सकता है, इसकी जानकारी स्थानीय लोगों के पास सबसे ज्यादा होती है। इसी वजह से ग्राम पंचायत स्तर पर स्थानीय जानकारी को तकनीकी योजना से जोड़ने का प्रयास किया गया। पंचायतों के प्रस्तावों के आधार पर कामों को मनरेगा या अन्य विभागीय योजनाओं से स्वीकृति देकर आगे बढ़ाया गया।
जल संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए सामूहिक संकल्प कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार एक लाख से ज्यादा लोगों ने पानी बचाने और जल स्रोतों के संरक्षण का संकल्प लिया है। इसमें ग्रामीण परिवारों के साथ पंचायत प्रतिनिधि और स्थानीय समूह भी शामिल हुए। लोगों को रोजमर्रा की जिंदगी में पानी की बर्बादी रोकने, पुराने जल स्रोतों की देखरेख करने और वर्षा जल को सहेजने के प्रयासों में भाग लेने के लिए प्रेरित किया गया।
अभियान में विभागीय समन्वय को भी महत्वपूर्ण रखा गया है। केवल पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग पर निर्भर रहने के बजाय दूसरे विभागों के संसाधनों और योजनाओं को जल संरक्षण से जोड़ने का प्रयास किया गया। इसी मॉडल के तहत 51 हजार से ज्यादा काम विभिन्न विभागों के सहयोग से पूरे हुए हैं।
कई ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण सीधे खेती से जुड़ा मुद्दा है। बारिश का पैटर्न बदलने या कम समय में ज्यादा वर्षा होने की स्थिति में पानी तेजी से बह जाता है। ऐसे में छोटे जल ढांचे पानी को स्थानीय स्तर पर रोकने में उपयोगी हो सकते हैं। खेतों में नमी लंबे समय तक रहने से सिंचाई की जरूरत कुछ हद तक कम हो सकती है। वहीं भूजल स्तर में सुधार होने पर कुओं और अन्य स्रोतों में पानी की उपलब्धता बढ़ सकती है। इन्हीं कारणों से अभियान में जल संरक्षण को ग्रामीण आजीविका से जोड़कर देखा गया है।
छत्तीसगढ़ के अलग-अलग हिस्सों की भौगोलिक परिस्थितियां भी अलग हैं। बस्तर और सरगुजा जैसे वन क्षेत्र, मध्य छत्तीसगढ़ का मैदानी इलाका और कृषि प्रधान जिले पानी की अलग-अलग चुनौतियों का सामना करते हैं। इसलिए स्थानीय जरूरत के अनुसार काम चुनने की व्यवस्था रखी गई है। अभियान के तहत गांवों में पहले से मौजूद जल संरचनाओं को उपयोगी बनाने पर भी जोर है। पुराने जल स्रोतों की क्षमता बढ़ाने और बारिश का पानी उनके कैचमेंट तक पहुंचाने जैसे काम स्थानीय योजना के आधार पर किए जा सकते हैं।
पंचायत स्तर पर तैयार योजनाओं को मनरेगा से जोड़ने के कारण बड़ी संख्या में कार्य एक साथ शुरू करना संभव हुआ। अब तक पूरे हुए 6 लाख से ज्यादा मनरेगा कार्यों के जरिए ग्रामीण श्रमिकों को रोजगार भी मिला और गांवों में जल संरक्षण की परिसंपत्तियां तैयार हुईं। 24 अप्रैल 2025 को शुरू हुए ‘मोर गांव-मोर पानी’ अभियान के तहत अब तक कुल 6,60,105 कार्य पूरे किए जाने की जानकारी है। इनमें 6,08,909 काम मनरेगा से और 51,196 काम दूसरे विभागों के समन्वय से कराए गए हैं।
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