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फायर सेफ्टी पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार से पूछा- टेंडर नहीं, जमीन पर कब दिखेगा काम
छत्तीसगढ़
लखनऊ अग्निकांड के बाद छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने फायर सुरक्षा व्यवस्था पर जताई नाराजगी, सरकार से स्टेटस रिपोर्ट मांगी, जिला प्रशासन ने भी जांच अभियान तेज किया।
लखनऊ में हाल ही में हुए भीषण अग्निकांड के बाद देशभर में फायर सेफ्टी व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इसी बीच छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य की अग्निशमन व्यवस्था पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि केवल टेंडर जारी करने या योजनाओं की जानकारी देने से काम नहीं चलेगा। लोगों की सुरक्षा के लिए जमीन पर वास्तविक काम दिखाई देना चाहिए। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से फायर ब्रिगेड के आधुनिक वाहनों और उपकरणों की खरीद से जुड़े सभी टेंडरों की मौजूदा स्थिति पर विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं। अदालत की इस टिप्पणी के बाद प्रशासनिक व्यवस्था भी सक्रिय नजर आने लगी है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि वर्षों से फायर सेफ्टी को मजबूत बनाने की बातें हो रही हैं, लेकिन कई योजनाएं अब भी कागजों तक सीमित दिखाई देती हैं। यदि टेंडर जारी हो चुके हैं तो यह भी बताया जाना चाहिए कि वर्क ऑर्डर कब जारी हुए और काम किस स्तर तक पहुंचा है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े मामलों में अनावश्यक देरी स्वीकार नहीं की जा सकती। दरअसल यह मामला तब चर्चा में आया जब हाल ही में मोपका क्षेत्र में स्थित विद्युत वितरण कंपनी के सब स्टेशन और आसपास की दुकानों में आग लगने की घटना सामने आई। इस घटना के बाद मीडिया रिपोर्टों में राज्य की फायर सुरक्षा व्यवस्था की कमियों को प्रमुखता से उठाया गया। इन्हीं खबरों का संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने स्वतः जनहित याचिका के रूप में सुनवाई शुरू की। अदालत ने राज्य शासन से शपथपत्र के साथ विस्तृत जवाब भी तलब किया है।
सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि राज्य में करीब 72.70 करोड़ रुपये की लागत से आधुनिक फायर ब्रिगेड वाहनों और उपकरणों की खरीद प्रक्रिया जारी है। इसके अलावा 16 नए फायर स्टेशन स्थापित करने की योजना भी बनाई गई है। हालांकि कई जिलों में अब तक फायर स्टेशन के लिए उपयुक्त जमीन उपलब्ध नहीं हो सकी है, जिसके कारण परियोजनाएं आगे नहीं बढ़ पा रही हैं। अदालत ने इस जवाब पर असंतोष जताते हुए कहा कि केवल योजनाओं और टेंडर की जानकारी पर्याप्त नहीं है। आम लोगों को सुरक्षा तभी मिलेगी जब ये परियोजनाएं धरातल पर दिखाई देंगी। सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि वर्ष 2020 में कई नए फायर स्टेशन बनाने की मंजूरी मिल चुकी थी, लेकिन वर्षों बाद भी कई स्थानों पर जमीन का चयन नहीं हो पाया। राज्य के कुछ जिलों में भूमि उपलब्ध करा दी गई है और वहां निर्माण के लिए धनराशि भी जारी की जा चुकी है, जबकि कई अन्य जिलों में अब तक जमीन आवंटन की प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकी है। अदालत ने इस देरी पर भी चिंता जताई और शासन से स्पष्ट समयसीमा बताने को कहा है। हाईकोर्ट की सख्ती के बीच जिला प्रशासन ने भी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बड़ा कदम उठाया है। प्रशासन ने शहर के सभी कोचिंग संस्थानों, मॉल, होटल, व्यावसायिक परिसरों और बहुमंजिला इमारतों की व्यापक जांच कराने के आदेश दिए हैं। इसके लिए जिला स्तर और अनुविभाग स्तर पर अलग-अलग जांच समितियों का गठन किया गया है। प्रत्येक समिति की अध्यक्षता संबंधित एसडीएम करेंगे, जबकि पुलिस, नगर निगम, टाउन एंड कंट्री प्लानिंग और अन्य विभागों के अधिकारी सदस्य के रूप में शामिल रहेंगे।
प्रशासन ने इन समितियों को दस दिन के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए हैं। जांच के दौरान यह देखा जाएगा कि संबंधित संस्थानों में फायर एनओसी है या नहीं, आपातकालीन निकासी मार्ग मौजूद हैं या नहीं और आग लगने की स्थिति में लोगों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त इंतजाम किए गए हैं या नहीं। यदि किसी भवन में गंभीर लापरवाही पाई जाती है तो पहले सुधार के निर्देश दिए जाएंगे और निर्देशों का पालन नहीं होने पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। हाल ही में नगर निगम ने शहर के छह कोचिंग संस्थानों की जांच भी की थी। जांच में एक संस्थान में प्रवेश और निकास के लिए केवल एक ही रास्ता पाया गया, जिसके बाद उसे सील कर दिया गया। अन्य पांच संस्थानों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया है। प्रशासन का कहना है कि आने वाले दिनों में जांच का दायरा और बढ़ाया जाएगा ताकि किसी भी संस्थान में सुरक्षा मानकों की अनदेखी न हो। जांच के दौरान एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया कि संबंधित विभागों के पास शहर में संचालित कोचिंग संस्थानों, मॉल, होटल और बहुमंजिला इमारतों की पूरी और अद्यतन सूची उपलब्ध नहीं है। ऐसे में प्रशासन ने फायर विभाग के रिकॉर्ड और फायर ऑडिट को जांच का मुख्य आधार बनाने का फैसला किया है। जिन संस्थानों ने अब तक फायर एनओसी नहीं ली है या जिनका फायर ऑडिट लंबित है, वहां विशेष रूप से निरीक्षण किया जाएगा। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि अग्नि सुरक्षा से जुड़े मामलों में केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है। आम लोगों की जान की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए और सरकार को इसके लिए प्रभावी कदम उठाने होंगे। मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई 2026 को होगी, जब राज्य सरकार को फायर उपकरणों की खरीद, नए फायर स्टेशन निर्माण और अन्य लंबित कार्यों की अद्यतन स्टेटस रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश करनी होगी।
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फायर सेफ्टी पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार से पूछा- टेंडर नहीं, जमीन पर कब दिखेगा काम
छत्तीसगढ़
लखनऊ में हाल ही में हुए भीषण अग्निकांड के बाद देशभर में फायर सेफ्टी व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इसी बीच छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य की अग्निशमन व्यवस्था पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि केवल टेंडर जारी करने या योजनाओं की जानकारी देने से काम नहीं चलेगा। लोगों की सुरक्षा के लिए जमीन पर वास्तविक काम दिखाई देना चाहिए। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से फायर ब्रिगेड के आधुनिक वाहनों और उपकरणों की खरीद से जुड़े सभी टेंडरों की मौजूदा स्थिति पर विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं। अदालत की इस टिप्पणी के बाद प्रशासनिक व्यवस्था भी सक्रिय नजर आने लगी है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि वर्षों से फायर सेफ्टी को मजबूत बनाने की बातें हो रही हैं, लेकिन कई योजनाएं अब भी कागजों तक सीमित दिखाई देती हैं। यदि टेंडर जारी हो चुके हैं तो यह भी बताया जाना चाहिए कि वर्क ऑर्डर कब जारी हुए और काम किस स्तर तक पहुंचा है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े मामलों में अनावश्यक देरी स्वीकार नहीं की जा सकती। दरअसल यह मामला तब चर्चा में आया जब हाल ही में मोपका क्षेत्र में स्थित विद्युत वितरण कंपनी के सब स्टेशन और आसपास की दुकानों में आग लगने की घटना सामने आई। इस घटना के बाद मीडिया रिपोर्टों में राज्य की फायर सुरक्षा व्यवस्था की कमियों को प्रमुखता से उठाया गया। इन्हीं खबरों का संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने स्वतः जनहित याचिका के रूप में सुनवाई शुरू की। अदालत ने राज्य शासन से शपथपत्र के साथ विस्तृत जवाब भी तलब किया है।
सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि राज्य में करीब 72.70 करोड़ रुपये की लागत से आधुनिक फायर ब्रिगेड वाहनों और उपकरणों की खरीद प्रक्रिया जारी है। इसके अलावा 16 नए फायर स्टेशन स्थापित करने की योजना भी बनाई गई है। हालांकि कई जिलों में अब तक फायर स्टेशन के लिए उपयुक्त जमीन उपलब्ध नहीं हो सकी है, जिसके कारण परियोजनाएं आगे नहीं बढ़ पा रही हैं। अदालत ने इस जवाब पर असंतोष जताते हुए कहा कि केवल योजनाओं और टेंडर की जानकारी पर्याप्त नहीं है। आम लोगों को सुरक्षा तभी मिलेगी जब ये परियोजनाएं धरातल पर दिखाई देंगी। सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि वर्ष 2020 में कई नए फायर स्टेशन बनाने की मंजूरी मिल चुकी थी, लेकिन वर्षों बाद भी कई स्थानों पर जमीन का चयन नहीं हो पाया। राज्य के कुछ जिलों में भूमि उपलब्ध करा दी गई है और वहां निर्माण के लिए धनराशि भी जारी की जा चुकी है, जबकि कई अन्य जिलों में अब तक जमीन आवंटन की प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकी है। अदालत ने इस देरी पर भी चिंता जताई और शासन से स्पष्ट समयसीमा बताने को कहा है। हाईकोर्ट की सख्ती के बीच जिला प्रशासन ने भी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बड़ा कदम उठाया है। प्रशासन ने शहर के सभी कोचिंग संस्थानों, मॉल, होटल, व्यावसायिक परिसरों और बहुमंजिला इमारतों की व्यापक जांच कराने के आदेश दिए हैं। इसके लिए जिला स्तर और अनुविभाग स्तर पर अलग-अलग जांच समितियों का गठन किया गया है। प्रत्येक समिति की अध्यक्षता संबंधित एसडीएम करेंगे, जबकि पुलिस, नगर निगम, टाउन एंड कंट्री प्लानिंग और अन्य विभागों के अधिकारी सदस्य के रूप में शामिल रहेंगे।
प्रशासन ने इन समितियों को दस दिन के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए हैं। जांच के दौरान यह देखा जाएगा कि संबंधित संस्थानों में फायर एनओसी है या नहीं, आपातकालीन निकासी मार्ग मौजूद हैं या नहीं और आग लगने की स्थिति में लोगों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त इंतजाम किए गए हैं या नहीं। यदि किसी भवन में गंभीर लापरवाही पाई जाती है तो पहले सुधार के निर्देश दिए जाएंगे और निर्देशों का पालन नहीं होने पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। हाल ही में नगर निगम ने शहर के छह कोचिंग संस्थानों की जांच भी की थी। जांच में एक संस्थान में प्रवेश और निकास के लिए केवल एक ही रास्ता पाया गया, जिसके बाद उसे सील कर दिया गया। अन्य पांच संस्थानों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया है। प्रशासन का कहना है कि आने वाले दिनों में जांच का दायरा और बढ़ाया जाएगा ताकि किसी भी संस्थान में सुरक्षा मानकों की अनदेखी न हो। जांच के दौरान एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया कि संबंधित विभागों के पास शहर में संचालित कोचिंग संस्थानों, मॉल, होटल और बहुमंजिला इमारतों की पूरी और अद्यतन सूची उपलब्ध नहीं है। ऐसे में प्रशासन ने फायर विभाग के रिकॉर्ड और फायर ऑडिट को जांच का मुख्य आधार बनाने का फैसला किया है। जिन संस्थानों ने अब तक फायर एनओसी नहीं ली है या जिनका फायर ऑडिट लंबित है, वहां विशेष रूप से निरीक्षण किया जाएगा। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि अग्नि सुरक्षा से जुड़े मामलों में केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है। आम लोगों की जान की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए और सरकार को इसके लिए प्रभावी कदम उठाने होंगे। मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई 2026 को होगी, जब राज्य सरकार को फायर उपकरणों की खरीद, नए फायर स्टेशन निर्माण और अन्य लंबित कार्यों की अद्यतन स्टेटस रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश करनी होगी।
