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सहकारी बैंक में 7.91 लाख का घोटाला: किसान के खाते से फर्जी साइन कर निकाली गई पूरी राशि, जांच के नाम पर चल रही खानापूर्ति
गरियाबंद/देवभोग। CG
राज्य में किसानों की आय दोगुनी करने के दावों के बीच एक गरीब किसान के साथ हुई बैंकिंग धोखाधड़ी ने प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
नवीन शुक्लीभांटा गांव निवासी किसान खेमा पांडे के खाते से फर्जी हस्ताक्षर कर 7.91 लाख रुपये की रकम निकाल ली गई, लेकिन तीन महीने बीत जाने के बाद भी न तो उसे उसकी मेहनत की कमाई वापस मिल पाई और न ही दोषियों पर कोई ठोस कार्रवाई हुई।
31 जनवरी को बेची थी धान, नहीं मिला मेहनत का पैसा
किसान खेमा पांडे ने समर्थन मूल्य पर 255.20 क्विंटल धान की बिक्री की थी। इसकी राशि देवभोग सहकारी बैंक शाखा स्थित उसके खाते में जमा होनी थी, जो 7.91 लाख रुपये थी। हालांकि यह पूरी राशि फर्जी हस्ताक्षर और गोहरापदर ब्रांच की मिलीभगत से निकाली जा चुकी थी।
फर्जीवाड़े की पुष्टि, फिर भी कार्रवाई ठंडी
देवभोग शाखा ने प्रारंभिक जांच में फर्जीवाड़े की पुष्टि कर 12 अप्रैल को हेड ऑफिस को रिपोर्ट सौंप दी थी। रिपोर्ट में साफ कहा गया कि:
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खेमा पांडे का खाता देवभोग ब्रांच में था, लेकिन राशि गोहरापदर ब्रांच से निकाली गई।
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विड्रॉल फॉर्म में किया गया हस्ताक्षर किसान के स्पेसिमेन सिग्नेचर से मेल नहीं खा रहा था।
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14 फरवरी से 28 फरवरी के बीच चार ट्रांजैक्शनों में राशि निकाली गई।
इसके बावजूद अब तक न तो पीड़ित किसान को पैसा लौटाया गया और न ही किसी उच्चाधिकारी की जवाबदेही तय की गई है।
कलेक्टर के निर्देश भी हुए नजरअंदाज
किसान ने 29 अप्रैल को कलेक्टर जनदर्शन में अपनी व्यथा रखी थी। कलेक्टर भगवान सिंह उईके ने तत्काल जांच का आदेश भी दिया, लेकिन सहकारिता विभाग ने जांच शुरू करने में भी कोताही बरती। अब किसान की आर्थिक हालत इतनी खराब है कि वह 1.57 लाख रुपये का कर्ज तक नहीं चुका पा रहा और अगली फसल की बुआई भी संकट में है।
सुशासन तिहार में फिर उठाई आवाज, तब जाकर हिली जांच
सुशासन तिहार के दौरान जब किसान ने दोबारा गुहार लगाई तो बैंक ने एक अधिकारी को जांच के लिए भेजा। 28 मई को गरियाबंद से पहुंचे अधिकारी ने संबंधित दोनों ब्रांच मैनेजरों से रिकॉर्ड लेकर पीड़ित का बयान दर्ज किया है।
रफा-दफा की कोशिश: घर जाकर सौदा करने लगे बैंक कर्मचारी
किसान ने अपनी लिखित शिकायत में बताया है कि गोहरापदर ब्रांच के कुछ कर्मचारी उसके घर पहुंचकर 1.5 लाख रुपये में मामला निपटाने का प्रस्ताव दे चुके हैं। यह दर्शाता है कि घोटाले को दबाने की कोशिशें भी लगातार की जा रही हैं।
अन्य किसानों के साथ भी धोखाधड़ी
सिर्फ खेमा पांडे ही नहीं, बल्कि देवभोग ब्रांच के 6 से अधिक खाताधारकों के लगभग 42 लाख रुपये की रकम इसी तरह निकाली गई है। कांडेकेला निवासी नमिता के खाते से 90 हजार रुपये और माहुलकोट के किसान यशवंत मांझी के खाते से 8 हजार रुपये गायब हो गए। परंतु इन मामलों में भी अब तक कोई ठोस जांच नहीं हुई।
हेड ऑफिस की चुप्पी और कार्रवाई के नाम पर दिखावा
घोटाले के बाद बैंक प्रबंधन ने सिर्फ तत्कालीन बैंक मैनेजर नयन सिंह ठाकुर का तबादला कर और क्लर्क सुरेश साहू व अकाउंटेंट दीपराज मसीह को निलंबित कर खानापूर्ति कर दी। किसानों से धोखाधड़ी के इतने बड़े मामले में न तो FIR दर्ज की गई और न ही कोई गिरफ्तारी हुई।
क्या कहते हैं जिम्मेदार?
देवभोग शाखा प्रबंधक अमर सिंह ध्रुव ने माना कि इंटर ब्रांच विड्रॉल गलत था और हस्ताक्षर मेल नहीं खा रहे थे। उन्होंने बताया कि सारी जानकारी हेड ऑफिस भेज दी गई है। वहीं, उपपंजीयक महेश्वरी तिवारी ने कहा कि ऑडिटर की अध्यक्षता में दो सदस्यीय जांच समिति बनाई गई है, जिसकी रिपोर्ट आनी बाकी है।
सवाल उठता है:
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क्या किसानों को उनका हक दिलाने के लिए कलेक्टर स्तर से हस्तक्षेप जरूरी होगा?
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बैंकिंग सिस्टम में ऐसी चूक के बाद भी FIR दर्ज क्यों नहीं हुई?
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सहकारिता विभाग की निष्क्रियता में किसका हाथ है?
यह घटना न केवल सिस्टम की उदासीनता को उजागर करती है, बल्कि यह भी सवाल उठाती है कि क्या हमारे देश में अन्नदाता की मेहनत की कमाई इतनी सस्ती हो गई है?
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सहकारी बैंक में 7.91 लाख का घोटाला: किसान के खाते से फर्जी साइन कर निकाली गई पूरी राशि, जांच के नाम पर चल रही खानापूर्ति
गरियाबंद/देवभोग। CG
नवीन शुक्लीभांटा गांव निवासी किसान खेमा पांडे के खाते से फर्जी हस्ताक्षर कर 7.91 लाख रुपये की रकम निकाल ली गई, लेकिन तीन महीने बीत जाने के बाद भी न तो उसे उसकी मेहनत की कमाई वापस मिल पाई और न ही दोषियों पर कोई ठोस कार्रवाई हुई।
31 जनवरी को बेची थी धान, नहीं मिला मेहनत का पैसा
किसान खेमा पांडे ने समर्थन मूल्य पर 255.20 क्विंटल धान की बिक्री की थी। इसकी राशि देवभोग सहकारी बैंक शाखा स्थित उसके खाते में जमा होनी थी, जो 7.91 लाख रुपये थी। हालांकि यह पूरी राशि फर्जी हस्ताक्षर और गोहरापदर ब्रांच की मिलीभगत से निकाली जा चुकी थी।
फर्जीवाड़े की पुष्टि, फिर भी कार्रवाई ठंडी
देवभोग शाखा ने प्रारंभिक जांच में फर्जीवाड़े की पुष्टि कर 12 अप्रैल को हेड ऑफिस को रिपोर्ट सौंप दी थी। रिपोर्ट में साफ कहा गया कि:
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खेमा पांडे का खाता देवभोग ब्रांच में था, लेकिन राशि गोहरापदर ब्रांच से निकाली गई।
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विड्रॉल फॉर्म में किया गया हस्ताक्षर किसान के स्पेसिमेन सिग्नेचर से मेल नहीं खा रहा था।
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14 फरवरी से 28 फरवरी के बीच चार ट्रांजैक्शनों में राशि निकाली गई।
इसके बावजूद अब तक न तो पीड़ित किसान को पैसा लौटाया गया और न ही किसी उच्चाधिकारी की जवाबदेही तय की गई है।
कलेक्टर के निर्देश भी हुए नजरअंदाज
किसान ने 29 अप्रैल को कलेक्टर जनदर्शन में अपनी व्यथा रखी थी। कलेक्टर भगवान सिंह उईके ने तत्काल जांच का आदेश भी दिया, लेकिन सहकारिता विभाग ने जांच शुरू करने में भी कोताही बरती। अब किसान की आर्थिक हालत इतनी खराब है कि वह 1.57 लाख रुपये का कर्ज तक नहीं चुका पा रहा और अगली फसल की बुआई भी संकट में है।
सुशासन तिहार में फिर उठाई आवाज, तब जाकर हिली जांच
सुशासन तिहार के दौरान जब किसान ने दोबारा गुहार लगाई तो बैंक ने एक अधिकारी को जांच के लिए भेजा। 28 मई को गरियाबंद से पहुंचे अधिकारी ने संबंधित दोनों ब्रांच मैनेजरों से रिकॉर्ड लेकर पीड़ित का बयान दर्ज किया है।
रफा-दफा की कोशिश: घर जाकर सौदा करने लगे बैंक कर्मचारी
किसान ने अपनी लिखित शिकायत में बताया है कि गोहरापदर ब्रांच के कुछ कर्मचारी उसके घर पहुंचकर 1.5 लाख रुपये में मामला निपटाने का प्रस्ताव दे चुके हैं। यह दर्शाता है कि घोटाले को दबाने की कोशिशें भी लगातार की जा रही हैं।
अन्य किसानों के साथ भी धोखाधड़ी
सिर्फ खेमा पांडे ही नहीं, बल्कि देवभोग ब्रांच के 6 से अधिक खाताधारकों के लगभग 42 लाख रुपये की रकम इसी तरह निकाली गई है। कांडेकेला निवासी नमिता के खाते से 90 हजार रुपये और माहुलकोट के किसान यशवंत मांझी के खाते से 8 हजार रुपये गायब हो गए। परंतु इन मामलों में भी अब तक कोई ठोस जांच नहीं हुई।
हेड ऑफिस की चुप्पी और कार्रवाई के नाम पर दिखावा
घोटाले के बाद बैंक प्रबंधन ने सिर्फ तत्कालीन बैंक मैनेजर नयन सिंह ठाकुर का तबादला कर और क्लर्क सुरेश साहू व अकाउंटेंट दीपराज मसीह को निलंबित कर खानापूर्ति कर दी। किसानों से धोखाधड़ी के इतने बड़े मामले में न तो FIR दर्ज की गई और न ही कोई गिरफ्तारी हुई।
क्या कहते हैं जिम्मेदार?
देवभोग शाखा प्रबंधक अमर सिंह ध्रुव ने माना कि इंटर ब्रांच विड्रॉल गलत था और हस्ताक्षर मेल नहीं खा रहे थे। उन्होंने बताया कि सारी जानकारी हेड ऑफिस भेज दी गई है। वहीं, उपपंजीयक महेश्वरी तिवारी ने कहा कि ऑडिटर की अध्यक्षता में दो सदस्यीय जांच समिति बनाई गई है, जिसकी रिपोर्ट आनी बाकी है।
सवाल उठता है:
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क्या किसानों को उनका हक दिलाने के लिए कलेक्टर स्तर से हस्तक्षेप जरूरी होगा?
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बैंकिंग सिस्टम में ऐसी चूक के बाद भी FIR दर्ज क्यों नहीं हुई?
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सहकारिता विभाग की निष्क्रियता में किसका हाथ है?
यह घटना न केवल सिस्टम की उदासीनता को उजागर करती है, बल्कि यह भी सवाल उठाती है कि क्या हमारे देश में अन्नदाता की मेहनत की कमाई इतनी सस्ती हो गई है?
