हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: धमतरी पुलिस हिरासत में हुई मौत पर राज्य सरकार जिम्मेदार ठहराई

Dhamtari,C.G

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने धमतरी जिले में पुलिस हिरासत के दौरान हुई एक आरोपी की मौत पर सख्त रुख अपनाते हुए इसे “कस्टोडियल बर्बरता” करार दिया है।

 कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह घटना राज्य की जिम्मेदारी है और मृतक के परिवार को मुआवजा मिलना चाहिए। अदालत ने आदेश दिया कि मृतक की पत्नी को ₹3 लाख और माता-पिता को ₹1-1 लाख की आर्थिक सहायता दी जाए।

तीन घंटे में हुई मौत, शरीर पर 24 चोटों के निशान

मामला मार्च 2025 का है, जब धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तार 41 वर्षीय दुर्गेंद्र कठौलिया की धमतरी पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी। उन्हें 31 मार्च को शाम 5 बजे मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया था, जहां वे पूरी तरह स्वस्थ थे। लेकिन मात्र तीन घंटे बाद रात 8 बजे उनकी मौत हो गई।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में 24 पूर्व-मृत्यु चोटों का उल्लेख किया गया — जिनमें चेहरे, छाती, जांघ, घुटनों और नाक पर गंभीर निशान शामिल थे। मेडिकल बोर्ड ने मृत्यु का कारण दम घुटना (एस्फिक्सिया) बताया।

पुलिस पर यातना का आरोप, परिवार ने लगाई गुहार

मृतक की पत्नी दुर्गा देवी, मां सुशीला और पिता लक्ष्मण सोनकर ने आरोप लगाया कि पुलिस ने दुर्गेंद्र को थर्ड डिग्री टॉर्चर दिया, जिसके कारण उनकी मौत हुई। परिवार ने न्याय और मुआवजे की मांग को लेकर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

शुरुआत में पुलिस ने परिजनों को बताया था कि आरोपी बीमार हो गया था और अस्पताल में भर्ती है, लेकिन बाद में यह खुलासा हुआ कि उसकी पहले ही मृत्यु हो चुकी थी। शव मिलने पर परिजनों ने थाने में हंगामा किया और उच्च अधिकारियों से शिकायत की।

राज्य की सफाई कोर्ट ने ठुकराई

राज्य सरकार ने अदालत में दलील दी कि आरोपी की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई थी और शरीर पर मौजूद चोटें पुरानी थीं। हालांकि, चीफ जस्टिस रमेश कुमार सिन्हा और जस्टिस बीडी गुरु की डिवीजन बेंच ने राज्य की यह दलील खारिज करते हुए कहा कि “सिर्फ तीन घंटे के भीतर हिरासत में मौत होना असाधारण घटना है। चाहे चोटें साधारण हों या गंभीर, राज्य इससे बच नहीं सकता।”

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

कोर्ट ने कहा कि यह मामला संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार) का सीधा उल्लंघन है। “यह स्पष्ट रूप से कस्टोडियल बर्बरता और पुलिस की अमानवीयता का उदाहरण है,” अदालत ने कहा।
साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के डी.के. बसु बनाम राज्य मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों के पालन की सख्त आवश्यकता पर जोर दिया।

राज्य को आठ हफ्ते में मुआवजा देने का आदेश

हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि राज्य सरकार मृतक की पत्नी को ₹3 लाख और माता-पिता को ₹1-1 लाख की राशि 8 हफ्तों के भीतर अदा करे। यदि समयसीमा में भुगतान नहीं किया गया, तो इस पर 9% वार्षिक ब्याज लगेगा।
कोर्ट ने गृह विभाग के सचिव को व्यक्तिगत रूप से सुनिश्चित करने का आदेश दिया कि मुआवजा समय पर दिया जाए और इस तरह की घटनाएं दोबारा न हों।

मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशीलता की जरूरत

अदालत ने कहा कि इस प्रकार की घटनाएं जनता का पुलिस और शासन से विश्वास डगमगाती हैं। राज्य को अपने पुलिस बल को मानवाधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता के प्रति अधिक संवेदनशील बनाना होगा ताकि भविष्य में कोई व्यक्ति पुलिस हिरासत में अमानवीय यातना का शिकार न बने।

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09 Oct 2025 By दैनिक जागरण

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Dhamtari,C.G

 कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह घटना राज्य की जिम्मेदारी है और मृतक के परिवार को मुआवजा मिलना चाहिए। अदालत ने आदेश दिया कि मृतक की पत्नी को ₹3 लाख और माता-पिता को ₹1-1 लाख की आर्थिक सहायता दी जाए।

तीन घंटे में हुई मौत, शरीर पर 24 चोटों के निशान

मामला मार्च 2025 का है, जब धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तार 41 वर्षीय दुर्गेंद्र कठौलिया की धमतरी पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी। उन्हें 31 मार्च को शाम 5 बजे मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया था, जहां वे पूरी तरह स्वस्थ थे। लेकिन मात्र तीन घंटे बाद रात 8 बजे उनकी मौत हो गई।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में 24 पूर्व-मृत्यु चोटों का उल्लेख किया गया — जिनमें चेहरे, छाती, जांघ, घुटनों और नाक पर गंभीर निशान शामिल थे। मेडिकल बोर्ड ने मृत्यु का कारण दम घुटना (एस्फिक्सिया) बताया।

पुलिस पर यातना का आरोप, परिवार ने लगाई गुहार

मृतक की पत्नी दुर्गा देवी, मां सुशीला और पिता लक्ष्मण सोनकर ने आरोप लगाया कि पुलिस ने दुर्गेंद्र को थर्ड डिग्री टॉर्चर दिया, जिसके कारण उनकी मौत हुई। परिवार ने न्याय और मुआवजे की मांग को लेकर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

शुरुआत में पुलिस ने परिजनों को बताया था कि आरोपी बीमार हो गया था और अस्पताल में भर्ती है, लेकिन बाद में यह खुलासा हुआ कि उसकी पहले ही मृत्यु हो चुकी थी। शव मिलने पर परिजनों ने थाने में हंगामा किया और उच्च अधिकारियों से शिकायत की।

राज्य की सफाई कोर्ट ने ठुकराई

राज्य सरकार ने अदालत में दलील दी कि आरोपी की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई थी और शरीर पर मौजूद चोटें पुरानी थीं। हालांकि, चीफ जस्टिस रमेश कुमार सिन्हा और जस्टिस बीडी गुरु की डिवीजन बेंच ने राज्य की यह दलील खारिज करते हुए कहा कि “सिर्फ तीन घंटे के भीतर हिरासत में मौत होना असाधारण घटना है। चाहे चोटें साधारण हों या गंभीर, राज्य इससे बच नहीं सकता।”

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

कोर्ट ने कहा कि यह मामला संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार) का सीधा उल्लंघन है। “यह स्पष्ट रूप से कस्टोडियल बर्बरता और पुलिस की अमानवीयता का उदाहरण है,” अदालत ने कहा।
साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के डी.के. बसु बनाम राज्य मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों के पालन की सख्त आवश्यकता पर जोर दिया।

राज्य को आठ हफ्ते में मुआवजा देने का आदेश

हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि राज्य सरकार मृतक की पत्नी को ₹3 लाख और माता-पिता को ₹1-1 लाख की राशि 8 हफ्तों के भीतर अदा करे। यदि समयसीमा में भुगतान नहीं किया गया, तो इस पर 9% वार्षिक ब्याज लगेगा।
कोर्ट ने गृह विभाग के सचिव को व्यक्तिगत रूप से सुनिश्चित करने का आदेश दिया कि मुआवजा समय पर दिया जाए और इस तरह की घटनाएं दोबारा न हों।

मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशीलता की जरूरत

अदालत ने कहा कि इस प्रकार की घटनाएं जनता का पुलिस और शासन से विश्वास डगमगाती हैं। राज्य को अपने पुलिस बल को मानवाधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता के प्रति अधिक संवेदनशील बनाना होगा ताकि भविष्य में कोई व्यक्ति पुलिस हिरासत में अमानवीय यातना का शिकार न बने।

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