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बहुमत होने के बाद भी भाजपा की हार और बागी की जीत, सभापति के चुनाव में भाजपा की किरकिरी
Korba, CG
कोरबा नगर पालिका निगम के त्रिकोणीय मुकाबले में नूतन सिंह ठाकुर ने जीत दर्ज की है.
महापौर के बाद नगर पालिक निगम में सबसे महत्वपूर्ण पद सभापति का होता है. पक्ष विपक्ष दोनों ही इस पद को अपने पाले में करने के लिए जोड़ तोड़ कर प्रयासरत थे. 67 पार्षदों वाले नगर पालिक निगम कोरबा में निकाय चुनाव के दौरान भाजपा को लैंडस्लाइड विक्ट्री मिली. महापौर के साथ ही 45 पार्षद विजयी हुए. बहुमत के आधार पर भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी की जीत तय मानी जा रही थी. लेकिन शनिवार को इस चुनाव के दौरान जो हुआ उसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी.
सभापति के चुनाव में बहुमत काम न आया: सभापति का चुनाव लड़ रहे एक बागी ने भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी को पटखनी दे दी और नाटकीय घटनाक्रम में एक बागी ने सभापति का पद अपने नाम कर लिया. नतीजे आते ही भाजपा की जमकर किरकिरी हुई. यह बात खुल चुकी थी कि संगठन ने जिस पार्षद का नाम सभापति के लिए तय किया था. उसे नकारते हुए क्रॉस वोटिंग हुई और इसका नुकसान भाजपा को झेलना पड़ा. सभापति चुनाव के लिए बीजेपी की ओर से पुरंदर मिश्रा को पर्यवेक्षक बनाया गया था. परिणाम आते ही सबसे पहले मिश्रा को मौके से तत्काल रवाना होना पड़ा.
त्रिकोणीय मुकाबले में हुई नूतन की जीत: नगर निगम में कुल 67 पार्षद हैं. यही 67 पार्षद और 1 महापौर मिलकर सभापति को चुनते हैं. जो आने वाले 5 सालों तक निगम की सभाओं की अध्यक्षता करते हैं. निकाय चुनाव के बाद 67 में से 45 पार्षद बीजेपी के जीत कर आए थे, जबकि 11-11 पार्षद कांग्रेस और निर्दलीय हैं.

कुल तीन लोगों ने भरा था नामांकन: शनिवार को सभापति पद के निर्वाचन के लिए कुल तीन लोगों ने नामांकन भरा था. भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी हितानंद अग्रवाल दूसरे भाजपा से ही बगावत करने वाले नूतन सिंह ठाकुर और तीसरे एक निर्दलीय पार्षद अब्दुल रहमान ने यह चुनाव लड़ा. सभी 67 पार्षदों सहित महापौर ने मतदान किया. कुल 68 वोट पड़े, जिसमें से एकमात्र वोट रिजेक्ट हुआ. जब परिणाम आए तो सभी चौंक गए. भाजपा से बगावत कर पार्षद नूतन सिंह ठाकुर ने 33 वोट प्राप्त कर सभापति का चुनाव जीत लिया. जबकि दूसरे नंबर पर भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी हितानंद रहे जिन्हें 18 वोट मिले. तीसरे नंबर पर निर्दलीय पार्षद अब्दुल रहमान रहे, जिन्हें 16 वोट मिले.
संगठन की जमकर हुई किरकिरी: इस चुनाव के परिणाम आने के बाद यह बात सबके सामने है कि संगठन ने जिसका नाम तय किया था, निगम के निर्वाचित भाजपा पार्षदों ने उसे नकार दिया और एक बागी प्रत्याशी को विजेता बना दिया. सदैव अनुशासन की बात करने वाले बीजेपी में संगठन की बात को नकारे जाने से भाजपा की जमकर किरकिरी हुई.
उद्योग मंत्री लखन लाल देवांगन ने कहा है कि भाजपा ने हितानंद अग्रवाल को अपना अधिकृत प्रत्याशी बनाया था. सबकी सहमति और राय मशवरे के बाद ही हितानंद का नाम फाइनल हुआ था. लेकिन बाद में पार्षदों ने आपस में नूतन का नाम तय कर लिया और उसे जीतवा दिया. हालांकि नूतन भी भाजपाई हैं. उन्हें भी मैं बधाई देता हूं. नगर निगम कोरबा में महापौर भाजपा के हैं. सभापति भी भाजपा के ही होंगे. हालांकि जिसे हमने तय किया था, उसकी जीत नहीं हुई है. जिसका नाम पार्षदों ने तय कर लिया, जिसे जितवा दिया, अब हमें भी उसे स्वीकार करना ही पड़ेगा.
दरअसल सभापति पद के लिए भाजपा में कई उम्मीदवार थे. पूर्व जिलाध्यक्ष अशोक चावलानी का नाम पार्षद का चुनाव जीतने के बाद सबसे आगे चल रहा था. उद्योग मंत्री लखन लाल देवांगन के भाई नरेंद्र देवांगन निर्विरोध पार्षद बन गए थे. वह भी सभापति बनने के लिए कतार में थे. इस तरह से कई दिग्गज पार्षद सभापति का पद प्राप्त करने के लिए मैदान में बने हुए थे. लेकिन अंत में भाजपा के अंदर की गुटबाजी और आपसी झगड़े के कारण एक बागी ने बाजी मार ली. सभापति पद को लेकर आपस के मतभेद और गुटबाजी की चर्चा कई दिनों से शहर में चल रही थी. यही कारण था कि एक निर्दलीय पार्षद ने भी चुनाव लड़ा और 16 वोट प्राप्त कर लिए.
''छत्तीसगढ़ महतारी के आदेश पर चुनाव लड़ा'': पार्टी से बगावत कर चुनाव लड़ने वाले नूतन सिंह ठाकुर ने कहा कि पार्टी ने मुझे अधिकृत प्रत्याशी नहीं बनाया था. मुझे किसी ने भी चुनाव लड़ने को कहा भी नहीं था. छत्तीसगढ़ महतारी ने मुझे आदेश दिया कि तुम चुनाव लड़ो. मैंने चुनाव लड़ा. सभी का समर्थन मुझे मिला और मुझे जीत मिली है. हालांकि मेरा बैकग्राउंड भाजपा का है. आगे भी मैं भाजपा के प्रति समर्पित रहूंगा. निगम में पहले जो काम नियम से नहीं होते थे. वह अब नियम से होंगे, निगम को हम बेहतर तरीके से चलाएंगे.

पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के सामने है सारी बात : सभापति पद के लिए बीजेपी की ओर से अधिकृत किए गए प्रत्याशी हितानंद अग्रवाल ने हार के बाद कहा कि पर्यवेक्षक ने सभी पार्षदों की बैठक ली थी. जो आज ही नहीं तीन-चार दिन पहले भी आए थे. सर्व सम्मति से मेरा नाम तय किया गया था. पार्टी के आदेश पर ही मैंने सभापति पद के लिए नामांकन भरा था. लेकिन कहीं ना कहीं चूक हुई, मुझे कम वोट मिले. भाजपा में ऐसा होता नहीं है. अब तक तो भाजपा एक अनुशासित पार्टी रही है. संगठन ने जो आदेश कर दिया, उसे सभी पार्टी कार्यकर्ता शिरोधार्य करके चलते हैं. आज जो हुआ है, वह पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के समक्ष है. वही आगे तय करेंगे.

बागी के चुनाव जीतने और उनके विरुद्ध कार्यवाही के प्रश्न पर हितानंद ने कहा कि इसका निर्णय पार्टी के वरिष्ठ नेता लेंगे. मैंने पार्टी के आदेश का पालन किया है. पार्टी ने यदि मुझसे पहले कह दिया होता तो मैं नामांकन ही नहीं भरता, चुनाव नहीं लड़ता.
भाजपा के आधे पार्षदों ने भी नहीं दिया अपने प्रत्याशी को वोट : 67 पार्षद और एक महापौर को मिलाकर निगम में सभापति के लिए कुल 68 वोट डाले जाने थे. बीजेपी के 45 पार्षद और एक वोट महापौर का भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी को मिलने की उम्मीद थी. इस लिहाज से संगठन के आदेश पर 46 वोट बीजेपी की प्रत्याशी को मिलना चाहिए था. लेकिन आपस का झगड़ा और मतभेद इस कदर हावी था कि भाजपा प्रत्याशी को सिर्फ 18 वोट मिले. भाजपा के आधे वोट भी उनके खुद के अधिकृत प्रत्याशी को नहीं मिल पाए. पार्टी के नेता अब यह गुणा भाग भी लगा रहे हैं कि इतने बड़े पैमाने पर क्रॉस वोटिंग कैसे हुई?
एक नाम पर सहमति नहीं बनने के कारण टीपी नगर स्थित भाजपा कार्यालय में सुबह 9:00 बजे ही सभी पार्षदों को बुलाया गया था. कुछ समय के लिए नाराज पार्षदों ने धरना भी दिया, लेकिन मान मनौव्वल के बाद अंतत: सभी वोट डालने नगर निगम के सभाकक्ष पहुंचे थे.
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बहुमत होने के बाद भी भाजपा की हार और बागी की जीत, सभापति के चुनाव में भाजपा की किरकिरी
Korba, CG
महापौर के बाद नगर पालिक निगम में सबसे महत्वपूर्ण पद सभापति का होता है. पक्ष विपक्ष दोनों ही इस पद को अपने पाले में करने के लिए जोड़ तोड़ कर प्रयासरत थे. 67 पार्षदों वाले नगर पालिक निगम कोरबा में निकाय चुनाव के दौरान भाजपा को लैंडस्लाइड विक्ट्री मिली. महापौर के साथ ही 45 पार्षद विजयी हुए. बहुमत के आधार पर भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी की जीत तय मानी जा रही थी. लेकिन शनिवार को इस चुनाव के दौरान जो हुआ उसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी.
सभापति के चुनाव में बहुमत काम न आया: सभापति का चुनाव लड़ रहे एक बागी ने भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी को पटखनी दे दी और नाटकीय घटनाक्रम में एक बागी ने सभापति का पद अपने नाम कर लिया. नतीजे आते ही भाजपा की जमकर किरकिरी हुई. यह बात खुल चुकी थी कि संगठन ने जिस पार्षद का नाम सभापति के लिए तय किया था. उसे नकारते हुए क्रॉस वोटिंग हुई और इसका नुकसान भाजपा को झेलना पड़ा. सभापति चुनाव के लिए बीजेपी की ओर से पुरंदर मिश्रा को पर्यवेक्षक बनाया गया था. परिणाम आते ही सबसे पहले मिश्रा को मौके से तत्काल रवाना होना पड़ा.
त्रिकोणीय मुकाबले में हुई नूतन की जीत: नगर निगम में कुल 67 पार्षद हैं. यही 67 पार्षद और 1 महापौर मिलकर सभापति को चुनते हैं. जो आने वाले 5 सालों तक निगम की सभाओं की अध्यक्षता करते हैं. निकाय चुनाव के बाद 67 में से 45 पार्षद बीजेपी के जीत कर आए थे, जबकि 11-11 पार्षद कांग्रेस और निर्दलीय हैं.

कुल तीन लोगों ने भरा था नामांकन: शनिवार को सभापति पद के निर्वाचन के लिए कुल तीन लोगों ने नामांकन भरा था. भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी हितानंद अग्रवाल दूसरे भाजपा से ही बगावत करने वाले नूतन सिंह ठाकुर और तीसरे एक निर्दलीय पार्षद अब्दुल रहमान ने यह चुनाव लड़ा. सभी 67 पार्षदों सहित महापौर ने मतदान किया. कुल 68 वोट पड़े, जिसमें से एकमात्र वोट रिजेक्ट हुआ. जब परिणाम आए तो सभी चौंक गए. भाजपा से बगावत कर पार्षद नूतन सिंह ठाकुर ने 33 वोट प्राप्त कर सभापति का चुनाव जीत लिया. जबकि दूसरे नंबर पर भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी हितानंद रहे जिन्हें 18 वोट मिले. तीसरे नंबर पर निर्दलीय पार्षद अब्दुल रहमान रहे, जिन्हें 16 वोट मिले.
संगठन की जमकर हुई किरकिरी: इस चुनाव के परिणाम आने के बाद यह बात सबके सामने है कि संगठन ने जिसका नाम तय किया था, निगम के निर्वाचित भाजपा पार्षदों ने उसे नकार दिया और एक बागी प्रत्याशी को विजेता बना दिया. सदैव अनुशासन की बात करने वाले बीजेपी में संगठन की बात को नकारे जाने से भाजपा की जमकर किरकिरी हुई.
उद्योग मंत्री लखन लाल देवांगन ने कहा है कि भाजपा ने हितानंद अग्रवाल को अपना अधिकृत प्रत्याशी बनाया था. सबकी सहमति और राय मशवरे के बाद ही हितानंद का नाम फाइनल हुआ था. लेकिन बाद में पार्षदों ने आपस में नूतन का नाम तय कर लिया और उसे जीतवा दिया. हालांकि नूतन भी भाजपाई हैं. उन्हें भी मैं बधाई देता हूं. नगर निगम कोरबा में महापौर भाजपा के हैं. सभापति भी भाजपा के ही होंगे. हालांकि जिसे हमने तय किया था, उसकी जीत नहीं हुई है. जिसका नाम पार्षदों ने तय कर लिया, जिसे जितवा दिया, अब हमें भी उसे स्वीकार करना ही पड़ेगा.
दरअसल सभापति पद के लिए भाजपा में कई उम्मीदवार थे. पूर्व जिलाध्यक्ष अशोक चावलानी का नाम पार्षद का चुनाव जीतने के बाद सबसे आगे चल रहा था. उद्योग मंत्री लखन लाल देवांगन के भाई नरेंद्र देवांगन निर्विरोध पार्षद बन गए थे. वह भी सभापति बनने के लिए कतार में थे. इस तरह से कई दिग्गज पार्षद सभापति का पद प्राप्त करने के लिए मैदान में बने हुए थे. लेकिन अंत में भाजपा के अंदर की गुटबाजी और आपसी झगड़े के कारण एक बागी ने बाजी मार ली. सभापति पद को लेकर आपस के मतभेद और गुटबाजी की चर्चा कई दिनों से शहर में चल रही थी. यही कारण था कि एक निर्दलीय पार्षद ने भी चुनाव लड़ा और 16 वोट प्राप्त कर लिए.
''छत्तीसगढ़ महतारी के आदेश पर चुनाव लड़ा'': पार्टी से बगावत कर चुनाव लड़ने वाले नूतन सिंह ठाकुर ने कहा कि पार्टी ने मुझे अधिकृत प्रत्याशी नहीं बनाया था. मुझे किसी ने भी चुनाव लड़ने को कहा भी नहीं था. छत्तीसगढ़ महतारी ने मुझे आदेश दिया कि तुम चुनाव लड़ो. मैंने चुनाव लड़ा. सभी का समर्थन मुझे मिला और मुझे जीत मिली है. हालांकि मेरा बैकग्राउंड भाजपा का है. आगे भी मैं भाजपा के प्रति समर्पित रहूंगा. निगम में पहले जो काम नियम से नहीं होते थे. वह अब नियम से होंगे, निगम को हम बेहतर तरीके से चलाएंगे.

पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के सामने है सारी बात : सभापति पद के लिए बीजेपी की ओर से अधिकृत किए गए प्रत्याशी हितानंद अग्रवाल ने हार के बाद कहा कि पर्यवेक्षक ने सभी पार्षदों की बैठक ली थी. जो आज ही नहीं तीन-चार दिन पहले भी आए थे. सर्व सम्मति से मेरा नाम तय किया गया था. पार्टी के आदेश पर ही मैंने सभापति पद के लिए नामांकन भरा था. लेकिन कहीं ना कहीं चूक हुई, मुझे कम वोट मिले. भाजपा में ऐसा होता नहीं है. अब तक तो भाजपा एक अनुशासित पार्टी रही है. संगठन ने जो आदेश कर दिया, उसे सभी पार्टी कार्यकर्ता शिरोधार्य करके चलते हैं. आज जो हुआ है, वह पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के समक्ष है. वही आगे तय करेंगे.

बागी के चुनाव जीतने और उनके विरुद्ध कार्यवाही के प्रश्न पर हितानंद ने कहा कि इसका निर्णय पार्टी के वरिष्ठ नेता लेंगे. मैंने पार्टी के आदेश का पालन किया है. पार्टी ने यदि मुझसे पहले कह दिया होता तो मैं नामांकन ही नहीं भरता, चुनाव नहीं लड़ता.
भाजपा के आधे पार्षदों ने भी नहीं दिया अपने प्रत्याशी को वोट : 67 पार्षद और एक महापौर को मिलाकर निगम में सभापति के लिए कुल 68 वोट डाले जाने थे. बीजेपी के 45 पार्षद और एक वोट महापौर का भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी को मिलने की उम्मीद थी. इस लिहाज से संगठन के आदेश पर 46 वोट बीजेपी की प्रत्याशी को मिलना चाहिए था. लेकिन आपस का झगड़ा और मतभेद इस कदर हावी था कि भाजपा प्रत्याशी को सिर्फ 18 वोट मिले. भाजपा के आधे वोट भी उनके खुद के अधिकृत प्रत्याशी को नहीं मिल पाए. पार्टी के नेता अब यह गुणा भाग भी लगा रहे हैं कि इतने बड़े पैमाने पर क्रॉस वोटिंग कैसे हुई?
एक नाम पर सहमति नहीं बनने के कारण टीपी नगर स्थित भाजपा कार्यालय में सुबह 9:00 बजे ही सभी पार्षदों को बुलाया गया था. कुछ समय के लिए नाराज पार्षदों ने धरना भी दिया, लेकिन मान मनौव्वल के बाद अंतत: सभी वोट डालने नगर निगम के सभाकक्ष पहुंचे थे.
