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बिलासपुर में फर्जी ED अफसर बनकर 6.82 लाख की ठगी, पति-पत्नी पर केस
बिलासपुर (छ.ग.)
सिम्स में कैंटीन का ठेका और दो युवकों को ED में नौकरी दिलाने का दिया भरोसा, बैंक और नकद में लिए रुपए; रकम वापस नहीं मिलने पर पीड़ित पहुंचा थाने
खुद को प्रवर्तन निदेशालय यानी ED से जुड़ा प्रभावशाली अधिकारी बताकर एक परिवार से लाखों रुपए लेने का मामला सामने आया है। आरोप है कि सिम्स अस्पताल में कैंटीन का ठेका दिलाने और दो युवकों को ED में नौकरी लगवाने का भरोसा देकर अलग-अलग किस्तों में कुल 6 लाख 82 हजार रुपए लिए गए। लंबे समय तक न ठेका मिला और न नौकरी लगी तो पीड़ित परिवार ने पुलिस से शिकायत की।
मामले में कोतवाली पुलिस ने शिकायत के आधार पर राहुल मिश्रा और उसकी पत्नी पदमा जनार्दन के खिलाफ धोखाधड़ी का केस दर्ज किया है। पुलिस अब आरोपों से जुड़े बैंक ट्रांजैक्शन, नकद भुगतान और अन्य दस्तावेजों की जांच कर रही है। यह भी पता लगाया जा रहा है कि आरोपियों ने इसी तरीके से किसी और व्यक्ति से भी रकम तो नहीं ली।
पुलिस से मिली जानकारी के मुताबिक शिकायतकर्ता देवेन्द्र ठक्कर रेलवे महाराष्ट्र मंडल, टिकरापारा क्षेत्र के रहने वाले हैं। उनकी मुलाकात सिम्स अस्पताल में राहुल मिश्रा और उसकी पत्नी पदमा जनार्दन से हुई थी। आरोपी दंपती के ठठारी, जिला जांजगीर-चांपा का निवासी होने की जानकारी पुलिस को दी गई है।
शिकायत में बताया गया है कि शुरुआती मुलाकात के बाद दोनों पक्षों के बीच बातचीत बढ़ी। इसी दौरान राहुल ने कथित तौर पर खुद को ED का अधिकारी बताया। उसने अपने प्रभाव और संपर्कों का जिक्र कर शिकायतकर्ता का भरोसा जीतने की कोशिश की।
आरोप है कि राहुल ने दावा किया कि उसकी सरकारी विभागों में अच्छी पहुंच है और वह अपने संपर्कों के जरिए बड़े काम आसानी से करा सकता है। इसी बातचीत के दौरान सिम्स अस्पताल और कोनी क्षेत्र में कैंटीन का ठेका दिलाने की बात सामने आई। शिकायतकर्ता को भरोसा दिलाया गया कि प्रक्रिया पूरी कर उसे कैंटीन संचालन का काम दिलाया जा सकता है।
पीड़ित के मुताबिक केवल कैंटीन ठेका ही नहीं, बल्कि सरकारी नौकरी दिलाने की बात भी कही गई। राहुल ने कथित तौर पर देवेन्द्र के बेटे और उसके एक दोस्त को प्रवर्तन निदेशालय में नौकरी दिलाने का भरोसा दिया। सरकारी विभाग का नाम और अधिकारी होने का दावा किए जाने के कारण परिवार ने उसकी बातों पर विश्वास कर लिया।
शिकायत में आरोप है कि कैंटीन का ठेका और नौकरी की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के नाम पर पैसे मांगे गए। रकम एक बार में न लेकर अलग-अलग समय पर किस्तों में ली गई। कुछ भुगतान बैंक खातों के माध्यम से किए गए, जबकि कुछ रकम नकद देने की बात शिकायत में कही गई है।
अलग-अलग भुगतान को जोड़ने पर कुल रकम 6 लाख 82 हजार रुपए बताई गई है। पीड़ित का आरोप है कि हर बार पैसा लेते समय काम जल्द पूरा होने का भरोसा दिया जाता रहा। कभी ठेका प्रक्रिया आगे बढ़ने की बात कही गई तो कभी नौकरी से जुड़ी औपचारिकता पूरी होने का दावा किया गया।
समय गुजरने के बावजूद जब कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया तो परिवार को शक होने लगा। सिम्स अस्पताल में कैंटीन का ठेका नहीं मिला। दूसरी तरफ जिन दो युवकों को ED में नौकरी दिलाने की बात कही गई थी, उनकी नियुक्ति भी नहीं हुई।
इसके बाद शिकायतकर्ता ने कथित ED अधिकारी से काम की वास्तविक स्थिति पूछनी शुरू की। आरोप है कि शुरुआत में अलग-अलग कारण बताकर समय मांगा गया। परिवार ने जब नियुक्ति और कैंटीन ठेके से जुड़े आधिकारिक दस्तावेज मांगे तो कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
काफी समय तक इंतजार करने के बाद देवेन्द्र ठक्कर ने दिए गए पैसे वापस मांगने शुरू किए। शिकायत के अनुसार शुरुआत में रकम लौटाने का भरोसा दिया गया, लेकिन पूरा पैसा वापस नहीं किया गया। इसके बाद परिवार ने पुलिस में शिकायत करने की बात कही और रकम वापस करने का दबाव बनाया।
पुलिस कार्रवाई की बात सामने आने पर कुछ रकम लौटाए जाने का दावा किया गया है। पीड़ित के मुताबिक कई बार मांग करने और दबाव बनाने के बाद कुल राशि का एक बड़ा हिस्सा वापस मिला, लेकिन पूरी रकम नहीं लौटाई गई। शिकायतकर्ता का कहना है कि अभी भी करीब 1 लाख 62 हजार रुपए आरोपियों के पास बाकी हैं। लगातार रकम मांगने के बावजूद जब शेष पैसा नहीं मिला तो उन्होंने पुलिस के पास जाने का फैसला किया। शनिवार को कोतवाली थाने पहुंचकर पूरे घटनाक्रम की लिखित शिकायत दी गई।
पुलिस ने शिकायत में दिए गए तथ्यों और शुरुआती जानकारी के आधार पर राहुल मिश्रा और उसकी पत्नी पदमा जनार्दन के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया है। दोनों की कथित भूमिका की अलग-अलग जांच की जा रही है। पैसे किन खातों में जमा हुए और उनका आगे क्या इस्तेमाल हुआ, यह भी जांच का हिस्सा है।
मामले में बैंक ट्रांजैक्शन महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकते हैं। शिकायतकर्ता की ओर से जिन खातों में रकम ट्रांसफर किए जाने की जानकारी दी गई है, उनके लेनदेन का रिकॉर्ड पुलिस जुटा सकती है। भुगतान की तारीख और रकम का मिलान शिकायत में दिए गए घटनाक्रम से किया जाएगा। नकद में दिए गए पैसों को लेकर भी साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं। यह देखा जाएगा कि रकम देते समय कोई व्यक्ति मौजूद था या भुगतान से संबंधित कोई मैसेज, रसीद अथवा डिजिटल बातचीत उपलब्ध है। मोबाइल चैट और कॉल रिकॉर्ड भी जांच में शामिल किए जा सकते हैं।
पुलिस के सामने सबसे अहम सवाल राहुल के कथित ED अधिकारी होने के दावे को लेकर है। यह सत्यापित किया जा रहा है कि उसका प्रवर्तन निदेशालय से वास्तव में कोई संबंध है या उसने केवल सरकारी अधिकारी बनकर शिकायतकर्ता का भरोसा हासिल किया। अगर जांच में यह सामने आता है कि उसने जानबूझकर ED अधिकारी होने की झूठी पहचान बताई थी, तो इससे मामले में दूसरे कानूनी पहलुओं की भी जांच हो सकती है। पुलिस यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि उसने अपनी पहचान साबित करने के लिए कोई फर्जी दस्तावेज, परिचय पत्र या दूसरी सामग्री दिखाई थी या नहीं।
सिम्स अस्पताल में कैंटीन का ठेका दिलाने के दावे की भी जांच की जा रही है। सरकारी या सार्वजनिक संस्थान में कैंटीन संचालन के लिए आम तौर पर निर्धारित प्रक्रिया होती है। पुलिस यह देख सकती है कि आरोपी ने शिकायतकर्ता को किसी वास्तविक टेंडर प्रक्रिया की जानकारी दी थी या केवल प्रभाव के आधार पर ठेका दिलाने का भरोसा दिया था। इसी तरह ED में नौकरी दिलाने के कथित दावे से जुड़े दस्तावेज भी जांच के दायरे में आ सकते हैं। शिकायतकर्ता के बेटे और दूसरे युवक से नौकरी के लिए कौन-कौन से कागजात लिए गए, क्या कोई आवेदन भरवाया गया और नियुक्ति के नाम पर कोई पत्र दिया गया था, इसकी जानकारी जुटाई जा रही है।
सरकारी नौकरी दिलाने के नाम पर रकम लेने के आरोप को पुलिस गंभीरता से देख रही है। जांच में यह भी पता लगाया जाएगा कि पैसे किस मद में मांगे गए थे। क्या भर्ती प्रक्रिया, दस्तावेज सत्यापन या किसी अधिकारी तक रकम पहुंचाने जैसी कोई वजह बताई गई थी, इसे शिकायतकर्ता के बयान से स्पष्ट किया जाएगा। आरोपी की पत्नी पदमा जनार्दन की भूमिका भी जांच में है। शिकायत में पति-पत्नी दोनों पर मिलकर रकम लेने का आरोप लगाया गया है। पुलिस यह देख रही है कि भुगतान में पत्नी के बैंक खाते का इस्तेमाल हुआ या वह पैसे मांगने और काम दिलाने के कथित आश्वासन में शामिल थी।
दोनों पक्षों के बीच हुई बातचीत के मोबाइल रिकॉर्ड भी मामले की दिशा तय कर सकते हैं। पैसे मांगने, काम होने का भरोसा देने और रकम वापस करने से जुड़े मैसेज अगर उपलब्ध हुए तो उन्हें जांच में शामिल किया जा सकता है।
शिकायतकर्ता की ओर से दिए गए दस्तावेजों का सत्यापन किया जा रहा है। बैंक स्टेटमेंट में दिखने वाले लेनदेन को आरोपी पक्ष के खातों से मिलाया जाएगा। जिन तारीखों पर भुगतान हुआ, उसके आसपास हुई कॉल और बातचीत का रिकॉर्ड भी देखा जा सकता है। पुलिस यह भी जांच सकती है कि आरोपियों के खिलाफ पहले किसी दूसरे थाने या जिले में इसी तरह की शिकायत दर्ज हुई है या नहीं। अगर सरकारी नौकरी, ठेका या प्रभावशाली अधिकारी होने का दावा कर दूसरे लोगों से भी पैसे लेने की शिकायत मिलती है तो जांच का दायरा बढ़ सकता है।
मामले में शिकायतकर्ता और उसके परिवार के सदस्यों के बयान दर्ज किए जा सकते हैं। नौकरी का भरोसा जिन दो युवकों को दिया गया था, उनसे भी जानकारी ली जा सकती है। उनसे पूछा जाएगा कि आरोपी ने नौकरी को लेकर क्या दावा किया और किस आधार पर पैसे मांगे गए थे। सिम्स अस्पताल से संबंधित कैंटीन ठेके की वास्तविक प्रक्रिया और उपलब्ध रिकॉर्ड की जानकारी भी जुटाई जा सकती है। इससे यह साफ होगा कि संबंधित अवधि में कोई ठेका प्रक्रिया चल रही थी या नहीं और आरोपी का उससे किसी तरह का संबंध था या नहीं।
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बिलासपुर (छ.ग.)
खुद को प्रवर्तन निदेशालय यानी ED से जुड़ा प्रभावशाली अधिकारी बताकर एक परिवार से लाखों रुपए लेने का मामला सामने आया है। आरोप है कि सिम्स अस्पताल में कैंटीन का ठेका दिलाने और दो युवकों को ED में नौकरी लगवाने का भरोसा देकर अलग-अलग किस्तों में कुल 6 लाख 82 हजार रुपए लिए गए। लंबे समय तक न ठेका मिला और न नौकरी लगी तो पीड़ित परिवार ने पुलिस से शिकायत की।
मामले में कोतवाली पुलिस ने शिकायत के आधार पर राहुल मिश्रा और उसकी पत्नी पदमा जनार्दन के खिलाफ धोखाधड़ी का केस दर्ज किया है। पुलिस अब आरोपों से जुड़े बैंक ट्रांजैक्शन, नकद भुगतान और अन्य दस्तावेजों की जांच कर रही है। यह भी पता लगाया जा रहा है कि आरोपियों ने इसी तरीके से किसी और व्यक्ति से भी रकम तो नहीं ली।
पुलिस से मिली जानकारी के मुताबिक शिकायतकर्ता देवेन्द्र ठक्कर रेलवे महाराष्ट्र मंडल, टिकरापारा क्षेत्र के रहने वाले हैं। उनकी मुलाकात सिम्स अस्पताल में राहुल मिश्रा और उसकी पत्नी पदमा जनार्दन से हुई थी। आरोपी दंपती के ठठारी, जिला जांजगीर-चांपा का निवासी होने की जानकारी पुलिस को दी गई है।
शिकायत में बताया गया है कि शुरुआती मुलाकात के बाद दोनों पक्षों के बीच बातचीत बढ़ी। इसी दौरान राहुल ने कथित तौर पर खुद को ED का अधिकारी बताया। उसने अपने प्रभाव और संपर्कों का जिक्र कर शिकायतकर्ता का भरोसा जीतने की कोशिश की।
आरोप है कि राहुल ने दावा किया कि उसकी सरकारी विभागों में अच्छी पहुंच है और वह अपने संपर्कों के जरिए बड़े काम आसानी से करा सकता है। इसी बातचीत के दौरान सिम्स अस्पताल और कोनी क्षेत्र में कैंटीन का ठेका दिलाने की बात सामने आई। शिकायतकर्ता को भरोसा दिलाया गया कि प्रक्रिया पूरी कर उसे कैंटीन संचालन का काम दिलाया जा सकता है।
पीड़ित के मुताबिक केवल कैंटीन ठेका ही नहीं, बल्कि सरकारी नौकरी दिलाने की बात भी कही गई। राहुल ने कथित तौर पर देवेन्द्र के बेटे और उसके एक दोस्त को प्रवर्तन निदेशालय में नौकरी दिलाने का भरोसा दिया। सरकारी विभाग का नाम और अधिकारी होने का दावा किए जाने के कारण परिवार ने उसकी बातों पर विश्वास कर लिया।
शिकायत में आरोप है कि कैंटीन का ठेका और नौकरी की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के नाम पर पैसे मांगे गए। रकम एक बार में न लेकर अलग-अलग समय पर किस्तों में ली गई। कुछ भुगतान बैंक खातों के माध्यम से किए गए, जबकि कुछ रकम नकद देने की बात शिकायत में कही गई है।
अलग-अलग भुगतान को जोड़ने पर कुल रकम 6 लाख 82 हजार रुपए बताई गई है। पीड़ित का आरोप है कि हर बार पैसा लेते समय काम जल्द पूरा होने का भरोसा दिया जाता रहा। कभी ठेका प्रक्रिया आगे बढ़ने की बात कही गई तो कभी नौकरी से जुड़ी औपचारिकता पूरी होने का दावा किया गया।
समय गुजरने के बावजूद जब कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया तो परिवार को शक होने लगा। सिम्स अस्पताल में कैंटीन का ठेका नहीं मिला। दूसरी तरफ जिन दो युवकों को ED में नौकरी दिलाने की बात कही गई थी, उनकी नियुक्ति भी नहीं हुई।
इसके बाद शिकायतकर्ता ने कथित ED अधिकारी से काम की वास्तविक स्थिति पूछनी शुरू की। आरोप है कि शुरुआत में अलग-अलग कारण बताकर समय मांगा गया। परिवार ने जब नियुक्ति और कैंटीन ठेके से जुड़े आधिकारिक दस्तावेज मांगे तो कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
काफी समय तक इंतजार करने के बाद देवेन्द्र ठक्कर ने दिए गए पैसे वापस मांगने शुरू किए। शिकायत के अनुसार शुरुआत में रकम लौटाने का भरोसा दिया गया, लेकिन पूरा पैसा वापस नहीं किया गया। इसके बाद परिवार ने पुलिस में शिकायत करने की बात कही और रकम वापस करने का दबाव बनाया।
पुलिस कार्रवाई की बात सामने आने पर कुछ रकम लौटाए जाने का दावा किया गया है। पीड़ित के मुताबिक कई बार मांग करने और दबाव बनाने के बाद कुल राशि का एक बड़ा हिस्सा वापस मिला, लेकिन पूरी रकम नहीं लौटाई गई। शिकायतकर्ता का कहना है कि अभी भी करीब 1 लाख 62 हजार रुपए आरोपियों के पास बाकी हैं। लगातार रकम मांगने के बावजूद जब शेष पैसा नहीं मिला तो उन्होंने पुलिस के पास जाने का फैसला किया। शनिवार को कोतवाली थाने पहुंचकर पूरे घटनाक्रम की लिखित शिकायत दी गई।
पुलिस ने शिकायत में दिए गए तथ्यों और शुरुआती जानकारी के आधार पर राहुल मिश्रा और उसकी पत्नी पदमा जनार्दन के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया है। दोनों की कथित भूमिका की अलग-अलग जांच की जा रही है। पैसे किन खातों में जमा हुए और उनका आगे क्या इस्तेमाल हुआ, यह भी जांच का हिस्सा है।
मामले में बैंक ट्रांजैक्शन महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकते हैं। शिकायतकर्ता की ओर से जिन खातों में रकम ट्रांसफर किए जाने की जानकारी दी गई है, उनके लेनदेन का रिकॉर्ड पुलिस जुटा सकती है। भुगतान की तारीख और रकम का मिलान शिकायत में दिए गए घटनाक्रम से किया जाएगा। नकद में दिए गए पैसों को लेकर भी साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं। यह देखा जाएगा कि रकम देते समय कोई व्यक्ति मौजूद था या भुगतान से संबंधित कोई मैसेज, रसीद अथवा डिजिटल बातचीत उपलब्ध है। मोबाइल चैट और कॉल रिकॉर्ड भी जांच में शामिल किए जा सकते हैं।
पुलिस के सामने सबसे अहम सवाल राहुल के कथित ED अधिकारी होने के दावे को लेकर है। यह सत्यापित किया जा रहा है कि उसका प्रवर्तन निदेशालय से वास्तव में कोई संबंध है या उसने केवल सरकारी अधिकारी बनकर शिकायतकर्ता का भरोसा हासिल किया। अगर जांच में यह सामने आता है कि उसने जानबूझकर ED अधिकारी होने की झूठी पहचान बताई थी, तो इससे मामले में दूसरे कानूनी पहलुओं की भी जांच हो सकती है। पुलिस यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि उसने अपनी पहचान साबित करने के लिए कोई फर्जी दस्तावेज, परिचय पत्र या दूसरी सामग्री दिखाई थी या नहीं।
सिम्स अस्पताल में कैंटीन का ठेका दिलाने के दावे की भी जांच की जा रही है। सरकारी या सार्वजनिक संस्थान में कैंटीन संचालन के लिए आम तौर पर निर्धारित प्रक्रिया होती है। पुलिस यह देख सकती है कि आरोपी ने शिकायतकर्ता को किसी वास्तविक टेंडर प्रक्रिया की जानकारी दी थी या केवल प्रभाव के आधार पर ठेका दिलाने का भरोसा दिया था। इसी तरह ED में नौकरी दिलाने के कथित दावे से जुड़े दस्तावेज भी जांच के दायरे में आ सकते हैं। शिकायतकर्ता के बेटे और दूसरे युवक से नौकरी के लिए कौन-कौन से कागजात लिए गए, क्या कोई आवेदन भरवाया गया और नियुक्ति के नाम पर कोई पत्र दिया गया था, इसकी जानकारी जुटाई जा रही है।
सरकारी नौकरी दिलाने के नाम पर रकम लेने के आरोप को पुलिस गंभीरता से देख रही है। जांच में यह भी पता लगाया जाएगा कि पैसे किस मद में मांगे गए थे। क्या भर्ती प्रक्रिया, दस्तावेज सत्यापन या किसी अधिकारी तक रकम पहुंचाने जैसी कोई वजह बताई गई थी, इसे शिकायतकर्ता के बयान से स्पष्ट किया जाएगा। आरोपी की पत्नी पदमा जनार्दन की भूमिका भी जांच में है। शिकायत में पति-पत्नी दोनों पर मिलकर रकम लेने का आरोप लगाया गया है। पुलिस यह देख रही है कि भुगतान में पत्नी के बैंक खाते का इस्तेमाल हुआ या वह पैसे मांगने और काम दिलाने के कथित आश्वासन में शामिल थी।
दोनों पक्षों के बीच हुई बातचीत के मोबाइल रिकॉर्ड भी मामले की दिशा तय कर सकते हैं। पैसे मांगने, काम होने का भरोसा देने और रकम वापस करने से जुड़े मैसेज अगर उपलब्ध हुए तो उन्हें जांच में शामिल किया जा सकता है।
शिकायतकर्ता की ओर से दिए गए दस्तावेजों का सत्यापन किया जा रहा है। बैंक स्टेटमेंट में दिखने वाले लेनदेन को आरोपी पक्ष के खातों से मिलाया जाएगा। जिन तारीखों पर भुगतान हुआ, उसके आसपास हुई कॉल और बातचीत का रिकॉर्ड भी देखा जा सकता है। पुलिस यह भी जांच सकती है कि आरोपियों के खिलाफ पहले किसी दूसरे थाने या जिले में इसी तरह की शिकायत दर्ज हुई है या नहीं। अगर सरकारी नौकरी, ठेका या प्रभावशाली अधिकारी होने का दावा कर दूसरे लोगों से भी पैसे लेने की शिकायत मिलती है तो जांच का दायरा बढ़ सकता है।
मामले में शिकायतकर्ता और उसके परिवार के सदस्यों के बयान दर्ज किए जा सकते हैं। नौकरी का भरोसा जिन दो युवकों को दिया गया था, उनसे भी जानकारी ली जा सकती है। उनसे पूछा जाएगा कि आरोपी ने नौकरी को लेकर क्या दावा किया और किस आधार पर पैसे मांगे गए थे। सिम्स अस्पताल से संबंधित कैंटीन ठेके की वास्तविक प्रक्रिया और उपलब्ध रिकॉर्ड की जानकारी भी जुटाई जा सकती है। इससे यह साफ होगा कि संबंधित अवधि में कोई ठेका प्रक्रिया चल रही थी या नहीं और आरोपी का उससे किसी तरह का संबंध था या नहीं।
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