दंतेश्वरी मंदिर में 9 दिन पहले शुरू होती है महाशिवरात्रि की अनूठी परंपरा, नए देवी जन्म का मनाया जाता है उत्सव

Dantewada,CG

दंतेवाड़ा के दंतेश्वरी मंदिर में महाशिवरात्रि पर शिव पार्वती के साथ ही देवी देवताओं का विवाह भी संपन्न किया जाता है.

महाशिवरात्रि का पर्व दंतेश्वरी मंदिर में विशेष रूप से मनाया जाता है. दंतेश्वरी मंदिर के ठीक सामने स्थित पांडव मंदिर में ये अनुष्ठान पूरा होता है. यहां महाशिवरात्रि का त्योहार 9 दिन पहले ही शुरू हो जाता है. 9 दिन पहले शाम के समय पांडव मंदिर में पूजा विधान शुरू होता है. जिसमें बारह लंकवार (बारह समाज प्रमुख) पूजा कार्य संपन्न करते हैं. बारह लंकवार में समरथ, नाईक, कतियार, पण्डाल, बोड़का, कुम्हार, सेठिया, गायता, मादरी, बगड़ीत, चालकी, पुजारी होते हैं. पांडव मंदिर में पंडाल परिवार का व्यक्ति पुजारी का काम करता है.

दंतेश्वरी मंदिर में महाशिवरात्रि का पर्व: महाशिवरात्रि से पहले बारह लंकवार सदस्य, बाजा वादक और ग्रामीण सबसे पहले कलश स्थापना पूजा करते हैं. इसके बाद पूरे कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए पूजा अनुष्ठान किया जाता है. इस पूजा में आसपास के ग्रामीण क्षेत्र से सिरहा (बैगा) भी अपनी उपस्थिति देते हैं. पूजा होने के बाद सिरहा के ऊपर उनकी कुलदेवी का वास होता हैं. जिससे वह मोहरी बाजा की थाप पर नाचते झूमते हैं. यह प्रक्रिया हर रोज की जाती है, सिरहा के नृत्य का समय लगातार बढ़ता जाता है.

महाशिवरात्रि से एक दिन पहले यानी अनुष्ठान शुरू होने के आठवें दिन पांडव मंदिर के सामने सेमर पेड़ (कांटा वाला पेड़) की शाखाओं से मचान बनाया जाता है. इसी दिन आधी रात को यहां बड़े जगार का आयोजन होता है. जिसमें विशेष फूलों (आम, चार, कनेर, हजारी आदि) से पूजा अनुष्ठान किया जाता है. रात को मोहरी बाजा की थाप पर सिरहा मंदिर परिसर और कंटीले शाखाओं से बने मचान पर खाली पांव नाचते झूमते हैं. इसके बाद दंतेश्वरी मंदिर और भुवनेश्वरी मंदिर में सात प्रकार की पूजा की जाती है.

सिरहा को पुजारी मारते हैं कोड़ा: पूजा के बाद पुजारी सभी सिरहा को कोड़ा मारने की परंपरा निभाते हैं. जिसके बाद सिरहा से दैवीय शक्ति समाप्त हो जाती है. इस पूजा के बाद महाशिवरात्रि के दिन दोपहर में पांडव मंदिर में मेला का आयोजन होता है. जिसमें सिरहा, दंतेश्वरी मंदिर के मुख्य पुजारी को पांडव मंदिर में आमंत्रित करते हैं. इसके बाद दंतेश्वरी मंदिर में पूजा की जाती है. इस दौरान पुराने सिरहा (बैगा )मोहरी बाजा की थाप पर नृत्य करते हैं और नए सिरहा को विवाह रस्म के अनुसार हल्दी तेल लगाते हैं. इसके बाद पांडव मंदिर के पुजारी, दंतेश्वरी मंदिर के पुजारी, 12 लंकवार के प्रमुख सदस्य नए सिरहा को कोड़ा मारते हैं और पुराने सिरहा सदस्यों के साथ शामिल किया जाता है.

महाशिवरात्रि पर नए देवी जन्म का उत्सव: इसके अलावा हर तीन साल में एक बार महाशिवरात्रि के दौरान नए देवी जन्म का उत्सव मनाया जाता है. जिसमें सभी सिरहा दो भागों में बंटकर ग्राम गीदम एवं ग्राम करंजेनार की पहाड़ी से दैवीय शक्ति से चुनी हुई दैवीय प्रतीक बांस उखाड़कर लाते हैं. जिसे मंदिर के पुजारी, बारह लंकवार सदस्य हल्दी तेल लगाकर विवाह की रस्म पूरी करते हैं. इन प्रतीकों से मन्नत मांगे जाने पर हर मन्नत पूरी होने की मान्यता है.

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26 Feb 2025 By दैनिक जागरण

दंतेश्वरी मंदिर में 9 दिन पहले शुरू होती है महाशिवरात्रि की अनूठी परंपरा, नए देवी जन्म का मनाया जाता है उत्सव

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महाशिवरात्रि का पर्व दंतेश्वरी मंदिर में विशेष रूप से मनाया जाता है. दंतेश्वरी मंदिर के ठीक सामने स्थित पांडव मंदिर में ये अनुष्ठान पूरा होता है. यहां महाशिवरात्रि का त्योहार 9 दिन पहले ही शुरू हो जाता है. 9 दिन पहले शाम के समय पांडव मंदिर में पूजा विधान शुरू होता है. जिसमें बारह लंकवार (बारह समाज प्रमुख) पूजा कार्य संपन्न करते हैं. बारह लंकवार में समरथ, नाईक, कतियार, पण्डाल, बोड़का, कुम्हार, सेठिया, गायता, मादरी, बगड़ीत, चालकी, पुजारी होते हैं. पांडव मंदिर में पंडाल परिवार का व्यक्ति पुजारी का काम करता है.

दंतेश्वरी मंदिर में महाशिवरात्रि का पर्व: महाशिवरात्रि से पहले बारह लंकवार सदस्य, बाजा वादक और ग्रामीण सबसे पहले कलश स्थापना पूजा करते हैं. इसके बाद पूरे कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए पूजा अनुष्ठान किया जाता है. इस पूजा में आसपास के ग्रामीण क्षेत्र से सिरहा (बैगा) भी अपनी उपस्थिति देते हैं. पूजा होने के बाद सिरहा के ऊपर उनकी कुलदेवी का वास होता हैं. जिससे वह मोहरी बाजा की थाप पर नाचते झूमते हैं. यह प्रक्रिया हर रोज की जाती है, सिरहा के नृत्य का समय लगातार बढ़ता जाता है.

महाशिवरात्रि से एक दिन पहले यानी अनुष्ठान शुरू होने के आठवें दिन पांडव मंदिर के सामने सेमर पेड़ (कांटा वाला पेड़) की शाखाओं से मचान बनाया जाता है. इसी दिन आधी रात को यहां बड़े जगार का आयोजन होता है. जिसमें विशेष फूलों (आम, चार, कनेर, हजारी आदि) से पूजा अनुष्ठान किया जाता है. रात को मोहरी बाजा की थाप पर सिरहा मंदिर परिसर और कंटीले शाखाओं से बने मचान पर खाली पांव नाचते झूमते हैं. इसके बाद दंतेश्वरी मंदिर और भुवनेश्वरी मंदिर में सात प्रकार की पूजा की जाती है.

सिरहा को पुजारी मारते हैं कोड़ा: पूजा के बाद पुजारी सभी सिरहा को कोड़ा मारने की परंपरा निभाते हैं. जिसके बाद सिरहा से दैवीय शक्ति समाप्त हो जाती है. इस पूजा के बाद महाशिवरात्रि के दिन दोपहर में पांडव मंदिर में मेला का आयोजन होता है. जिसमें सिरहा, दंतेश्वरी मंदिर के मुख्य पुजारी को पांडव मंदिर में आमंत्रित करते हैं. इसके बाद दंतेश्वरी मंदिर में पूजा की जाती है. इस दौरान पुराने सिरहा (बैगा )मोहरी बाजा की थाप पर नृत्य करते हैं और नए सिरहा को विवाह रस्म के अनुसार हल्दी तेल लगाते हैं. इसके बाद पांडव मंदिर के पुजारी, दंतेश्वरी मंदिर के पुजारी, 12 लंकवार के प्रमुख सदस्य नए सिरहा को कोड़ा मारते हैं और पुराने सिरहा सदस्यों के साथ शामिल किया जाता है.

महाशिवरात्रि पर नए देवी जन्म का उत्सव: इसके अलावा हर तीन साल में एक बार महाशिवरात्रि के दौरान नए देवी जन्म का उत्सव मनाया जाता है. जिसमें सभी सिरहा दो भागों में बंटकर ग्राम गीदम एवं ग्राम करंजेनार की पहाड़ी से दैवीय शक्ति से चुनी हुई दैवीय प्रतीक बांस उखाड़कर लाते हैं. जिसे मंदिर के पुजारी, बारह लंकवार सदस्य हल्दी तेल लगाकर विवाह की रस्म पूरी करते हैं. इन प्रतीकों से मन्नत मांगे जाने पर हर मन्नत पूरी होने की मान्यता है.

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