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बस्तर के इन गांवों में 2026 में आई आजादी! कभी माओवादियों का गढ़ रहे इलाकों में लहराया तिरंगा
Digital Desk
बस्तर के बीजापुर, सुकमा और नारायणपुर के 92 गांवों में स्वतंत्रता दिवस 2026 पर पहली बार खुले तौर पर तिरंगा फहराया गया। जानें इस बदलाव की पूरी कहानी।
स्वतंत्रता दिवस 2026 पर बीजापुर, सुकमा और नारायणपुर के 92 गांवों में पहली बार खुले तौर पर तिरंगा फहराया गया। कभी माओवादी हिंसा के साए में रहे इन इलाकों में ग्रामीणों ने आजादी का पर्व उत्साह के साथ मनाया।
92 गांवों में पहली बार खुला जश्न
भारत ने 1947 में आजादी हासिल की थी, लेकिन बस्तर के कई दूरदराज इलाकों में राष्ट्रीय पर्व खुले तौर पर मनाना लंबे समय तक चुनौती बना रहा। माओवादी प्रभाव वाले क्षेत्रों में स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के आयोजनों का विरोध किया जाता था।
इस बार तस्वीर बदली हुई नजर आई। छत्तीसगढ़ सरकार की घोषणा के अनुसार बीजापुर के 33, सुकमा के 50 और नारायणपुर के 9 गांवों, यानी कुल 92 गांवों में 15 अगस्त को तिरंगा फहराया गया।
इन इलाकों में स्वतंत्रता दिवस समारोह का आयोजन सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक पहुंच में हुए बदलाव का भी संकेत माना जा रहा है।
कर्रेगुट्टालु में लहराया तिरंगा
बीजापुर में कर्रेगुट्टालु की पहाड़ियों पर तिरंगा फहराया गया। यह वही क्षेत्र है जो लंबे समय तक माओवादी गतिविधियों के लिए जाना जाता रहा है।
ऐसे स्थान पर राष्ट्रीय ध्वज फहराना प्रशासन के लिए महज एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था। यह उन इलाकों में सरकारी और नागरिक गतिविधियों की बढ़ती मौजूदगी का प्रतीक भी बना, जहां कभी सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित करना मुश्किल था।
ग्रामीणों और सुरक्षा बलों की मौजूदगी में हुए समारोह ने इलाके में बदलते माहौल को सामने रखा।
मिनपा में बदली हिंसा की तस्वीर
सुकमा के मिनपा गांव में भी स्वतंत्रता दिवस समारोह का आयोजन हुआ। यह इलाका मार्च 2020 के उस घातक माओवादी हमले के कारण सुर्खियों में आया था, जिसमें 17 सुरक्षाकर्मी मारे गए थे।
इस बार उसी क्षेत्र में तिरंगा खुले तौर पर फहराया गया। सुकमा के पुलिस अधीक्षक मायंक गुर्जर ने समारोह को माओवादी प्रभाव वाले क्षेत्रों में बदलती परिस्थितियों के संकेत के तौर पर देखा।
जहां कभी हिंसा और भय की घटनाएं जुड़ी थीं, वहां राष्ट्रीय ध्वज के नीचे ग्रामीणों और सुरक्षा कर्मियों की भागीदारी ने समारोह को विशेष प्रतीकात्मक महत्व दिया।
नारायणपुर के 9 गांव भी शामिल
बस्तर के बदलाव की इस तस्वीर में नारायणपुर के नौ गांव भी शामिल रहे। जिले के इन गांवों को 92 गांवों के विशेष स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में शामिल किया गया था।
इन क्षेत्रों में प्रशासनिक पहुंच बढ़ाने और ग्रामीणों को सरकारी संस्थाओं से जोड़ने के प्रयासों के बीच इस तरह के सार्वजनिक आयोजन महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
कार्यक्रम केवल ध्वजारोहण तक सीमित नहीं रहे। ग्रामीण संपर्क, सामुदायिक भागीदारी और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने वाली गतिविधियां भी अभियान का हिस्सा बनीं।
डर की जगह भागीदारी ने ली
बस्तर में लंबे समय तक माओवादी संगठनों की ओर से राष्ट्रीय पर्वों के बहिष्कार की अपील की जाती रही। कई इलाकों में ग्रामीणों को स्वतंत्रता दिवस मनाने से रोकने के लिए धमकियां और प्रचार अभियान भी चलाए जाते थे।
कुछ संवेदनशील क्षेत्रों में तिरंगे के बजाय दूसरे झंडे लगाए जाने या सार्वजनिक कार्यक्रम नहीं होने की घटनाएं सामने आती रही हैं। ऐसे माहौल में ग्रामीणों का खुले तौर पर स्वतंत्रता दिवस समारोह में शामिल होना बदलाव का महत्वपूर्ण संकेत है।
इस बार कई जगह बच्चों, ग्रामीणों और सुरक्षाकर्मियों ने मिलकर राष्ट्रीय ध्वज के नीचे कार्यक्रमों में हिस्सा लिया।
500 से ज्यादा जगहों को मिलेगा नया नाम
स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम का दायरा 92 गांवों तक सीमित नहीं रहा। बस्तर में 500 से अधिक स्थानों, जिनमें स्कूल, सामुदायिक भवन और सार्वजनिक स्थल शामिल हैं, को शहीदों और स्थानीय विभूतियों के नाम से जोड़ने की योजना भी सामने आई।
सरकार की यह पहल दूरस्थ इलाकों को स्थानीय इतिहास, राष्ट्रीय प्रतीकों और सार्वजनिक संस्थाओं से जोड़ने के व्यापक प्रयास का हिस्सा है।
इसके अलावा कई इलाकों में तिरंगा यात्राओं और जनसंपर्क कार्यक्रमों का आयोजन भी किया गया। इन गतिविधियों का उद्देश्य उन क्षेत्रों में नागरिक भागीदारी बढ़ाना है, जो लंबे समय तक माओवादी हिंसा से प्रभावित रहे हैं।
बस्तर में बदलाव की नई तस्वीर
बस्तर का संघर्ष और हिंसा का इतिहास एक दिन में खत्म नहीं होता। इस क्षेत्र ने दशकों तक हिंसा, विस्थापन और जान-माल के नुकसान का सामना किया है। लेकिन 15 अगस्त 2026 के समारोहों ने कई पूर्व माओवादी गढ़ों में बदली हुई स्थिति की एक स्पष्ट तस्वीर जरूर पेश की।
बीजापुर, सुकमा और नारायणपुर के 92 गांवों में तिरंगे का खुले तौर पर फहराया जाना इस बदलाव का सबसे बड़ा प्रतीक बना। कर्रेगुट्टालु से मिनपा तक, जिन स्थानों का नाम कभी माओवादी हिंसा से जुड़ा था, वहां राष्ट्रीय पर्व मनाया गया।
भारत के लिए आजादी 1947 में आई थी, लेकिन बस्तर के इन गांवों के लिए 2026 का स्वतंत्रता दिवस सार्वजनिक भागीदारी और भय से बाहर निकलने की एक नई शुरुआत के रूप में दर्ज हो सकता है।
बस्तर के इन गांवों में 2026 में आई आजादी! कभी माओवादियों का गढ़ रहे इलाकों में लहराया तिरंगा
Digital Desk
स्वतंत्रता दिवस 2026 पर बीजापुर, सुकमा और नारायणपुर के 92 गांवों में पहली बार खुले तौर पर तिरंगा फहराया गया। कभी माओवादी हिंसा के साए में रहे इन इलाकों में ग्रामीणों ने आजादी का पर्व उत्साह के साथ मनाया।
92 गांवों में पहली बार खुला जश्न
भारत ने 1947 में आजादी हासिल की थी, लेकिन बस्तर के कई दूरदराज इलाकों में राष्ट्रीय पर्व खुले तौर पर मनाना लंबे समय तक चुनौती बना रहा। माओवादी प्रभाव वाले क्षेत्रों में स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के आयोजनों का विरोध किया जाता था।
इस बार तस्वीर बदली हुई नजर आई। छत्तीसगढ़ सरकार की घोषणा के अनुसार बीजापुर के 33, सुकमा के 50 और नारायणपुर के 9 गांवों, यानी कुल 92 गांवों में 15 अगस्त को तिरंगा फहराया गया।
इन इलाकों में स्वतंत्रता दिवस समारोह का आयोजन सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक पहुंच में हुए बदलाव का भी संकेत माना जा रहा है।
कर्रेगुट्टालु में लहराया तिरंगा
बीजापुर में कर्रेगुट्टालु की पहाड़ियों पर तिरंगा फहराया गया। यह वही क्षेत्र है जो लंबे समय तक माओवादी गतिविधियों के लिए जाना जाता रहा है।
ऐसे स्थान पर राष्ट्रीय ध्वज फहराना प्रशासन के लिए महज एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था। यह उन इलाकों में सरकारी और नागरिक गतिविधियों की बढ़ती मौजूदगी का प्रतीक भी बना, जहां कभी सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित करना मुश्किल था।
ग्रामीणों और सुरक्षा बलों की मौजूदगी में हुए समारोह ने इलाके में बदलते माहौल को सामने रखा।
मिनपा में बदली हिंसा की तस्वीर
सुकमा के मिनपा गांव में भी स्वतंत्रता दिवस समारोह का आयोजन हुआ। यह इलाका मार्च 2020 के उस घातक माओवादी हमले के कारण सुर्खियों में आया था, जिसमें 17 सुरक्षाकर्मी मारे गए थे।
इस बार उसी क्षेत्र में तिरंगा खुले तौर पर फहराया गया। सुकमा के पुलिस अधीक्षक मायंक गुर्जर ने समारोह को माओवादी प्रभाव वाले क्षेत्रों में बदलती परिस्थितियों के संकेत के तौर पर देखा।
जहां कभी हिंसा और भय की घटनाएं जुड़ी थीं, वहां राष्ट्रीय ध्वज के नीचे ग्रामीणों और सुरक्षा कर्मियों की भागीदारी ने समारोह को विशेष प्रतीकात्मक महत्व दिया।
नारायणपुर के 9 गांव भी शामिल
बस्तर के बदलाव की इस तस्वीर में नारायणपुर के नौ गांव भी शामिल रहे। जिले के इन गांवों को 92 गांवों के विशेष स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में शामिल किया गया था।
इन क्षेत्रों में प्रशासनिक पहुंच बढ़ाने और ग्रामीणों को सरकारी संस्थाओं से जोड़ने के प्रयासों के बीच इस तरह के सार्वजनिक आयोजन महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
कार्यक्रम केवल ध्वजारोहण तक सीमित नहीं रहे। ग्रामीण संपर्क, सामुदायिक भागीदारी और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने वाली गतिविधियां भी अभियान का हिस्सा बनीं।
डर की जगह भागीदारी ने ली
बस्तर में लंबे समय तक माओवादी संगठनों की ओर से राष्ट्रीय पर्वों के बहिष्कार की अपील की जाती रही। कई इलाकों में ग्रामीणों को स्वतंत्रता दिवस मनाने से रोकने के लिए धमकियां और प्रचार अभियान भी चलाए जाते थे।
कुछ संवेदनशील क्षेत्रों में तिरंगे के बजाय दूसरे झंडे लगाए जाने या सार्वजनिक कार्यक्रम नहीं होने की घटनाएं सामने आती रही हैं। ऐसे माहौल में ग्रामीणों का खुले तौर पर स्वतंत्रता दिवस समारोह में शामिल होना बदलाव का महत्वपूर्ण संकेत है।
इस बार कई जगह बच्चों, ग्रामीणों और सुरक्षाकर्मियों ने मिलकर राष्ट्रीय ध्वज के नीचे कार्यक्रमों में हिस्सा लिया।
500 से ज्यादा जगहों को मिलेगा नया नाम
स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम का दायरा 92 गांवों तक सीमित नहीं रहा। बस्तर में 500 से अधिक स्थानों, जिनमें स्कूल, सामुदायिक भवन और सार्वजनिक स्थल शामिल हैं, को शहीदों और स्थानीय विभूतियों के नाम से जोड़ने की योजना भी सामने आई।
सरकार की यह पहल दूरस्थ इलाकों को स्थानीय इतिहास, राष्ट्रीय प्रतीकों और सार्वजनिक संस्थाओं से जोड़ने के व्यापक प्रयास का हिस्सा है।
इसके अलावा कई इलाकों में तिरंगा यात्राओं और जनसंपर्क कार्यक्रमों का आयोजन भी किया गया। इन गतिविधियों का उद्देश्य उन क्षेत्रों में नागरिक भागीदारी बढ़ाना है, जो लंबे समय तक माओवादी हिंसा से प्रभावित रहे हैं।
बस्तर में बदलाव की नई तस्वीर
बस्तर का संघर्ष और हिंसा का इतिहास एक दिन में खत्म नहीं होता। इस क्षेत्र ने दशकों तक हिंसा, विस्थापन और जान-माल के नुकसान का सामना किया है। लेकिन 15 अगस्त 2026 के समारोहों ने कई पूर्व माओवादी गढ़ों में बदली हुई स्थिति की एक स्पष्ट तस्वीर जरूर पेश की।
बीजापुर, सुकमा और नारायणपुर के 92 गांवों में तिरंगे का खुले तौर पर फहराया जाना इस बदलाव का सबसे बड़ा प्रतीक बना। कर्रेगुट्टालु से मिनपा तक, जिन स्थानों का नाम कभी माओवादी हिंसा से जुड़ा था, वहां राष्ट्रीय पर्व मनाया गया।
भारत के लिए आजादी 1947 में आई थी, लेकिन बस्तर के इन गांवों के लिए 2026 का स्वतंत्रता दिवस सार्वजनिक भागीदारी और भय से बाहर निकलने की एक नई शुरुआत के रूप में दर्ज हो सकता है।
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