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मनरेगा पर सियासी संग्राम: सीएम साय ने कांग्रेस पर लगाए भ्रष्टाचार के आरोप, भूपेश बघेल ने बताया रोजगार ठप
रायपुर (छ.ग.)
छत्तीसगढ़ में मनरेगा को लेकर भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने, मजदूरी भुगतान और रोजगार के आंकड़ों पर तेज हुई राजनीतिक बहस
छत्तीसगढ़ में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को लेकर एक बार फिर राजनीतिक टकराव खुलकर सामने आ गया है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बीच तीखी बयानबाजी ने इस मुद्दे को सियासी केंद्र में ला दिया है। भाजपा और कांग्रेस एक-दूसरे पर मजदूरों के हितों की अनदेखी और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगा रही हैं।
सोमवार को राजधानी रायपुर में आयोजित एक प्रेस वार्ता में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कांग्रेस पर सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा कि कांग्रेस मनरेगा को लेकर केवल राजनीतिक दिखावा कर रही है। मुख्यमंत्री का आरोप है कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में योजना के नाम पर बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हुईं और मजदूरों की मेहनत की कमाई का दुरुपयोग किया गया। साय ने दावा किया कि फर्जी मास्टर रोल और गलत भुगतान की शिकायतें वर्षों तक सामने आती रहीं, लेकिन तब कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा लाई जा रही नई रोजगार व्यवस्था का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। उनके अनुसार, प्रस्तावित ढांचे के तहत ग्रामीण परिवारों को पहले की तुलना में अधिक दिन का रोजगार मिलेगा और मजदूरी भुगतान तय समयसीमा में किया जाएगा। साय ने यह भी कहा कि समय पर भुगतान न होने की स्थिति में मुआवजे का प्रावधान मजदूरों के हित में एक बड़ा कदम है।
दूसरी ओर, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए राज्य सरकार पर पलटवार किया। उन्होंने कहा कि पिछले दो वर्षों से प्रदेश के कई हिस्सों में मनरेगा के काम लगभग ठप हैं, जिससे ग्रामीण मजदूरों को रोजगार के लिए पलायन करना पड़ रहा है। बघेल का कहना है कि उनकी सरकार के दौरान कठिन परिस्थितियों में भी मनरेगा को सक्रिय रखा गया और जरूरतमंदों को काम दिया गया।
पूर्व मुख्यमंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार मनरेगा को कमजोर करने का प्रयास कर रही है और जमीनी स्तर पर काम शुरू न होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है। उन्होंने कहा कि अगर सरकार वास्तव में मजदूरों के हित में है, तो उसे योजनाओं की घोषणाओं के साथ-साथ धरातल पर काम भी दिखाना चाहिए।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मनरेगा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर यह टकराव आने वाले समय में और तेज हो सकता है। ग्रामीण रोजगार, मजदूरी भुगतान और योजना की प्रभावशीलता ऐसे सवाल हैं, जो सीधे जनता से जुड़े हैं। ऐसे में दोनों दलों की बयानबाजी केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि आगामी नीतिगत फैसलों की दिशा भी तय कर सकती है।
फिलहाल, मनरेगा को लेकर जारी आरोप-प्रत्यारोप ने छत्तीसगढ़ की राजनीति में गर्माहट बढ़ा दी है। अंतिम फैसला जनता के अनुभव और योजना के जमीनी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा कि किसके दावे कितने मजबूत साबित होते हैं।
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छत्तीसगढ़ में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को लेकर एक बार फिर राजनीतिक टकराव खुलकर सामने आ गया है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बीच तीखी बयानबाजी ने इस मुद्दे को सियासी केंद्र में ला दिया है। भाजपा और कांग्रेस एक-दूसरे पर मजदूरों के हितों की अनदेखी और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगा रही हैं।
सोमवार को राजधानी रायपुर में आयोजित एक प्रेस वार्ता में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कांग्रेस पर सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा कि कांग्रेस मनरेगा को लेकर केवल राजनीतिक दिखावा कर रही है। मुख्यमंत्री का आरोप है कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में योजना के नाम पर बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हुईं और मजदूरों की मेहनत की कमाई का दुरुपयोग किया गया। साय ने दावा किया कि फर्जी मास्टर रोल और गलत भुगतान की शिकायतें वर्षों तक सामने आती रहीं, लेकिन तब कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा लाई जा रही नई रोजगार व्यवस्था का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। उनके अनुसार, प्रस्तावित ढांचे के तहत ग्रामीण परिवारों को पहले की तुलना में अधिक दिन का रोजगार मिलेगा और मजदूरी भुगतान तय समयसीमा में किया जाएगा। साय ने यह भी कहा कि समय पर भुगतान न होने की स्थिति में मुआवजे का प्रावधान मजदूरों के हित में एक बड़ा कदम है।
दूसरी ओर, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए राज्य सरकार पर पलटवार किया। उन्होंने कहा कि पिछले दो वर्षों से प्रदेश के कई हिस्सों में मनरेगा के काम लगभग ठप हैं, जिससे ग्रामीण मजदूरों को रोजगार के लिए पलायन करना पड़ रहा है। बघेल का कहना है कि उनकी सरकार के दौरान कठिन परिस्थितियों में भी मनरेगा को सक्रिय रखा गया और जरूरतमंदों को काम दिया गया।
पूर्व मुख्यमंत्री ने यह भी आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार मनरेगा को कमजोर करने का प्रयास कर रही है और जमीनी स्तर पर काम शुरू न होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है। उन्होंने कहा कि अगर सरकार वास्तव में मजदूरों के हित में है, तो उसे योजनाओं की घोषणाओं के साथ-साथ धरातल पर काम भी दिखाना चाहिए।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मनरेगा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर यह टकराव आने वाले समय में और तेज हो सकता है। ग्रामीण रोजगार, मजदूरी भुगतान और योजना की प्रभावशीलता ऐसे सवाल हैं, जो सीधे जनता से जुड़े हैं। ऐसे में दोनों दलों की बयानबाजी केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि आगामी नीतिगत फैसलों की दिशा भी तय कर सकती है।
फिलहाल, मनरेगा को लेकर जारी आरोप-प्रत्यारोप ने छत्तीसगढ़ की राजनीति में गर्माहट बढ़ा दी है। अंतिम फैसला जनता के अनुभव और योजना के जमीनी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा कि किसके दावे कितने मजबूत साबित होते हैं।
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