नियम विरुद्ध नियुक्ति, फिर भी कुर्सी सलामत: BHOPAL सिटी प्लानर "अनूप गोयल" पर संगीन आरोप

Bhopal, MP

मध्यप्रदेश के नगरीय प्रशासन विभाग में नियम-कानूनों की अनदेखी और मनमानी का एक बड़ा मामला सामने आया है। भोपाल में पदस्थ सिटी प्लानर अनूप गोयल की नियुक्ति पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सरकारी दस्तावेजों और विभागीय आदेशों के मुताबिक, उनकी नियुक्ति पूरी तरह नियम विरुद्ध पाई गई थी, बावजूद इसके वे वर्षों से अपने पद पर जमे हुए हैं।

नियमों को ताक पर रखकर नियुक्ति
विभागीय अभिलेख बताते हैं कि अनूप गोयल की नियुक्ति शुरुआत से ही अस्थायी थी और सेवा शर्तों में स्पष्ट उल्लेख था कि बिना पूर्व सूचना उनके कार्यकाल को समाप्त किया जा सकता है। इसके बावजूद 30 मार्च 1995 को नगर पालिका खरगोन के तत्कालीन अध्यक्ष ने उन्हें नियमित करने का आदेश जारी कर दिया। यह आदेश विधिक रूप से वैध नहीं था, क्योंकि उनकी मूल नियुक्ति प्रक्रिया ही नियमों के अनुरूप नहीं हुई थी। 1-8-1994 को ही नगर पालिका भांग हो चुकी थी, और अध्यक्ष को नियमित करने का अधिकार ही नहीं है।  यही वजह रही की जाँच के बाद गोयल को राज्य नगर पालिका सेवा की नियमित सहायक यंत्रियों की वरिष्ठता सूची में सम्मिलित नहीं किये जाने के आदेश किये गए। बावजूद इसके गोयल को सिटी प्लानर जैसे महत्वपूर्ण पद सौंप  दिया गया।  जांच में यह भी पाया गया कि उनकी नियमितीकरण प्रक्रिया नियमों में वर्णित प्रक्रिया के अनुसार कभी पूरी नहीं हुई। नतीजतन, विभाग ने उनके नाम को ‘तदर्थ सहायक यंत्री’ की सूची में रखा और उनका अभ्यावेदन भी खारिज कर दिया।

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फिर भी कायम सत्ता और प्रभाव
दस्तावेजों में नियुक्ति अमान्य घोषित होने के बाद भी अनूप गोयल न केवल पद पर बने हुए हैं, बल्कि अब भोपाल में सिटी प्लानर के रूप में कार्यरत हैं। यह सवाल खड़ा करता है कि जब नियुक्ति ही अवैध घोषित हो चुकी है, तो उन्हें आज तक पद से हटाया क्यों नहीं गया? क्या विभागीय तंत्र में कुछ ऐसा है जो उन्हें संरक्षण दे रहा है?

निचले कर्मचारियों पर दबाव और उत्पीड़न के आरोप
सूत्रों के अनुसार, अनूप गोयल पर अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को परेशान करने, अनावश्यक दबाव डालने और मनमानी तरीके से फैसले लेने के भी आरोप हैं। कई कर्मचारियों ने मौखिक तौर पर शिकायत की है कि उनके साथ पक्षपात और बदसलूकी की जाती है। यह न केवल प्रशासनिक अनुशासन के खिलाफ है, बल्कि कार्यस्थल पर स्वस्थ माहौल के लिए भी घातक है।

सरकारी मशीनरी की साख पर सवाल
यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की नियुक्ति का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़ा करता है। अगर एक अधिकारी, जिसकी नियुक्ति दस्तावेजों में ही अवैध साबित हो चुकी है, फिर भी वर्षों तक प्रभावशाली पद पर बना रह सकता है, तो यह इस बात का संकेत है कि विभागीय व्यवस्था में कहीं न कहीं गहरी खामियां हैं।

जनता और कर्मचारियों में यह चर्चा का विषय है कि आखिर नियम-कानून सिर्फ निचले कर्मचारियों के लिए ही क्यों लागू होते हैं, बड़े अफसरों के लिए नहीं। यह मामला शासन और प्रशासन के लिए एक लिटमस टेस्ट है—क्या वे नियमों का पालन करवा पाएंगे या फिर यह भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।

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www.dainikjagranmpcg.com
12 Aug 2025 By दैनिक जागरण

नियम विरुद्ध नियुक्ति, फिर भी कुर्सी सलामत: BHOPAL सिटी प्लानर "अनूप गोयल" पर संगीन आरोप

Bhopal, MP

नियमों को ताक पर रखकर नियुक्ति
विभागीय अभिलेख बताते हैं कि अनूप गोयल की नियुक्ति शुरुआत से ही अस्थायी थी और सेवा शर्तों में स्पष्ट उल्लेख था कि बिना पूर्व सूचना उनके कार्यकाल को समाप्त किया जा सकता है। इसके बावजूद 30 मार्च 1995 को नगर पालिका खरगोन के तत्कालीन अध्यक्ष ने उन्हें नियमित करने का आदेश जारी कर दिया। यह आदेश विधिक रूप से वैध नहीं था, क्योंकि उनकी मूल नियुक्ति प्रक्रिया ही नियमों के अनुरूप नहीं हुई थी। 1-8-1994 को ही नगर पालिका भांग हो चुकी थी, और अध्यक्ष को नियमित करने का अधिकार ही नहीं है।  यही वजह रही की जाँच के बाद गोयल को राज्य नगर पालिका सेवा की नियमित सहायक यंत्रियों की वरिष्ठता सूची में सम्मिलित नहीं किये जाने के आदेश किये गए। बावजूद इसके गोयल को सिटी प्लानर जैसे महत्वपूर्ण पद सौंप  दिया गया।  जांच में यह भी पाया गया कि उनकी नियमितीकरण प्रक्रिया नियमों में वर्णित प्रक्रिया के अनुसार कभी पूरी नहीं हुई। नतीजतन, विभाग ने उनके नाम को ‘तदर्थ सहायक यंत्री’ की सूची में रखा और उनका अभ्यावेदन भी खारिज कर दिया।

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सूत्रों के अनुसार, अनूप गोयल पर अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को परेशान करने, अनावश्यक दबाव डालने और मनमानी तरीके से फैसले लेने के भी आरोप हैं। कई कर्मचारियों ने मौखिक तौर पर शिकायत की है कि उनके साथ पक्षपात और बदसलूकी की जाती है। यह न केवल प्रशासनिक अनुशासन के खिलाफ है, बल्कि कार्यस्थल पर स्वस्थ माहौल के लिए भी घातक है।

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यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की नियुक्ति का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़ा करता है। अगर एक अधिकारी, जिसकी नियुक्ति दस्तावेजों में ही अवैध साबित हो चुकी है, फिर भी वर्षों तक प्रभावशाली पद पर बना रह सकता है, तो यह इस बात का संकेत है कि विभागीय व्यवस्था में कहीं न कहीं गहरी खामियां हैं।

जनता और कर्मचारियों में यह चर्चा का विषय है कि आखिर नियम-कानून सिर्फ निचले कर्मचारियों के लिए ही क्यों लागू होते हैं, बड़े अफसरों के लिए नहीं। यह मामला शासन और प्रशासन के लिए एक लिटमस टेस्ट है—क्या वे नियमों का पालन करवा पाएंगे या फिर यह भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।

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