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धार भोजशाला में बसंत पंचमी उत्सव का आरंभ, यज्ञ हवन के साथ पूजा शुरू – जुमे की नमाज भी होगी
धार (म.प्र.)
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद हिंदू और मुस्लिम समाज के लिए अलग-अलग आयोजन, सुरक्षा के कड़े इंतजाम
धार, मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश के धार जिले में ऐतिहासिक भोजशाला में शुक्रवार को बसंत पंचमी उत्सव के तहत पूजा-आर्चना शुरू हो गई। महाराजा भोज वसतोत्सव समिति के संयोजक गोपाल शर्मा और अन्य पदाधिकारियों ने यज्ञ हवन कुंड प्रज्वलित कर पूजा का शुभारंभ किया। गर्भगृह में मां वाग्देवी का तेल चित्र विराजित किया गया और परिसर में 'मां वाग्देवी', 'राजा भोज' और 'जय श्री राम' के जयघोष से वातावरण गुंजायमान हो उठा।
सुरक्षा के मद्देनजर प्रशासन ने पूरे भोजशाला परिसर को हाई अलर्ट पर रखा है। अधिकारियों के अनुसार, दोपहर 01 से 03 बजे तक मुस्लिम समाज जुमे की नमाज अदा करेगा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, दोनों समुदायों की भावनाओं का ध्यान रखते हुए जिला प्रशासन ने पूजा और नमाज के लिए अलग-अलग स्थान निर्धारित किए हैं। मौके पर भारी पुलिस बल तैनात किया गया है ताकि किसी भी प्रकार का विवाद न हो।
भोजशाला में नमाज और पूजा के आयोजन को लेकर गुरुवार देर रात प्रशासन ने बैठक की। इसमें मुस्लिम समाज को जुमे की नमाज पढ़ने के लिए निश्चित स्थान और सुरक्षा व्यवस्था की पूरी जानकारी दी गई। इसके साथ ही हिंदू समाज के लिए दोपहर में लालबाग परिसर से मां वाग्देवी की प्रतिमा के साथ शोभा यात्रा का आयोजन किया जाएगा।
स्थानीय लोग सुबह से ही दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं और बच्चों की बड़ी संख्या में उपस्थिति देखने को मिली। प्रशासन ने पूरे शहर में चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा बल तैनात कर दिया है। कलेक्टर प्रिंयक मिश्रा और पुलिस अधीक्षक ने सुबह सवा 08 बजे भोजशाला का निरीक्षण किया और नमाज एवं पूजा की व्यवस्थाओं को अंतिम रूप देने के निर्देश दिए।
विशेषज्ञों के अनुसार, धार भोजशाला का यह उत्सव सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत दोनों समुदायों को अलग-अलग आयोजन की अनुमति मिलने से शहर में शांति और सुरक्षा सुनिश्चित की जा रही है। प्रशासन ने कहा कि यह पहला अवसर है जब बसंत पंचमी और जुमे की नमाज को दोनों समुदायों की भावनाओं का सम्मान करते हुए एक ही परिसर में व्यवस्थित रूप से संपन्न किया जा रहा है।
सांस्कृतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस प्रकार के संयुक्त आयोजन सामाजिक समरसता और धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा देते हैं। भोजशाला का यह ऐतिहासिक स्थल अब सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक समावेशिता का प्रतीक भी बन गया है।
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