बशीर बद्र नहीं रहे, गजल को आम आदमी तक पहुंचाने वाली आवाज थम गई

भोपाल,(म.प्र.)

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भोपाल में 91 साल की उम्र में निधन, देशभर के शायरों और साहित्यकारों ने दी श्रद्धांजलि

मशहूर शायर बशीर बद्र का गुरुवार दोपहर भोपाल स्थित उनके निवास पर निधन हो गया। 91 वर्षीय बशीर बद्र लंबे समय से बीमार चल रहे थे। बताया जा रहा है कि पिछले कुछ वर्षों से उनकी याददाश्त भी काफी कमजोर हो गई थी। दोपहर करीब 12 बजकर 35 मिनट पर उन्होंने आखिरी सांस ली। शाम को भोपाल के बड़ा बाग कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया। उनके निधन की खबर सामने आते ही साहित्य, शायरी और कला जगत में शोक की लहर फैल गई। देशभर के कवियों, शायरों और साहित्य प्रेमियों ने उन्हें याद करते हुए श्रद्धांजलि दी।

उर्दू शायरी को मुश्किल अल्फाजों से निकालकर आम आदमी की भाषा बनाने वाले बशीर बद्र उन चुनिंदा शायरों में गिने जाते थे, जिनके शेर सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहे। उनके अशआर लोगों की बातचीत, अखबारों की सुर्खियों, राजनीतिक भाषणों और मोहब्बत की कहानियों तक में शामिल हो गए। “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में…” और “उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो…” जैसे शेर आज भी लोगों की जुबान पर हैं। कहा जाता है कि बशीर बद्र की शायरी में दर्द था, लेकिन वह दर्द बहुत सादगी से लोगों के दिल में उतर जाता था।

पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित बशीर बद्र ने अपने लंबे साहित्यिक सफर में करीब 700 गजलें और नज्में लिखीं। उनके चार हजार से ज्यादा शेर अलग-अलग मंचों और मुशायरों में पढ़े गए। भारत के अलावा पाकिस्तान, अमेरिका और ब्रिटेन तक में उन्होंने मुशायरों में हिस्सा लिया। उनकी लोकप्रियता सिर्फ उर्दू शायरी तक सीमित नहीं रही, हिंदी भाषी लोग भी उन्हें उतना ही पसंद करते थे।

1987 के मेरठ दंगों का जिक्र किए बिना बशीर बद्र की जिंदगी को समझना अधूरा माना जाता है। उन्हीं दंगों में उनका घर जला दिया गया था। उस आग में सिर्फ मकान नहीं जला था, बल्कि उनकी किताबें, डिग्रियां, बरसों की मेहनत और निजी यादें भी खत्म हो गई थीं। इस हादसे के बाद वे भीतर से काफी टूट गए थे। बाद में उन्होंने भोपाल को अपना ठिकाना बनाया। उसी दर्द से निकला उनका मशहूर शेर “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में” लोगों के दिलों में हमेशा के लिए बस गया।

मशहूर कवि कुमार विश्वास ने बशीर बद्र के निधन पर गहरा दुख जताया। उन्होंने कहा कि बहुत कम लोग भाषा को बदलते हैं और बशीर बद्र उन्हीं गिने-चुने लोगों में थे। कुमार विश्वास के मुताबिक बशीर साहब ने गजल को ड्रॉइंगरूम से निकालकर आम आदमी की जुबान बना दिया। उन्होंने कहा कि जब भी किसी मुशायरे में बशीर बद्र मौजूद होते थे तो पूरा माहौल अलग हो जाता था। “वे जहां खड़े हो जाते थे, मुशायरा वहीं से बड़ा हो जाता था।” कुमार विश्वास ने उन्हें भारतीय गजल का “गौतम बुद्ध” तक बताया।

उन्होंने यह भी कहा कि बशीर बद्र ने कठिन बातों को बेहद आसान शब्दों में कहने की कला विकसित की थी। उनके शेरों में दिखावा नहीं होता था, लेकिन हर लाइन सीधे दिल में उतर जाती थी। संसद से लेकर सड़क तक और अखबारों से लेकर मोहब्बत की चिट्ठियों तक उनके शेर मौजूद रहते थे। भारत-पाकिस्तान के रिश्तों पर लिखा उनका मशहूर शेर “दिल मिले या न मिले, हाथ मिलाते रहिए…” दोनों देशों के बीच रिश्तों की भाषा बन गया था।

प्रसून जोशी ने भी बशीर बद्र को याद करते हुए एक भावुक कविता साझा की। उन्होंने लिखा कि बशीर बद्र सिर्फ शायर नहीं थे, बल्कि लोगों की जिंदगी के एहसासों को शब्द देने वाले इंसान थे। साहित्य जगत के कई लोगों का मानना है कि बशीर बद्र की सबसे बड़ी ताकत उनकी सादगी थी। वे बड़े शायर जरूर थे, लेकिन उनके भीतर कभी बनावटीपन नहीं दिखा। मंच पर भी वे बहुत सहज नजर आते थे।

भोपाल में रहने के दौरान भी उनका घर साहित्य प्रेमियों और शायरों के लिए खास जगह बना रहा। हालांकि आखिरी वर्षों में बीमारी की वजह से उन्होंने सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूरी बना ली थी। परिवार के करीबी लोगों के मुताबिक उनकी तबीयत लगातार खराब चल रही थी। उनकी पत्नी डॉ. राहत बद्र ने लंबे समय तक उनकी देखभाल की। इस बात का जिक्र करते हुए कुमार विश्वास ने कहा कि जिस समर्पण से उन्होंने बशीर साहब की सेवा की, वह आज के समय में कम देखने को मिलता है।बशीर बद्र के जाने के बाद साहित्य जगत में एक बड़ा खालीपन महसूस किया जा रहा है। लेकिन उनके चाहने वालों का कहना है कि कोई शायर तब तक जिंदा रहता है, जब तक उसके शेर लोगों की जिंदगी में मौजूद रहते हैं। 

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29 May 2026 By Vaishnavi.J

बशीर बद्र नहीं रहे, गजल को आम आदमी तक पहुंचाने वाली आवाज थम गई

भोपाल,(म.प्र.)

मशहूर शायर बशीर बद्र का गुरुवार दोपहर भोपाल स्थित उनके निवास पर निधन हो गया। 91 वर्षीय बशीर बद्र लंबे समय से बीमार चल रहे थे। बताया जा रहा है कि पिछले कुछ वर्षों से उनकी याददाश्त भी काफी कमजोर हो गई थी। दोपहर करीब 12 बजकर 35 मिनट पर उन्होंने आखिरी सांस ली। शाम को भोपाल के बड़ा बाग कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया। उनके निधन की खबर सामने आते ही साहित्य, शायरी और कला जगत में शोक की लहर फैल गई। देशभर के कवियों, शायरों और साहित्य प्रेमियों ने उन्हें याद करते हुए श्रद्धांजलि दी।

उर्दू शायरी को मुश्किल अल्फाजों से निकालकर आम आदमी की भाषा बनाने वाले बशीर बद्र उन चुनिंदा शायरों में गिने जाते थे, जिनके शेर सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहे। उनके अशआर लोगों की बातचीत, अखबारों की सुर्खियों, राजनीतिक भाषणों और मोहब्बत की कहानियों तक में शामिल हो गए। “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में…” और “उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो…” जैसे शेर आज भी लोगों की जुबान पर हैं। कहा जाता है कि बशीर बद्र की शायरी में दर्द था, लेकिन वह दर्द बहुत सादगी से लोगों के दिल में उतर जाता था।

पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित बशीर बद्र ने अपने लंबे साहित्यिक सफर में करीब 700 गजलें और नज्में लिखीं। उनके चार हजार से ज्यादा शेर अलग-अलग मंचों और मुशायरों में पढ़े गए। भारत के अलावा पाकिस्तान, अमेरिका और ब्रिटेन तक में उन्होंने मुशायरों में हिस्सा लिया। उनकी लोकप्रियता सिर्फ उर्दू शायरी तक सीमित नहीं रही, हिंदी भाषी लोग भी उन्हें उतना ही पसंद करते थे।

1987 के मेरठ दंगों का जिक्र किए बिना बशीर बद्र की जिंदगी को समझना अधूरा माना जाता है। उन्हीं दंगों में उनका घर जला दिया गया था। उस आग में सिर्फ मकान नहीं जला था, बल्कि उनकी किताबें, डिग्रियां, बरसों की मेहनत और निजी यादें भी खत्म हो गई थीं। इस हादसे के बाद वे भीतर से काफी टूट गए थे। बाद में उन्होंने भोपाल को अपना ठिकाना बनाया। उसी दर्द से निकला उनका मशहूर शेर “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में” लोगों के दिलों में हमेशा के लिए बस गया।

मशहूर कवि कुमार विश्वास ने बशीर बद्र के निधन पर गहरा दुख जताया। उन्होंने कहा कि बहुत कम लोग भाषा को बदलते हैं और बशीर बद्र उन्हीं गिने-चुने लोगों में थे। कुमार विश्वास के मुताबिक बशीर साहब ने गजल को ड्रॉइंगरूम से निकालकर आम आदमी की जुबान बना दिया। उन्होंने कहा कि जब भी किसी मुशायरे में बशीर बद्र मौजूद होते थे तो पूरा माहौल अलग हो जाता था। “वे जहां खड़े हो जाते थे, मुशायरा वहीं से बड़ा हो जाता था।” कुमार विश्वास ने उन्हें भारतीय गजल का “गौतम बुद्ध” तक बताया।

उन्होंने यह भी कहा कि बशीर बद्र ने कठिन बातों को बेहद आसान शब्दों में कहने की कला विकसित की थी। उनके शेरों में दिखावा नहीं होता था, लेकिन हर लाइन सीधे दिल में उतर जाती थी। संसद से लेकर सड़क तक और अखबारों से लेकर मोहब्बत की चिट्ठियों तक उनके शेर मौजूद रहते थे। भारत-पाकिस्तान के रिश्तों पर लिखा उनका मशहूर शेर “दिल मिले या न मिले, हाथ मिलाते रहिए…” दोनों देशों के बीच रिश्तों की भाषा बन गया था।

प्रसून जोशी ने भी बशीर बद्र को याद करते हुए एक भावुक कविता साझा की। उन्होंने लिखा कि बशीर बद्र सिर्फ शायर नहीं थे, बल्कि लोगों की जिंदगी के एहसासों को शब्द देने वाले इंसान थे। साहित्य जगत के कई लोगों का मानना है कि बशीर बद्र की सबसे बड़ी ताकत उनकी सादगी थी। वे बड़े शायर जरूर थे, लेकिन उनके भीतर कभी बनावटीपन नहीं दिखा। मंच पर भी वे बहुत सहज नजर आते थे।

भोपाल में रहने के दौरान भी उनका घर साहित्य प्रेमियों और शायरों के लिए खास जगह बना रहा। हालांकि आखिरी वर्षों में बीमारी की वजह से उन्होंने सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूरी बना ली थी। परिवार के करीबी लोगों के मुताबिक उनकी तबीयत लगातार खराब चल रही थी। उनकी पत्नी डॉ. राहत बद्र ने लंबे समय तक उनकी देखभाल की। इस बात का जिक्र करते हुए कुमार विश्वास ने कहा कि जिस समर्पण से उन्होंने बशीर साहब की सेवा की, वह आज के समय में कम देखने को मिलता है।बशीर बद्र के जाने के बाद साहित्य जगत में एक बड़ा खालीपन महसूस किया जा रहा है। लेकिन उनके चाहने वालों का कहना है कि कोई शायर तब तक जिंदा रहता है, जब तक उसके शेर लोगों की जिंदगी में मौजूद रहते हैं। 

https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/bhopal/bashir-badr-is-no-more-the-voice-that-brought-ghazal/article-54472

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