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बशीर बद्र बोले- मैं शोमैन हूं, एग्जिट भी अपनी शर्तों पर करूंगा
भोपाल,(म.प्र.)
मेरठ दंगों से भोपाल तक का सफर, मोहब्बत और उम्मीद लिखता रहा एक शायर
ईद के दिन मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र ने दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके जाने की खबर सामने आते ही अदबी दुनिया में सन्नाटा फैल गया। भोपाल स्थित घर में दोपहर के वक्त उन्होंने आखिरी सांस ली। परिवार के मुताबिक पिछले कई वर्षों से वे डिमेंशिया और बढ़ती उम्र से जुड़ी परेशानियों से जूझ रहे थे। हालत लगातार कमजोर हो रही थी, लेकिन उनके चेहरे की मुस्कान और बात करने का अंदाज आखिर तक वैसा ही रहा। बेटे तैयब बद्र ने नम आंखों से बताया कि बीमारी ने याददाश्त कमजोर कर दी थी, मगर शेर और गजलें जैसे उनकी रूह में बस चुकी थीं। कई बार वे लोगों के नाम भूल जाते थे, लेकिन कोई एक मिसरा पढ़ देता तो पूरा शेर खुद-ब-खुद जुबान पर आ जाता था।
बशीर बद्र सिर्फ एक शायर नहीं थे, वे उस दौर की आवाज थे जब गजलें लोगों की जिंदगी का हिस्सा हुआ करती थीं। उन्होंने उर्दू शायरी को मुश्किल अल्फाजों से निकालकर आम आदमी तक पहुंचाया। यही वजह रही कि उनके शेर सिर्फ मुशायरों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि राजनीति, कूटनीति और भारत-पाक रिश्तों तक में गूंजते रहे। उनका मशहूर शेर “दुश्मनी जम के करो लेकिन ये गुंजाइश रहे...” आज भी दोनों देशों के रिश्तों की चर्चा में सुनाई दे जाता है। अटल बिहारी वाजपेयी की लाहौर बस यात्रा के दौरान भी उनके अशआर खूब चर्चित हुए थे।
तैयब बद्र बताते हैं कि उनके पिता ने बहुत पहले ही मुशायरों से दूरी बना ली थी। वे कहा करते थे, “मैं शोमैन हूं और एग्जिट भी अपनी शर्तों पर करूंगा।” यही वजह थी कि उन्होंने अपनी कमजोर हालत को मंच पर कभी दिखने नहीं दिया। पिछले 12-15 सालों से उन्होंने सार्वजनिक कार्यक्रमों में जाना लगभग बंद कर दिया था। हालांकि घर में कभी-कभी परिवार वाले छोटा सा मुशायरा जैसा माहौल बना देते थे। उस दौरान भी वे अपनी मर्जी से ही कुछ सुनाते थे। अगर मूड हुआ तो देर तक बात करते, नहीं तो चुपचाप बैठे रहते।
1987 के मेरठ दंगे उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा जख्म बनकर सामने आए थे। दंगों में उनका घर जला दिया गया था। सिर्फ मकान नहीं जला था, बल्कि उनकी किताबें, कागज, गजलें और जिंदगीभर की यादें भी राख हो गई थीं। उस दौर की एक तस्वीर काफी चर्चित हुई थी जिसमें वे हाथ में सूटकेस लिए मुस्कुराते नजर आए थे। तस्वीर के साथ लिखा गया था, “आप घर तोड़ सकते हैं, हौसला नहीं।” असल जिंदगी में भी वे बिल्कुल वैसे ही थे। टूटे जरूर, लेकिन बिखरे नहीं। बाद में उन्होंने भोपाल को अपना ठिकाना बनाया। ईदगाह इलाके में उनका घर लंबे समय तक साहित्य प्रेमियों का अड्डा बना रहा।
जब वे अपना मशहूर शेर पढ़ते — “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में...” तो सुनने वाले सिर्फ तालियां नहीं बजाते थे, बल्कि उस दर्द को महसूस करते थे जो उन्होंने खुद जिया था। उनके करीबी बताते हैं कि मेरठ दंगों के बाद वे लंबे समय तक अवसाद में रहे। मगर शायरी ने उन्हें संभाला। यही वजह है कि उनकी गजलें मोहब्बत, उम्मीद और इंसानी रिश्तों से भरी नजर आती हैं।
फिल्मकार विशाल भारद्वाज भी उनके करीबी लोगों में शामिल रहे। बताया जाता है कि मेरठ दंगों में बशीर बद्र की हजारों पंक्तियां जल गई थीं, लेकिन उनमें से कई गजलें विशाल भारद्वाज ने अपनी याददाश्त के सहारे दोबारा लिखकर उन्हें लौटाईं। विशाल उन्हें अपना उस्ताद मानते थे और अक्सर भोपाल जाकर मुलाकात किया करते थे। बाद में वे उन्हें हज यात्रा पर भी लेकर गए।
बशीर बद्र की जिंदगी संघर्षों से भरी रही। पिता के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई थी। आर्थिक हालात ऐसे थे कि उन्हें कम उम्र में नौकरी करनी पड़ी। बताया जाता है कि उन्होंने कुछ समय तक कांस्टेबल की नौकरी भी की। दिनभर ड्यूटी और रात में शायरी, यही उनकी जिंदगी बन गई थी। बाद में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह अदब की दुनिया में उतर गए। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की और वहीं उनकी शायरी सिलेबस तक में शामिल हो गई।
मशहूर गजल गायक तलत अजीज ने उन्हें याद करते हुए कहा कि बशीर बद्र सिर्फ उर्दू के शायर नहीं थे, बल्कि पूरे मुल्क की रूह थे। उन्होंने बताया कि बशीर बद्र खतों में अपनी नई गजलें भेजा करते थे। वह दौर ऐसा था जब लोग गजल नहीं, भरोसा भेजते थे। तलत अजीज ने उनकी कई गजलें गाईं और उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाया।
आखिरी दिनों में बीमारी बढ़ गई थी। फिर भी परिवार कहता है कि उनकी आंखों में चमक बाकी थी। शायद इसलिए आज उनके चाहने वाले यही कह रहे हैं कि बशीर बद्र कहीं गए नहीं हैं। वे अपने शेरों में, अपनी आवाज में और लोगों की यादों में हमेशा जिंदा रहेंगे।
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बशीर बद्र बोले- मैं शोमैन हूं, एग्जिट भी अपनी शर्तों पर करूंगा
भोपाल,(म.प्र.)
ईद के दिन मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र ने दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके जाने की खबर सामने आते ही अदबी दुनिया में सन्नाटा फैल गया। भोपाल स्थित घर में दोपहर के वक्त उन्होंने आखिरी सांस ली। परिवार के मुताबिक पिछले कई वर्षों से वे डिमेंशिया और बढ़ती उम्र से जुड़ी परेशानियों से जूझ रहे थे। हालत लगातार कमजोर हो रही थी, लेकिन उनके चेहरे की मुस्कान और बात करने का अंदाज आखिर तक वैसा ही रहा। बेटे तैयब बद्र ने नम आंखों से बताया कि बीमारी ने याददाश्त कमजोर कर दी थी, मगर शेर और गजलें जैसे उनकी रूह में बस चुकी थीं। कई बार वे लोगों के नाम भूल जाते थे, लेकिन कोई एक मिसरा पढ़ देता तो पूरा शेर खुद-ब-खुद जुबान पर आ जाता था।
बशीर बद्र सिर्फ एक शायर नहीं थे, वे उस दौर की आवाज थे जब गजलें लोगों की जिंदगी का हिस्सा हुआ करती थीं। उन्होंने उर्दू शायरी को मुश्किल अल्फाजों से निकालकर आम आदमी तक पहुंचाया। यही वजह रही कि उनके शेर सिर्फ मुशायरों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि राजनीति, कूटनीति और भारत-पाक रिश्तों तक में गूंजते रहे। उनका मशहूर शेर “दुश्मनी जम के करो लेकिन ये गुंजाइश रहे...” आज भी दोनों देशों के रिश्तों की चर्चा में सुनाई दे जाता है। अटल बिहारी वाजपेयी की लाहौर बस यात्रा के दौरान भी उनके अशआर खूब चर्चित हुए थे।
तैयब बद्र बताते हैं कि उनके पिता ने बहुत पहले ही मुशायरों से दूरी बना ली थी। वे कहा करते थे, “मैं शोमैन हूं और एग्जिट भी अपनी शर्तों पर करूंगा।” यही वजह थी कि उन्होंने अपनी कमजोर हालत को मंच पर कभी दिखने नहीं दिया। पिछले 12-15 सालों से उन्होंने सार्वजनिक कार्यक्रमों में जाना लगभग बंद कर दिया था। हालांकि घर में कभी-कभी परिवार वाले छोटा सा मुशायरा जैसा माहौल बना देते थे। उस दौरान भी वे अपनी मर्जी से ही कुछ सुनाते थे। अगर मूड हुआ तो देर तक बात करते, नहीं तो चुपचाप बैठे रहते।
1987 के मेरठ दंगे उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा जख्म बनकर सामने आए थे। दंगों में उनका घर जला दिया गया था। सिर्फ मकान नहीं जला था, बल्कि उनकी किताबें, कागज, गजलें और जिंदगीभर की यादें भी राख हो गई थीं। उस दौर की एक तस्वीर काफी चर्चित हुई थी जिसमें वे हाथ में सूटकेस लिए मुस्कुराते नजर आए थे। तस्वीर के साथ लिखा गया था, “आप घर तोड़ सकते हैं, हौसला नहीं।” असल जिंदगी में भी वे बिल्कुल वैसे ही थे। टूटे जरूर, लेकिन बिखरे नहीं। बाद में उन्होंने भोपाल को अपना ठिकाना बनाया। ईदगाह इलाके में उनका घर लंबे समय तक साहित्य प्रेमियों का अड्डा बना रहा।
जब वे अपना मशहूर शेर पढ़ते — “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में...” तो सुनने वाले सिर्फ तालियां नहीं बजाते थे, बल्कि उस दर्द को महसूस करते थे जो उन्होंने खुद जिया था। उनके करीबी बताते हैं कि मेरठ दंगों के बाद वे लंबे समय तक अवसाद में रहे। मगर शायरी ने उन्हें संभाला। यही वजह है कि उनकी गजलें मोहब्बत, उम्मीद और इंसानी रिश्तों से भरी नजर आती हैं।
फिल्मकार विशाल भारद्वाज भी उनके करीबी लोगों में शामिल रहे। बताया जाता है कि मेरठ दंगों में बशीर बद्र की हजारों पंक्तियां जल गई थीं, लेकिन उनमें से कई गजलें विशाल भारद्वाज ने अपनी याददाश्त के सहारे दोबारा लिखकर उन्हें लौटाईं। विशाल उन्हें अपना उस्ताद मानते थे और अक्सर भोपाल जाकर मुलाकात किया करते थे। बाद में वे उन्हें हज यात्रा पर भी लेकर गए।
बशीर बद्र की जिंदगी संघर्षों से भरी रही। पिता के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई थी। आर्थिक हालात ऐसे थे कि उन्हें कम उम्र में नौकरी करनी पड़ी। बताया जाता है कि उन्होंने कुछ समय तक कांस्टेबल की नौकरी भी की। दिनभर ड्यूटी और रात में शायरी, यही उनकी जिंदगी बन गई थी। बाद में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह अदब की दुनिया में उतर गए। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की और वहीं उनकी शायरी सिलेबस तक में शामिल हो गई।
मशहूर गजल गायक तलत अजीज ने उन्हें याद करते हुए कहा कि बशीर बद्र सिर्फ उर्दू के शायर नहीं थे, बल्कि पूरे मुल्क की रूह थे। उन्होंने बताया कि बशीर बद्र खतों में अपनी नई गजलें भेजा करते थे। वह दौर ऐसा था जब लोग गजल नहीं, भरोसा भेजते थे। तलत अजीज ने उनकी कई गजलें गाईं और उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाया।
आखिरी दिनों में बीमारी बढ़ गई थी। फिर भी परिवार कहता है कि उनकी आंखों में चमक बाकी थी। शायद इसलिए आज उनके चाहने वाले यही कह रहे हैं कि बशीर बद्र कहीं गए नहीं हैं। वे अपने शेरों में, अपनी आवाज में और लोगों की यादों में हमेशा जिंदा रहेंगे।
