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टमाटर के तेवर हुए ढ़ीले! बड़वानी के किसान परेशान, लागत न मिलने से सड़क पर फेंके
Badwani, MP
बड़वानी में किसानों को टमाटर की लागत नहीं मिल रही है. किसान अपनी फसल सड़कों पर फेंकने को मजबूर हैं.
जिले में इस बार टमाटर की बंपर पैदावार हुई है, फिर भी किसानों की आंखों में आंसू हैं. उन्हें सब्जी मंडी में टमाटर के भाव दो रुपये प्रति किलो ही मुश्किल से मिल रहे हैं. हालात यह हैं कि अब तो मजबूरी में किसान टमाटरों को खेत की मेड़ या सड़क पर फेंककर विरोध जताने लगे हैं. कुछ किसानों का कहना है कि उन्होंने तो खेत में ही फसल पर हल चलवा दिया, क्योंकि मजदूरी तक नहीं निकल पा रही थी.
टमाटर अब बे-भाव हो चुका है
कुछ माह पूर्व तक अपने रंग अनुरूप सुर्ख भावों को लेकर चर्चा में रहने वाला टमाटर अब बे-भाव हो चुका है. हालत यह है कि स्थानीय सब्जी मंडी में भाव नहीं मिल रहे हैं. सब्जी के थोक विक्रेता संतोष यादव का कहना है कि, ''सब्जी मंडी में रोजाना 200 से 300 क्विंटल टमाटर की आवक हो रही है, लेकिन हालत यह हो गई है कि मात्र 2 से 3 रुपये किलो में टमाटर खरीदी की जा रही है. टमाटर के भावों की बहुत बुरी हालत है.''
टमाटर उत्पादकों का कहना है कि, ''उत्पादन लागत ही टमाटर के विक्रय मूल्य से तीन गुना लगती है.'' उधर सब्जी विक्रेताओं के अनुसार, ठंड के दिनों में सब्जियों के दामों में कमी आती है. इस समय टमाटर की जोरदार आवक होने के कारण टमाटर के मंडी में खरीदार नहीं मिल रहे हैं. इसके कारण टमाटर के भाव काफी कम हो गए हैं.

किसानों को इस बार भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है
व्यापारी परेश नामदेव ने बताया है कि, ''इस बार टमाटर की आवक तो भरपूर रही, लेकिन कम भाव मिलने का एक कारण यह भी है कि महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और शिवपुरी बेल्ट एक साथ मंडी के लिए चालू हुईं, जिसके चलते मंडी में दबाव बनने लगा. आवक अधिक होने के कारण अब व्यापारी भी किसानों से माल कम दाम पर खरीद रहे हैं. जिसके चलते किसानों को इस बार भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है.''

बाजार में खेरची (सिक्के) में टमाटर 8 से 10 रुपये किलो मिल रहा है. भावों में कमी का सीधा कारण अधिक उत्पादन होना और मांग कम होना है. जिले में टमाटर की कोई बड़ी प्रोसेसिंग यूनिट नहीं है. किसानों ने बेहतर तकनीक अपनाकर टमाटर फसल का उत्पादन तो अधिक ले लिया है, लेकिन उन्हें बाजार उपलब्ध नहीं हो पा रहा है.
उपज ले जाने का परिवहन महंगा पड़ने लगा है
अंजड़ के किसान अमित सोलंकी ने बताया कि, ''डेढ़ एकड़ खेत में टमाटर लगाए थे. उत्पादन भी अच्छा निकल रहा है. लेकिन मंडियों में भाव नहीं मिलने से लागत निकालना तो दूर, मंडी तक उपज ले जाने का परिवहन महंगा पड़ने लगा है. ऐसे में खेत से निकली फसल को खेत की मेड़ पर फेंक दिया गया है. डेढ़ एकड़ में करीब एक लाख से ज्यादा की लागत लगी थी, मगर लागत भी नही निकल पाई. उल्टा टमाटर तुड़वाई के पैसे घर से देना पड़ रहा है.'' अंजड़ के एक अन्य किसान मदन कहते हैं कि, ''गेहूं, चने के समान सब्जियों का भी समर्थन मूल्य सरकार को घोषित करना चाहिए.''
यह बड़ी चिंता की बात है
किसानों के हितों के लिए संघर्षरत राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंगठन के जिला अध्यक्ष मदन मुलेवा ने किसानों को टमाटर के कम भाव मिलने पर चिंता जाहिर की. उन्होंने कहा कि, ''किसान इतनी मेहनत और लागत से फसल तैयार करता है और आज इसे फेंकने की नोबत आ गई है. पूर्व में राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंगठन ने एक साल तक दिल्ली में आंदोलन किया था. हमारी मांग है कि किसानों की सब्जियों की भी एमएसपी घोषित होना चाहिए.''
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टमाटर के तेवर हुए ढ़ीले! बड़वानी के किसान परेशान, लागत न मिलने से सड़क पर फेंके
Badwani, MP
जिले में इस बार टमाटर की बंपर पैदावार हुई है, फिर भी किसानों की आंखों में आंसू हैं. उन्हें सब्जी मंडी में टमाटर के भाव दो रुपये प्रति किलो ही मुश्किल से मिल रहे हैं. हालात यह हैं कि अब तो मजबूरी में किसान टमाटरों को खेत की मेड़ या सड़क पर फेंककर विरोध जताने लगे हैं. कुछ किसानों का कहना है कि उन्होंने तो खेत में ही फसल पर हल चलवा दिया, क्योंकि मजदूरी तक नहीं निकल पा रही थी.
टमाटर अब बे-भाव हो चुका है
कुछ माह पूर्व तक अपने रंग अनुरूप सुर्ख भावों को लेकर चर्चा में रहने वाला टमाटर अब बे-भाव हो चुका है. हालत यह है कि स्थानीय सब्जी मंडी में भाव नहीं मिल रहे हैं. सब्जी के थोक विक्रेता संतोष यादव का कहना है कि, ''सब्जी मंडी में रोजाना 200 से 300 क्विंटल टमाटर की आवक हो रही है, लेकिन हालत यह हो गई है कि मात्र 2 से 3 रुपये किलो में टमाटर खरीदी की जा रही है. टमाटर के भावों की बहुत बुरी हालत है.''
टमाटर उत्पादकों का कहना है कि, ''उत्पादन लागत ही टमाटर के विक्रय मूल्य से तीन गुना लगती है.'' उधर सब्जी विक्रेताओं के अनुसार, ठंड के दिनों में सब्जियों के दामों में कमी आती है. इस समय टमाटर की जोरदार आवक होने के कारण टमाटर के मंडी में खरीदार नहीं मिल रहे हैं. इसके कारण टमाटर के भाव काफी कम हो गए हैं.

किसानों को इस बार भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है
व्यापारी परेश नामदेव ने बताया है कि, ''इस बार टमाटर की आवक तो भरपूर रही, लेकिन कम भाव मिलने का एक कारण यह भी है कि महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और शिवपुरी बेल्ट एक साथ मंडी के लिए चालू हुईं, जिसके चलते मंडी में दबाव बनने लगा. आवक अधिक होने के कारण अब व्यापारी भी किसानों से माल कम दाम पर खरीद रहे हैं. जिसके चलते किसानों को इस बार भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है.''

बाजार में खेरची (सिक्के) में टमाटर 8 से 10 रुपये किलो मिल रहा है. भावों में कमी का सीधा कारण अधिक उत्पादन होना और मांग कम होना है. जिले में टमाटर की कोई बड़ी प्रोसेसिंग यूनिट नहीं है. किसानों ने बेहतर तकनीक अपनाकर टमाटर फसल का उत्पादन तो अधिक ले लिया है, लेकिन उन्हें बाजार उपलब्ध नहीं हो पा रहा है.
उपज ले जाने का परिवहन महंगा पड़ने लगा है
अंजड़ के किसान अमित सोलंकी ने बताया कि, ''डेढ़ एकड़ खेत में टमाटर लगाए थे. उत्पादन भी अच्छा निकल रहा है. लेकिन मंडियों में भाव नहीं मिलने से लागत निकालना तो दूर, मंडी तक उपज ले जाने का परिवहन महंगा पड़ने लगा है. ऐसे में खेत से निकली फसल को खेत की मेड़ पर फेंक दिया गया है. डेढ़ एकड़ में करीब एक लाख से ज्यादा की लागत लगी थी, मगर लागत भी नही निकल पाई. उल्टा टमाटर तुड़वाई के पैसे घर से देना पड़ रहा है.'' अंजड़ के एक अन्य किसान मदन कहते हैं कि, ''गेहूं, चने के समान सब्जियों का भी समर्थन मूल्य सरकार को घोषित करना चाहिए.''
यह बड़ी चिंता की बात है
किसानों के हितों के लिए संघर्षरत राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंगठन के जिला अध्यक्ष मदन मुलेवा ने किसानों को टमाटर के कम भाव मिलने पर चिंता जाहिर की. उन्होंने कहा कि, ''किसान इतनी मेहनत और लागत से फसल तैयार करता है और आज इसे फेंकने की नोबत आ गई है. पूर्व में राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंगठन ने एक साल तक दिल्ली में आंदोलन किया था. हमारी मांग है कि किसानों की सब्जियों की भी एमएसपी घोषित होना चाहिए.''
