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Video : "ना जीवन में चैन, ना मरण में सुकून: बेहलोट श्मशान की दुर्दशा"
गंज बासौदा (विदिशा)।
कभी आपने सोचा है, जब जीवन की सबसे अंतिम रस्म – अग्नि संस्कार – भी छत की टपकन और तिरपाल के भरोसे हो जाए, तो क्या सच में हम सभ्य समाज कहलाने के काबिल हैं?
गंज बासौदा के बेहलोट बायपास पर बना श्मशान घाट इन दिनों किसी उपेक्षित खंडहर से कम नहीं। बुधवार शाम, जब प्रमोद शर्मा 'भर्री' अपनी मां गीता बाई शर्मा को अंतिम विदाई देने पहुंचे, तभी आसमान फट पड़ा। बारिश ने जैसे वर्षों से उपेक्षा की कहानी को उजागर करने की कसम खा रखी थी।
टीन शेड की जर्जर छत से लगातार पानी टपकता रहा — और नीचे, चिता जलाने की तैयारी कर रहा परिवार असहाय खड़ा रहा। ये दृश्य सिर्फ एक परिवार की तकलीफ़ नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता की तस्वीर बन गया।
भीगते लोग, गीली लकड़ियाँ, और ऊपर से चिता पर गिरती बारिश — यह कोई कथा नहीं, जमीनी हकीकत थी। स्थानीय लोग दौड़कर एक तिरपाल लेकर आए, दो युवक जान जोखिम में डालकर शेड की छत पर चढ़े, तिरपाल फैलाया गया। कुछ राहत मिली — लेकिन चिता की गर्मी से वह तिरपाल भी जल उठा। फिर भी, गांव के सहयोग और हौसले से अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की जा सकी।
पर क्या सवाल भीग गया?
डॉ. सुनील राय और समाजसेवी राजकुमार शुक्ला कहते हैं — यह सिर्फ एक दिन की घटना नहीं है, यह सालों से चलती आ रही बेइंतजामी की कथा है। इस श्मशान में न ढंग का शेड है, न बारिश में निकलने लायक जलनिकासी। बरसात में पूरा परिसर तालाब बन जाता है।
विडंबना यह है कि यह श्मशान शहरी सीमा में तो आता है, पर प्रशासनिक अधिकार हरदूखेड़ी पंचायत के पास हैं। इस “सीमारेखा” के बीच में फंसी जनता अपने मृतकों की भी गरिमा नहीं बचा पा रही।
एक सवाल...
हम स्मार्ट शहरों की बात करते हैं, मगर क्या अंतिम संस्कार भी स्मार्टली और सम्मानपूर्वक नहीं किया जा सकता? क्या सुकून अब सिर्फ सपनों में ही मिलता है — ज़िंदगी में भी नहीं, मौत के बाद भी नहीं?
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गंज बासौदा (विदिशा)।
कभी आपने सोचा है, जब जीवन की सबसे अंतिम रस्म – अग्नि संस्कार – भी छत की टपकन और तिरपाल के भरोसे हो जाए, तो क्या सच में हम सभ्य समाज कहलाने के काबिल हैं?
गंज बासौदा के बेहलोट बायपास पर बना श्मशान घाट इन दिनों किसी उपेक्षित खंडहर से कम नहीं। बुधवार शाम, जब प्रमोद शर्मा 'भर्री' अपनी मां गीता बाई शर्मा को अंतिम विदाई देने पहुंचे, तभी आसमान फट पड़ा। बारिश ने जैसे वर्षों से उपेक्षा की कहानी को उजागर करने की कसम खा रखी थी।
टीन शेड की जर्जर छत से लगातार पानी टपकता रहा — और नीचे, चिता जलाने की तैयारी कर रहा परिवार असहाय खड़ा रहा। ये दृश्य सिर्फ एक परिवार की तकलीफ़ नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता की तस्वीर बन गया।
भीगते लोग, गीली लकड़ियाँ, और ऊपर से चिता पर गिरती बारिश — यह कोई कथा नहीं, जमीनी हकीकत थी। स्थानीय लोग दौड़कर एक तिरपाल लेकर आए, दो युवक जान जोखिम में डालकर शेड की छत पर चढ़े, तिरपाल फैलाया गया। कुछ राहत मिली — लेकिन चिता की गर्मी से वह तिरपाल भी जल उठा। फिर भी, गांव के सहयोग और हौसले से अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की जा सकी।
पर क्या सवाल भीग गया?
डॉ. सुनील राय और समाजसेवी राजकुमार शुक्ला कहते हैं — यह सिर्फ एक दिन की घटना नहीं है, यह सालों से चलती आ रही बेइंतजामी की कथा है। इस श्मशान में न ढंग का शेड है, न बारिश में निकलने लायक जलनिकासी। बरसात में पूरा परिसर तालाब बन जाता है।
विडंबना यह है कि यह श्मशान शहरी सीमा में तो आता है, पर प्रशासनिक अधिकार हरदूखेड़ी पंचायत के पास हैं। इस “सीमारेखा” के बीच में फंसी जनता अपने मृतकों की भी गरिमा नहीं बचा पा रही।
एक सवाल...
हम स्मार्ट शहरों की बात करते हैं, मगर क्या अंतिम संस्कार भी स्मार्टली और सम्मानपूर्वक नहीं किया जा सकता? क्या सुकून अब सिर्फ सपनों में ही मिलता है — ज़िंदगी में भी नहीं, मौत के बाद भी नहीं?
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