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आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के दर्जे पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, राज्य सरकार से जवाब तलब
जबलपुर (म.प्र.)
जबलपुर हाईकोर्ट में संघ की याचिका पर सुनवाई; कोर्ट ने पूछा—स्थायी काम लेने के बावजूद सरकारी कर्मचारी का दर्जा क्यों नहीं
मध्यप्रदेश में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को लेकर लंबे समय से चली आ रही मांगें अब न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ गई हैं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को सरकारी कर्मचारी का दर्जा, समान वेतन और अन्य सुविधाएं दिए जाने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से कड़ा सवाल किया है। अदालत ने कहा कि जब आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं से नियमित और स्थायी प्रकृति का काम लिया जा रहा है, तो उन्हें सरकारी कर्मचारी का दर्जा क्यों नहीं दिया जा रहा।
यह मामला सोमवार को जस्टिस विशाल धगट की एकलपीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने महिला एवं बाल विकास विभाग के प्रमुख सचिव, आयुक्त सहित अन्य संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने राज्य सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा है कि वर्षों से सेवाएं देने वाली आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को संवैधानिक अधिकारों और सेवा सुरक्षा से वंचित क्यों रखा गया है।
यह याचिका मध्यप्रदेश आंगनबाड़ी कार्यकर्ता संघ, टीकमगढ़ की प्रदेश महासचिव संगीता श्रीवास्तव की ओर से दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, पोषण कार्यक्रम, टीकाकरण, शिक्षा और सामाजिक कल्याण से जुड़ी कई सरकारी योजनाओं का जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन कर रही हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें न तो नियमित कर्मचारी का दर्जा मिला है और न ही समान वेतनमान या अन्य सरकारी सुविधाएं।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मोहम्मद अली और अधिवक्ता अहमद साजिद हुसैन ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार ने अब तक आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए कोई नियमित कैडर नहीं बनाया है। जबकि उनसे वर्षों से निरंतर सेवाएं ली जा रही हैं, जो स्थायी प्रकृति की हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि सरकार कार्य तो स्थायी ले रही है, लेकिन अधिकार देने से बच रही है।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं से उनके निर्धारित दायरे से बाहर के कार्य भी कराए जा रहे हैं। इनमें बीएलओ ड्यूटी, जनगणना, चुनाव कार्य और अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियां शामिल हैं, जो सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के विपरीत हैं। संघ का कहना है कि यह न केवल श्रम कानूनों का उल्लंघन है, बल्कि कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों पर भी आघात है।
संघ ने संविधान में निहित “समान काम के लिए समान वेतन” के सिद्धांत का हवाला देते हुए मांग की है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को नियमित वेतन, वार्षिक वेतन वृद्धि, अवकाश, सामाजिक सुरक्षा और अन्य सभी लाभ दिए जाएं, जो नियमित सरकारी कर्मचारियों को मिलते हैं।
हाईकोर्ट की इस टिप्पणी को आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के संघर्ष के लिहाज से अहम माना जा रहा है। अब सभी की नजरें राज्य सरकार के जवाब पर टिकी हैं, जिससे यह तय होगा कि इस मामले में आगे की दिशा क्या होगी।
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आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के दर्जे पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, राज्य सरकार से जवाब तलब
जबलपुर (म.प्र.)
मध्यप्रदेश में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को लेकर लंबे समय से चली आ रही मांगें अब न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ गई हैं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को सरकारी कर्मचारी का दर्जा, समान वेतन और अन्य सुविधाएं दिए जाने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से कड़ा सवाल किया है। अदालत ने कहा कि जब आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं से नियमित और स्थायी प्रकृति का काम लिया जा रहा है, तो उन्हें सरकारी कर्मचारी का दर्जा क्यों नहीं दिया जा रहा।
यह मामला सोमवार को जस्टिस विशाल धगट की एकलपीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने महिला एवं बाल विकास विभाग के प्रमुख सचिव, आयुक्त सहित अन्य संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने राज्य सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा है कि वर्षों से सेवाएं देने वाली आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को संवैधानिक अधिकारों और सेवा सुरक्षा से वंचित क्यों रखा गया है।
यह याचिका मध्यप्रदेश आंगनबाड़ी कार्यकर्ता संघ, टीकमगढ़ की प्रदेश महासचिव संगीता श्रीवास्तव की ओर से दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, पोषण कार्यक्रम, टीकाकरण, शिक्षा और सामाजिक कल्याण से जुड़ी कई सरकारी योजनाओं का जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन कर रही हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें न तो नियमित कर्मचारी का दर्जा मिला है और न ही समान वेतनमान या अन्य सरकारी सुविधाएं।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मोहम्मद अली और अधिवक्ता अहमद साजिद हुसैन ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार ने अब तक आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए कोई नियमित कैडर नहीं बनाया है। जबकि उनसे वर्षों से निरंतर सेवाएं ली जा रही हैं, जो स्थायी प्रकृति की हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि सरकार कार्य तो स्थायी ले रही है, लेकिन अधिकार देने से बच रही है।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं से उनके निर्धारित दायरे से बाहर के कार्य भी कराए जा रहे हैं। इनमें बीएलओ ड्यूटी, जनगणना, चुनाव कार्य और अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियां शामिल हैं, जो सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के विपरीत हैं। संघ का कहना है कि यह न केवल श्रम कानूनों का उल्लंघन है, बल्कि कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों पर भी आघात है।
संघ ने संविधान में निहित “समान काम के लिए समान वेतन” के सिद्धांत का हवाला देते हुए मांग की है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को नियमित वेतन, वार्षिक वेतन वृद्धि, अवकाश, सामाजिक सुरक्षा और अन्य सभी लाभ दिए जाएं, जो नियमित सरकारी कर्मचारियों को मिलते हैं।
हाईकोर्ट की इस टिप्पणी को आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के संघर्ष के लिहाज से अहम माना जा रहा है। अब सभी की नजरें राज्य सरकार के जवाब पर टिकी हैं, जिससे यह तय होगा कि इस मामले में आगे की दिशा क्या होगी।
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