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हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: 'वर्दी पुलिस की, लेकिन दिल अपराधियों के साथ', DGP को एक महीने में सर्कुलर जारी करने का आदेश
Digital Desk
गिरफ्तारी के लिखित कारण नहीं बताने पर जताई कड़ी नाराजगी, कहा- ऐसी लापरवाही से अपराधियों को मिलता है कानूनी फायदा; सभी थाना प्रभारियों और जांच अधिकारियों को चेतावनी जारी करने के निर्देश
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने पुलिस अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताते हुए राज्य के पुलिस विभाग को बड़ा संदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कुछ पुलिस अधिकारी कानून की रक्षा के लिए वर्दी पहनते जरूर हैं, लेकिन उनके कामकाज से ऐसा लगता है कि उनका झुकाव अपराधियों को बचाने की ओर है। कोर्ट ने इस तरह की लापरवाही को न्याय व्यवस्था और समाज दोनों के लिए गंभीर खतरा बताया है।
हाईकोर्ट ने प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया है कि एक महीने के भीतर सभी थाना प्रभारियों और विवेचना अधिकारियों के लिए सख्त सर्कुलर जारी किया जाए। इस सर्कुलर में स्पष्ट रूप से बताया जाए कि किसी भी आरोपी को गिरफ्तार करते समय उसे गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में देना अनिवार्य है। यदि कोई अधिकारी ऐसा नहीं करता है तो इसे केवल प्रक्रियागत चूक नहीं, बल्कि आरोपी को कानूनी लाभ पहुंचाने की मंशा के रूप में देखा जाएगा।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी की प्रक्रिया कानून के दायरे में रहकर ही पूरी की जानी चाहिए। यदि पुलिस अधिकारी निर्धारित नियमों का पालन नहीं करते हैं तो इसका सीधा लाभ अपराधियों को अदालत से राहत मिलने के रूप में मिलता है। ऐसी स्थिति में न केवल जांच प्रभावित होती है बल्कि न्यायिक प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े होते हैं।
यह टिप्पणी जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की खंडपीठ ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए की। यह याचिका धर्मेंद्र लोधी ने अपने भाई की गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए दायर की थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि पुलिस ने उसके भाई को गिरफ्तार करते समय गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में नहीं बताए, इसलिए गिरफ्तारी को अवैध माना जाए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पूरे मामले के रिकॉर्ड का विस्तार से परीक्षण किया। जांच में सामने आया कि संबंधित आरोपी के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट के तहत मामला दर्ज था और पुलिस ने उसे धारा 50 के तहत आवश्यक लिखित नोटिस दिया था। आरोपी के कब्जे से करीब 86.850 किलोग्राम गांजा भी बरामद किया गया था। इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने गिरफ्तारी को वैध माना और याचिका खारिज कर दी।
हालांकि अदालत ने यह भी माना कि कई मामलों में पुलिस अधिकारी गिरफ्तारी की अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया का पूरी तरह पालन नहीं करते। यही वजह है कि कई गंभीर मामलों में आरोपी तकनीकी आधार पर अदालत से राहत हासिल कर लेते हैं। कोर्ट ने कहा कि यदि पुलिस की ओर से गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में नहीं दिए जाते तो यह केवल साधारण लापरवाही नहीं मानी जाएगी, बल्कि यह माना जाएगा कि संबंधित अधिकारी ने जानबूझकर ऐसी चूक की ताकि आरोपी को कानूनी फायदा मिल सके।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस मुख्यालय भोपाल की कार्यप्रणाली पर भी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन में पुलिस मुख्यालय ने इसी वर्ष 13 फरवरी 2026 को एक सर्कुलर जारी किया था, जिसमें गिरफ्तारी की प्रक्रिया से जुड़े स्पष्ट निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर कई थाना प्रभारी और विवेचना अधिकारी इन निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं। अदालत ने इसे गंभीर प्रशासनिक विफलता माना।
हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस की जिम्मेदारी केवल अपराध दर्ज करना नहीं है, बल्कि कानून के अनुरूप जांच करना और दोषियों के खिलाफ मजबूत केस तैयार करना भी है। यदि जांच अधिकारी ही नियमों की अनदेखी करेंगे तो अपराधियों को सजा दिलाना मुश्किल हो जाएगा और जनता का न्याय व्यवस्था पर भरोसा कमजोर पड़ेगा।
अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि पुलिस विभाग को ऐसे अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी चाहिए, जो लापरवाही या जानबूझकर की गई चूक के कारण अपराधियों को राहत दिलाने का रास्ता तैयार करते हैं। कोर्ट ने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में विभागीय कार्रवाई भी जरूरी है, ताकि भविष्य में कोई अधिकारी कानून की अनदेखी करने का साहस न कर सके।
हाईकोर्ट ने डीजीपी को निर्देश दिया कि सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों, थाना प्रभारियों और जांच अधिकारियों तक यह संदेश स्पष्ट रूप से पहुंचाया जाए कि गिरफ्तारी के समय कानूनी प्रक्रिया का पालन हर हाल में किया जाना चाहिए। यदि किसी अधिकारी की ओर से दोबारा ऐसी लापरवाही सामने आती है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सकती है।
इस फैसले को पुलिस व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रिया दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कानून विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत की यह टिप्पणी भविष्य में पुलिस जांच की गुणवत्ता सुधारने और गिरफ्तारी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है। साथ ही इससे उन मामलों में भी कमी आएगी, जहां तकनीकी खामियों के कारण आरोपी अदालत से राहत पाने में सफल हो जाते हैं।
हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब पुलिस मुख्यालय पर जिम्मेदारी होगी कि वह निर्धारित समय सीमा के भीतर नया सर्कुलर जारी कर सभी अधिकारियों को कानून के प्रावधानों का सख्ती से पालन कराने की व्यवस्था सुनिश्चित करे। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अदालत के निर्देशों का जमीनी स्तर पर कितना प्रभाव दिखाई देता है और पुलिस व्यवस्था में किस तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं।
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हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: 'वर्दी पुलिस की, लेकिन दिल अपराधियों के साथ', DGP को एक महीने में सर्कुलर जारी करने का आदेश
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मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने पुलिस अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताते हुए राज्य के पुलिस विभाग को बड़ा संदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कुछ पुलिस अधिकारी कानून की रक्षा के लिए वर्दी पहनते जरूर हैं, लेकिन उनके कामकाज से ऐसा लगता है कि उनका झुकाव अपराधियों को बचाने की ओर है। कोर्ट ने इस तरह की लापरवाही को न्याय व्यवस्था और समाज दोनों के लिए गंभीर खतरा बताया है।
हाईकोर्ट ने प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया है कि एक महीने के भीतर सभी थाना प्रभारियों और विवेचना अधिकारियों के लिए सख्त सर्कुलर जारी किया जाए। इस सर्कुलर में स्पष्ट रूप से बताया जाए कि किसी भी आरोपी को गिरफ्तार करते समय उसे गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में देना अनिवार्य है। यदि कोई अधिकारी ऐसा नहीं करता है तो इसे केवल प्रक्रियागत चूक नहीं, बल्कि आरोपी को कानूनी लाभ पहुंचाने की मंशा के रूप में देखा जाएगा।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी की प्रक्रिया कानून के दायरे में रहकर ही पूरी की जानी चाहिए। यदि पुलिस अधिकारी निर्धारित नियमों का पालन नहीं करते हैं तो इसका सीधा लाभ अपराधियों को अदालत से राहत मिलने के रूप में मिलता है। ऐसी स्थिति में न केवल जांच प्रभावित होती है बल्कि न्यायिक प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े होते हैं।
यह टिप्पणी जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की खंडपीठ ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए की। यह याचिका धर्मेंद्र लोधी ने अपने भाई की गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए दायर की थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि पुलिस ने उसके भाई को गिरफ्तार करते समय गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में नहीं बताए, इसलिए गिरफ्तारी को अवैध माना जाए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पूरे मामले के रिकॉर्ड का विस्तार से परीक्षण किया। जांच में सामने आया कि संबंधित आरोपी के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट के तहत मामला दर्ज था और पुलिस ने उसे धारा 50 के तहत आवश्यक लिखित नोटिस दिया था। आरोपी के कब्जे से करीब 86.850 किलोग्राम गांजा भी बरामद किया गया था। इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने गिरफ्तारी को वैध माना और याचिका खारिज कर दी।
हालांकि अदालत ने यह भी माना कि कई मामलों में पुलिस अधिकारी गिरफ्तारी की अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया का पूरी तरह पालन नहीं करते। यही वजह है कि कई गंभीर मामलों में आरोपी तकनीकी आधार पर अदालत से राहत हासिल कर लेते हैं। कोर्ट ने कहा कि यदि पुलिस की ओर से गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में नहीं दिए जाते तो यह केवल साधारण लापरवाही नहीं मानी जाएगी, बल्कि यह माना जाएगा कि संबंधित अधिकारी ने जानबूझकर ऐसी चूक की ताकि आरोपी को कानूनी फायदा मिल सके।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस मुख्यालय भोपाल की कार्यप्रणाली पर भी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन में पुलिस मुख्यालय ने इसी वर्ष 13 फरवरी 2026 को एक सर्कुलर जारी किया था, जिसमें गिरफ्तारी की प्रक्रिया से जुड़े स्पष्ट निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर कई थाना प्रभारी और विवेचना अधिकारी इन निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं। अदालत ने इसे गंभीर प्रशासनिक विफलता माना।
हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस की जिम्मेदारी केवल अपराध दर्ज करना नहीं है, बल्कि कानून के अनुरूप जांच करना और दोषियों के खिलाफ मजबूत केस तैयार करना भी है। यदि जांच अधिकारी ही नियमों की अनदेखी करेंगे तो अपराधियों को सजा दिलाना मुश्किल हो जाएगा और जनता का न्याय व्यवस्था पर भरोसा कमजोर पड़ेगा।
अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि पुलिस विभाग को ऐसे अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी चाहिए, जो लापरवाही या जानबूझकर की गई चूक के कारण अपराधियों को राहत दिलाने का रास्ता तैयार करते हैं। कोर्ट ने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में विभागीय कार्रवाई भी जरूरी है, ताकि भविष्य में कोई अधिकारी कानून की अनदेखी करने का साहस न कर सके।
हाईकोर्ट ने डीजीपी को निर्देश दिया कि सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों, थाना प्रभारियों और जांच अधिकारियों तक यह संदेश स्पष्ट रूप से पहुंचाया जाए कि गिरफ्तारी के समय कानूनी प्रक्रिया का पालन हर हाल में किया जाना चाहिए। यदि किसी अधिकारी की ओर से दोबारा ऐसी लापरवाही सामने आती है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सकती है।
इस फैसले को पुलिस व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रिया दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कानून विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत की यह टिप्पणी भविष्य में पुलिस जांच की गुणवत्ता सुधारने और गिरफ्तारी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है। साथ ही इससे उन मामलों में भी कमी आएगी, जहां तकनीकी खामियों के कारण आरोपी अदालत से राहत पाने में सफल हो जाते हैं।
हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब पुलिस मुख्यालय पर जिम्मेदारी होगी कि वह निर्धारित समय सीमा के भीतर नया सर्कुलर जारी कर सभी अधिकारियों को कानून के प्रावधानों का सख्ती से पालन कराने की व्यवस्था सुनिश्चित करे। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अदालत के निर्देशों का जमीनी स्तर पर कितना प्रभाव दिखाई देता है और पुलिस व्यवस्था में किस तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं।
