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मध्य प्रदेश में वैज्ञानिक उत्खननों से प्राचीन सांस्कृतिक विरासत के महत्वपूर्ण साक्ष्य प्राप्त
Digital Desk
संचालनालय पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय द्वारा मध्य प्रदेश में किए गए पुरातात्विक उत्खननों ने राज्य की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को नई दृष्टि प्रदान की है। उत्खनन वह वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से पुरातत्वविद् भूमि के भीतर दबे प्राचीन बस्तियों एवं संरचनाओं के अवशेषों को खोजकर प्रकाश में लाते हैं। मुख्यतः दो प्रकार के उत्खनन किए जाते हैं; वर्टिकल एक्सकेवेशन, जिसके माध्यम से किसी स्थल का सांस्कृतिक क्रम ज्ञात किया जाता है, तथा हॉरिजॉन्टल एक्सकेवेशन, जिसके द्वारा स्थल की समग्र सांस्कृतिक और राजनीतिक संरचना का अध्ययन किया जाता है।
भारत में संगठित उत्खनन कार्य वर्ष 1861 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की स्थापना के साथ प्रारंभ हुए, जब अलेक्जेंडर कनिंघम पहले डायरेक्टर जनरल नियुक्त हुए। वर्ष 1902 में सर जॉन मार्शल के नेतृत्व में वैज्ञानिक पद्धतियों को अधिक व्यवस्थित रूप से अपनाया गया। उनके काल में मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे विश्वप्रसिद्ध स्थलों पर व्यापक उत्खनन संपन्न हुए। सर मोर्टायमर व्हीलर के समय (1944-1948) भारतीय पुरातत्व के उत्खनन की प्रविधि में नया मोड आया और अधिक वैज्ञानिक तरीके से उत्खनन करने के लिए व्हर्टिकल और हॉरिजॉन्टल तकनीक अपनाई गई।
मध्य प्रदेश में वर्ष 1936 में कस्रावद में उत्खनन कार्य प्रारंभ हुए तथा बाद में उज्जैन सहित अन्य स्थलों पर अनुसंधान आगे बढ़ा। स्वतंत्रता के पश्चात 1956 में राज्य के पुनर्गठन के साथ राज्य पुरातत्व विभाग की स्थापना हुई और विधिवत उत्खनन प्रारंभ हुए। डेक्कन कॉलेज, पुणे तथा अन्य विश्वविद्यालयों के सहयोग से अब तक लगभग 55–56 स्थलों पर उत्खनन किए जा चुके हैं। वर्ष 1995 से 2005 के बीच विशेष अभियान के अंतर्गत तीन टीमों द्वारा कुल 35 उत्खनन कार्य संपन्न किए गए।
हाल के प्रमुख उत्खननों में मनोरा (जिला सतना) और उज्जैन विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। वर्ष 2019–20 में उज्जैन के ऋण मुक्तेश्वर टीले पर उत्खनन किया गया, जिसमें छठी शताब्दी ईसा पूर्व तक के अवशेष प्राप्त हुए। सर्वेक्षण के दौरान पीजीडब्ल्यू (Painted Grey Ware) के कुछ टुकड़े मिले थे, हालांकि स्तरीय क्रम में यह प्राप्त नहीं हुआ। ब्लैक एंड रेड वेयर तथा अन्य प्रारंभिक अवशेषों ने स्थल की प्राचीनता को प्रमाणित किया।
मनोरा स्थल पर वर्ष 2001 में पुरातत्वविद् एस. एन. रौशल्या द्वारा सर्वेक्षण किया गया, जिसमें मंदिरों और बस्तियों के व्यापक अवशेष मिले। वर्ष 2008 में जबलपुर के पुरातत्वविद् एम. के. माहेश्वरी द्वारा उत्खनन किया गया, जिसमें दो मंदिरों के अवशेष प्राप्त हुए तथा बड़ी संख्या में मूर्तियों का संकलन किया गया। साथ ही 108 मंदिरों के साक्ष्य चिन्हित किए गए। वर्ष 2014 में डॉ. डी. के. माथुर, पुरातत्वीय अधिकार भोपाल द्वारा उत्खनन किया गया, जिसमें दो मंदिरों का कार्य पूर्ण हुआ। वर्ष 2018–19 में डॉ. रमेश यादव के निर्देशन में वाकणकर संस्थान द्वारा पुनः उत्खनन किया गया। इस दौरान बस्ती क्षेत्र से ईंट एवं पत्थर से निर्मित एक राजमहल के अवशेष प्राप्त हुए, जिनमें निम्न स्तर पर कुषाणकालीन ईंटों की पहचान हुई। इससे संकेत मिलता है कि बस्ती का विकास कुषाण काल से आरंभ होकर गुप्त काल में एक समृद्ध नगर के रूप में हुआ।
उत्खनन के दौरान वाकाटक राजवंश से संबंधित महत्वपूर्ण साक्ष्य भी प्राप्त हुए। प्रयाग प्रशस्ति में उल्लिखित रुद्रसेन का संबंध वाकाटक वंश से जोड़ा गया है और मनोरा को उनकी संभावित राजधानी माना गया है। सतना जिले के बघाट क्षेत्र से प्राप्त स्तंभ लेख में ‘वाकाटक’ शब्द अंकित है। उच्चकल्प वंश के राजा जयनाथ के अभिलेखों में उल्लिखित ग्रामों की पहचान आज भी संभव है, जिससे मनोरा की भौगोलिक चतुर्सीमा निर्धारित की गई।
राज्य पुरातत्व विभाग ग्राम-स्तरीय सर्वेक्षण के आधार पर संभावित स्थलों का चयन कर प्राथमिकता के अनुसार उत्खनन की योजना बनाता है। वर्तमान में ग्वालियर क्षेत्र में उत्खनन अपेक्षाकृत कम हुए हैं तथा भिंड जिले के कुछ स्थलों को भविष्य की कार्ययोजना में शामिल किया गया है।
मध्य प्रदेश के इन वैज्ञानिक एवं संगठित उत्खननों ने राज्य की ऐतिहासिक धरोहर को सुदृढ़ आधार प्रदान करते हुए भारतीय इतिहास के अनेक महत्वपूर्ण अध्यायों को स्पष्ट किया है।

