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वेश्यावृत्ति से जुड़े मामले में हाईकोर्ट सख्त, IG से कहा– सोच बदलिए, 11 साल का रिकॉर्ड पेश करें
मध्य प्रदेश
जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने मांगा 11 वर्षों का गुमशुदगी डेटा, पुलिस के रवैये पर जताई कड़ी आपत्ति
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने लड़कियों की कथित तस्करी और वेश्यावृत्ति से जुड़े एक गंभीर मामले में पुलिस प्रशासन के दृष्टिकोण पर सवाल उठाते हुए सख्त रुख अपनाया है। ग्वालियर खंडपीठ ने ग्वालियर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक अरविंद सक्सेना को व्यक्तिगत रूप से पेश होने के निर्देश दिए हैं। साथ ही अदालत ने पिछले 11 वर्षों में संभाग से लापता हुई लड़कियों और उनकी बरामदगी से जुड़ा विस्तृत रिकॉर्ड भी तलब किया है।
यह आदेश पायल नामक महिला द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि शिवपुरी जिले में कुछ लोग युवतियों को बंधक बनाकर उनसे जबरन देह व्यापार करवा रहे हैं। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ऋषिकेश बोहरे ने अदालत को बताया कि इस संबंध में प्रशासन और पुलिस को कई बार जानकारी देने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
सुनवाई के दौरान जब राज्य सरकार की ओर से जवाब पेश किया गया तो अदालत ने उस पर तीखी प्रतिक्रिया दी। शासन ने अपने जवाब में इस पूरे मामले को आपसी पारिवारिक विवाद बताया था। हाईकोर्ट ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि यदि लगाए गए आरोपों में सत्यता है, तो मामला केवल निजी विवाद का नहीं, बल्कि गंभीर आपराधिक गतिविधियों और मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़ा है।
खंडपीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि पुलिस को महिलाओं और नाबालिगों से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ काम करना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ऐसे मामलों को नजरअंदाज करना या हल्के में लेना स्वीकार्य नहीं है। इसी संदर्भ में कोर्ट ने आईजी को अपनी कार्यशैली और सोच में बदलाव लाने की आवश्यकता बताई।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि वर्ष 2014 से अब तक ग्वालियर संभाग में दर्ज सभी गुमशुदगी मामलों का विवरण पेश किया जाए। इसमें यह जानकारी भी शामिल होगी कि कितनी लड़कियां लापता घोषित की गईं, कितनी को खोज निकाला गया और कितने मामलों में जांच अब तक लंबित है। अदालत ने यह भी संकेत दिए कि आंकड़ों के विश्लेषण के बाद आगे और सख्त निर्देश जारी किए जा सकते हैं।
इस मामले में पहले शिवपुरी जिले के पुलिस अधीक्षक को भी तलब किया जा चुका है। अदालत का कहना है कि केवल कागजी जवाब देकर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। जमीनी स्तर पर की गई कार्रवाई और उसके परिणामों का लेखा-जोखा जरूरी है।
हाईकोर्ट के इस रुख के बाद पुलिस महकमे में हलचल बढ़ गई है। अधिकारियों के अनुसार, पुराने रिकॉर्ड को जुटाने और सत्यापित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। वहीं सामाजिक संगठनों और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने अदालत के हस्तक्षेप को अहम बताते हुए कहा है कि इससे लड़कियों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में जवाबदेही तय होगी।
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