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एमपी में गिद्धों की गिनती अंतिम दौर में, संख्या 14 हजार पार होने के संकेत
भोपाल (म.प्र.)
मध्य प्रदेश में गिद्धों की गणना अंतिम चरण में पहुंची। शुरुआती रिपोर्ट में संख्या 14 हजार के पार जाने का अनुमान जताया गया है।
मध्य प्रदेश में गिद्धों की गणना का काम रविवार को तीसरे दिन भी चलता रहा। अब सबकी नजर फाइनल आंकड़ों पर है, लेकिन शुरुआती रिपोर्ट में गिद्धों की संख्या 14 हजार के पार पहुंचने का अनुमान लगाया गया है। वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, इस बार राज्य के 16 वन वृत्त, 9 टाइगर रिजर्व और अन्य संरक्षित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर गिनती की गई है। खास बात यह है कि पहली बार ऑनलाइन एप के जरिए पूरी निगरानी और डेटा एंट्री की जा रही है, जिससे रिपोर्ट तैयार करना काफी आसान हो गया है। सुबह सूरज निकलने के तुरंत बाद टीमें जंगलों और गिद्धों के घोंसले वाले इलाकों में पहुंचीं। कई जगहों पर लाल सिर वाले और सफेद पीठ वाले गिद्ध नजर आए हैं।
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, पन्ना क्षेत्र में रेड हेडेड वल्चर यानी लाल सिर वाले गिद्ध मिले हैं, वहीं भोपाल के वन विहार नेशनल पार्क में सफेद पीठ वाले गिद्धों की मौजूदगी देखी गई। फरवरी में हुए सर्वे में प्रदेश में करीब सात प्रजातियों के गिद्ध पाए गए थे, जिनमें भारतीय गिद्ध, सिनेरियस गिद्ध, मिस्र गिद्ध और हिमालयन ग्रिफॉन प्रमुख रहे। वन विभाग का कहना है कि पिछले लगभग दस साल में प्रदेश में गिद्धों की संख्या तेजी से बढ़ी है। 2019 में इनकी संख्या करीब 8 हजार थी, जबकि 2025 की गणना में यह बढ़कर 12,981 तक पहुंच गई थी। इस बार तो संख्या और भी बढ़ने की संभावना है।
गणना की प्रक्रिया भी काफी ध्यानपूर्वक की जा रही है। गणनाकर्मी और स्वयंसेवक घोंसलों के आसपास बैठे गिद्धों और उनके बच्चों की गिनती कर एप में जानकारी दर्ज कर रहे हैं। अधिकारियों के अनुसार, उड़ते हुए गिद्धों को गिनती में शामिल नहीं किया जाता, ताकि दोबारा गिनने में गलती न हो। कई इलाकों में सुबह 9 बजे तक ही सर्वे का काम पूरा कर लिया गया, क्योंकि उसके बाद तापमान बढ़ने लगता है और गिद्ध ऊंचाई पर उड़ने लगते हैं। बताया जा रहा है कि इस बार टाइगर रिजर्व क्षेत्रों से भी अच्छी संख्या सामने आ सकती है।
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि गिद्ध कभी विलुप्त होने की कगार पर थे। एक वक्त था जब भारत में इनकी संख्या करोड़ों में थी, लेकिन पशुओं के लिए इस्तेमाल होने वाली डाइक्लोफेनाक दवा के कारण बड़ी संख्या में गिद्धों की मौत होने लगी। इसके बाद इस दवा पर प्रतिबंध लगा दिया गया और उससे धीरे-धीरे इनकी संख्या में सुधार दिखने लगा। मध्य प्रदेश में संरक्षण के लिए लगातार प्रयास किए गए हैं। भोपाल के वन विहार में करीब तीन साल पहले हरियाणा से सफेद पीठ वाले 20 गिद्ध लाए गए थे, जिन्हें संरक्षण केंद्र में रखा गया है।
गिद्धों की प्रजनन प्रक्रिया भी काफी धीमी मानी जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, ये पक्षी साल में सिर्फ एक बार अंडा देते हैं और बच्चे के जीवित निकलने की संभावना लगभग 50 फीसदी होती है। यही वजह है कि उनकी संख्या बढ़ने में समय लगता है। फिलहाल, प्रदेश में लगातार बढ़ती संख्या को वन विभाग ने सकारात्मक संकेत माना है। अधिकारियों का कहना है कि अंतिम रिपोर्ट आने के बाद स्थिति और स्पष्ट होगी, लेकिन शुरुआती आंकड़े काफी उत्साहजनक हैं।
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एमपी में गिद्धों की गिनती अंतिम दौर में, संख्या 14 हजार पार होने के संकेत
भोपाल (म.प्र.)
मध्य प्रदेश में गिद्धों की गणना का काम रविवार को तीसरे दिन भी चलता रहा। अब सबकी नजर फाइनल आंकड़ों पर है, लेकिन शुरुआती रिपोर्ट में गिद्धों की संख्या 14 हजार के पार पहुंचने का अनुमान लगाया गया है। वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, इस बार राज्य के 16 वन वृत्त, 9 टाइगर रिजर्व और अन्य संरक्षित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर गिनती की गई है। खास बात यह है कि पहली बार ऑनलाइन एप के जरिए पूरी निगरानी और डेटा एंट्री की जा रही है, जिससे रिपोर्ट तैयार करना काफी आसान हो गया है। सुबह सूरज निकलने के तुरंत बाद टीमें जंगलों और गिद्धों के घोंसले वाले इलाकों में पहुंचीं। कई जगहों पर लाल सिर वाले और सफेद पीठ वाले गिद्ध नजर आए हैं।
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, पन्ना क्षेत्र में रेड हेडेड वल्चर यानी लाल सिर वाले गिद्ध मिले हैं, वहीं भोपाल के वन विहार नेशनल पार्क में सफेद पीठ वाले गिद्धों की मौजूदगी देखी गई। फरवरी में हुए सर्वे में प्रदेश में करीब सात प्रजातियों के गिद्ध पाए गए थे, जिनमें भारतीय गिद्ध, सिनेरियस गिद्ध, मिस्र गिद्ध और हिमालयन ग्रिफॉन प्रमुख रहे। वन विभाग का कहना है कि पिछले लगभग दस साल में प्रदेश में गिद्धों की संख्या तेजी से बढ़ी है। 2019 में इनकी संख्या करीब 8 हजार थी, जबकि 2025 की गणना में यह बढ़कर 12,981 तक पहुंच गई थी। इस बार तो संख्या और भी बढ़ने की संभावना है।
गणना की प्रक्रिया भी काफी ध्यानपूर्वक की जा रही है। गणनाकर्मी और स्वयंसेवक घोंसलों के आसपास बैठे गिद्धों और उनके बच्चों की गिनती कर एप में जानकारी दर्ज कर रहे हैं। अधिकारियों के अनुसार, उड़ते हुए गिद्धों को गिनती में शामिल नहीं किया जाता, ताकि दोबारा गिनने में गलती न हो। कई इलाकों में सुबह 9 बजे तक ही सर्वे का काम पूरा कर लिया गया, क्योंकि उसके बाद तापमान बढ़ने लगता है और गिद्ध ऊंचाई पर उड़ने लगते हैं। बताया जा रहा है कि इस बार टाइगर रिजर्व क्षेत्रों से भी अच्छी संख्या सामने आ सकती है।
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि गिद्ध कभी विलुप्त होने की कगार पर थे। एक वक्त था जब भारत में इनकी संख्या करोड़ों में थी, लेकिन पशुओं के लिए इस्तेमाल होने वाली डाइक्लोफेनाक दवा के कारण बड़ी संख्या में गिद्धों की मौत होने लगी। इसके बाद इस दवा पर प्रतिबंध लगा दिया गया और उससे धीरे-धीरे इनकी संख्या में सुधार दिखने लगा। मध्य प्रदेश में संरक्षण के लिए लगातार प्रयास किए गए हैं। भोपाल के वन विहार में करीब तीन साल पहले हरियाणा से सफेद पीठ वाले 20 गिद्ध लाए गए थे, जिन्हें संरक्षण केंद्र में रखा गया है।
गिद्धों की प्रजनन प्रक्रिया भी काफी धीमी मानी जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, ये पक्षी साल में सिर्फ एक बार अंडा देते हैं और बच्चे के जीवित निकलने की संभावना लगभग 50 फीसदी होती है। यही वजह है कि उनकी संख्या बढ़ने में समय लगता है। फिलहाल, प्रदेश में लगातार बढ़ती संख्या को वन विभाग ने सकारात्मक संकेत माना है। अधिकारियों का कहना है कि अंतिम रिपोर्ट आने के बाद स्थिति और स्पष्ट होगी, लेकिन शुरुआती आंकड़े काफी उत्साहजनक हैं।
