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"दिल्ली उत्तर देना सीखे इजराइल की शैली में": 'सिंदूरी अक्षर' कवि सम्मेलन में गूंजे राष्ट्रभक्ति के ओजस्वी स्वर
Bhopal, MP
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित रविंद्र भवन के हंसध्वनि सभागार में सोमवार रात राष्ट्रभक्ति, शौर्य और संवेदना से ओतप्रोत एक ऐतिहासिक कवि सम्मेलन ‘सिंदूरी अक्षर’ का आयोजन हुआ। मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित इस अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में मंच पर देशभर से आए प्रख्यात कवियों ने मातृभूमि, जवानों की शहादत और देशधर्म पर आधारित ओजपूर्ण कविताएं प्रस्तुत कर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की गरिमामयी उपस्थिति
कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव स्वयं उपस्थित रहे और उन्होंने आयोजन को नई ऊंचाई प्रदान की। उनके साथ सांसद वी.डी. शर्मा, राज्यमंत्री कृष्णा गौर, विधायक भगवानदास सबनानी, संस्कृति विभाग के प्रमुख सचिव शिवशेखर शुक्ला, सांस्कृतिक सलाहकार श्रीराम तिवारी, संचालक एन.पी. नामदेव एवं उपसंचालक डॉ. पूजा शुक्ला सहित बड़ी संख्या में नागरिक एवं साहित्यप्रेमी मौजूद रहे।
कविता के स्वर बने शौर्य के उद्घोष
कार्यक्रम की शुरुआत युवा कवि अमन अक्षर (इंदौर) की मार्मिक पंक्तियों से हुई—
“मुझे लड़ना है दुनिया से अकेले अब तुम्हारे बिन, अगर मैं हार जाऊं तो मुझे कमज़ोर मत कहना...”
सुमित मिश्रा (ओरछा) ने ओज और चेतावनी के स्वर में कहा—
“हां अभी है शांति किंतु क्रांति का इक दौर होगा... जिसके हाथ में शस्त्र रहेगा, वो ही बचने वाला है।”
शैलेन्द्र मधुर (प्रयागराज) की पंक्ति— “हम तिरंगे का दर्द जीते हैं”, ने श्रोताओं को गहराई से छू लिया।
डॉ. जानी बैरागी (राजोद) ने हास्य में लपेटकर कहा—
“बुझ ही नहीं सकती ये आग... क्योंकि ये लगी कम, फैलाई गई ज्यादा है।”
अनु सपन (भोपाल) की कविताएं विशेष रूप से संवेदना से भरी थीं—
“जब भी जाओगे कश्मीर की राह पर, कुछ सिसकती हुई चूड़ियां आएंगी...”
मंच संचालन और ओज की पराकाष्ठा
कार्यक्रम का सफल संचालन वरिष्ठ कवि दिनेश दिग्गज (उज्जैन) ने किया, जिन्होंने अपने शब्दों में वीर रस का अद्भुत प्रवाह जोड़ा।
“अक्षर सिंदूरी बोलेंगे...” की ओजस्वी लय में जब कवियों की वाणी गूंजी, तो सभागार राष्ट्रप्रेम की लहरों से सराबोर हो गया।
हरिओम पवार की कविताओं से झलकी चेतावनी और राष्ट्रधर्म
कार्यक्रम के अंतिम चरण में डॉ. हरिओम पवार (मेरठ) की कविताएं जैसे सभागार की आत्मा को झकझोर गईं।
उनकी मुखर और चेतावनी भरी पंक्तियां—
“बंदूकों की गोली का उत्तर सद्भाव नहीं होता... भेड़िया शाकाहारी कभी नहीं हो सकता है...”
और विशेषकर—
“दिल्ली उत्तर देना सीखे इजराइल की शैली में...”
ने दर्शकों के हृदय में जोश भर दिया और तालियों की गड़गड़ाहट देर तक गूंजती रही।
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Bhopal, MP
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की गरिमामयी उपस्थिति
कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव स्वयं उपस्थित रहे और उन्होंने आयोजन को नई ऊंचाई प्रदान की। उनके साथ सांसद वी.डी. शर्मा, राज्यमंत्री कृष्णा गौर, विधायक भगवानदास सबनानी, संस्कृति विभाग के प्रमुख सचिव शिवशेखर शुक्ला, सांस्कृतिक सलाहकार श्रीराम तिवारी, संचालक एन.पी. नामदेव एवं उपसंचालक डॉ. पूजा शुक्ला सहित बड़ी संख्या में नागरिक एवं साहित्यप्रेमी मौजूद रहे।
कविता के स्वर बने शौर्य के उद्घोष
कार्यक्रम की शुरुआत युवा कवि अमन अक्षर (इंदौर) की मार्मिक पंक्तियों से हुई—
“मुझे लड़ना है दुनिया से अकेले अब तुम्हारे बिन, अगर मैं हार जाऊं तो मुझे कमज़ोर मत कहना...”
सुमित मिश्रा (ओरछा) ने ओज और चेतावनी के स्वर में कहा—
“हां अभी है शांति किंतु क्रांति का इक दौर होगा... जिसके हाथ में शस्त्र रहेगा, वो ही बचने वाला है।”
शैलेन्द्र मधुर (प्रयागराज) की पंक्ति— “हम तिरंगे का दर्द जीते हैं”, ने श्रोताओं को गहराई से छू लिया।
डॉ. जानी बैरागी (राजोद) ने हास्य में लपेटकर कहा—
“बुझ ही नहीं सकती ये आग... क्योंकि ये लगी कम, फैलाई गई ज्यादा है।”
अनु सपन (भोपाल) की कविताएं विशेष रूप से संवेदना से भरी थीं—
“जब भी जाओगे कश्मीर की राह पर, कुछ सिसकती हुई चूड़ियां आएंगी...”
मंच संचालन और ओज की पराकाष्ठा
कार्यक्रम का सफल संचालन वरिष्ठ कवि दिनेश दिग्गज (उज्जैन) ने किया, जिन्होंने अपने शब्दों में वीर रस का अद्भुत प्रवाह जोड़ा।
“अक्षर सिंदूरी बोलेंगे...” की ओजस्वी लय में जब कवियों की वाणी गूंजी, तो सभागार राष्ट्रप्रेम की लहरों से सराबोर हो गया।
हरिओम पवार की कविताओं से झलकी चेतावनी और राष्ट्रधर्म
कार्यक्रम के अंतिम चरण में डॉ. हरिओम पवार (मेरठ) की कविताएं जैसे सभागार की आत्मा को झकझोर गईं।
उनकी मुखर और चेतावनी भरी पंक्तियां—
“बंदूकों की गोली का उत्तर सद्भाव नहीं होता... भेड़िया शाकाहारी कभी नहीं हो सकता है...”
और विशेषकर—
“दिल्ली उत्तर देना सीखे इजराइल की शैली में...”
ने दर्शकों के हृदय में जोश भर दिया और तालियों की गड़गड़ाहट देर तक गूंजती रही।
