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RSS की क्लास के बीच मोहन यादव का बड़ा ऐलान, सवाल उठा शासकों पर भी सिलेक्टिव
BHOPAL, MP
मध्य प्रदेश की राजधानी के चौराहों पर राजाभोज और विक्रमादित्य के नाम पर बनेंगे द्वार. RSS के प्रशिक्षण वर्ग के बीच मोहन यादव का ऐलान
ये इत्तेफाक नहीं है कि जिस समय संघ प्रमुख मोहन भागवत भोपाल में हैं और राजधानी भोपाल में जिस समय संघ का प्रशिक्षण वर्ग चल रहा है. ठीक उसी समय मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने मध्य प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले वीर शासकों को याद करते हुए ये एलान कर रहे हैं कि अब चौराहों पर राजाभोज और राजा विक्रमादित्य के नाम पर द्वारा बनाए जाएंगे. अब तक इतिहास के पन्नों में कैद रहे इन जननायकों को जनमानस की स्मृतियों में जीवंत करने के साथ क्या सीएम डॉ मोहन यादव संघ के एजेंडे पर ही आगे बढ़ रहे हैं. इस समय लिए गए इस निर्णय की गूंज देर तक और दूर होगी.
चौराहे पर जननायक के नाम के बुलंद दरवाजें
चौराहों के नाम और उन पर नेताओं के जननायकों की मूर्तियों को लेकर लंबे समय से राजनीति गर्माती रही है, लेकिन अब इस राजनीति में सीएम डॉ मोहन यादव ने नया अध्याय जोड़ दिया है. सीएम डॉ मोहन यादव ने कहा है कि "राजधानी भोपाल के प्रमुख मार्गों पर द्वार सजाए जाएंगे. ये द्वार राजा भोज और राजा विक्रमादित्य जैसे भारत वर्ष के उन शासकों के नाम पर होंगे. जिन्होंने अपनी प्रजा के सामने आदर्श प्रस्तुत किए. उन्होंने कहा कि राजधानी का जो गौरवशाली इतिहास है, उसका अहम हिस्सा है, राजाभोज जिन्होंने बड़े तालाब की सौगात राजधानी को दी है.
उन्होंने कहा कि इसके माध्यम से भोपाल और मध्य प्रदेश का गौरवशाली इतिहास एक बार फिर दुनिया के सामने आएगा. उन्होंने कहा कि राजा विक्रमादित्य और राजा भोज मध्य प्रदेश की पहचान हैं. 2100 वर्ष पहले राजा विक्रमादित्य ने शासन किया था. इन शासकों ने जिस तरह से न्याय प्रियता से अपने पराक्रम से अपनी वीरता से मानदंड स्थापित किए, वो अतुलनीय है. उन्होंने राजा भोज का उल्लेख करते हुए कहा कि "राजा भोज ने भोपाल में बड़े तालाब जैसी संरचना बनाई, जो उनके समृद्ध इतिहास का साक्षी है. जब राजधानी के प्रमुख प्रवेश द्वार इनके नाम पर होंगे, तो ये राजधानी के गौरव की बात होगी."

आरएसएस की बैठक के दौरान इस निर्णय के मायने
अब सवाल ये कि इस निर्णय के पीछे की प्रासंगिकता क्या है. जानकार मानते हैं कि जिस समय मध्य प्रदेश में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का प्रशिक्षण वर्ग चल रहा है. जब स्वयं संघ प्रमुख डॉ मोहन भागवत भोपाल में हैं. उस समय मुख्यमंत्री का ये निर्णय दूर तक सुना जाएगा. वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक प्रकाश भटनागर कहते हैं, "डॉ मोहन यादव को समय भले अभी कम हुआ है, लेकिन पिच पर जमे रहना और खेलना वो जानते हैं. कौन सी बात कब सामयिक है. ये निर्णय डॉ मोहन यादव यूं भी लेते ही, लेकिन इस समय इस निर्णय के मायने बहुत गहरे हो गए. उन्होंने संदेश भी दे दिया कि संघ के विचार पर ही वे किस तरह आगे बढ़ रहे हैं."

तो भोपाल में दोस्त मोहम्मद खान ने फिर क्या किया
उधर मध्य प्रदेश सरकार के इस फैसले पर सवाल उठने लगे हैं. अब तक शहरों के चौराहों पर देशभक्त शहीदों की मूर्तियां लगती थी. या शहरों के चौराहे के नाम उनके नाम पर रखे जाते थे, लेकिन अब सरकार राजधानी भोपाल में चौराहों पर वीर शहीदों के नाम पर द्वार होंगे. मुस्लिम विकास परिषद ने चौराहों पर जो द्वार सजेंगे, उनमें निश्चित राजाओं के नाम पर उन्हें समर्पित किए जाने को लेकर सवाल उठाया है. इस मुद्दे पर खुलकर विरोध दर्ज कराया है.
मंच के प्रमुख मोहम्मद माहिर का कहना है कि "तो क्या सरकार अब शासकों में भी भेदभाव करेगी. राजा विक्रमादित्य और राजा भोज का बेशक स्वर्णिम इतिहास रहा है, लेकिन क्या भोपाल को बसाने में दोस्त मोहम्मद खान की कोई भूमिका नहीं थी. सवाल ये है कि आप इतिहास से शासकों के सिलेक्शन में सिलेक्टिव कैसे हो सकते हैं."
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RSS की क्लास के बीच मोहन यादव का बड़ा ऐलान, सवाल उठा शासकों पर भी सिलेक्टिव
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ये इत्तेफाक नहीं है कि जिस समय संघ प्रमुख मोहन भागवत भोपाल में हैं और राजधानी भोपाल में जिस समय संघ का प्रशिक्षण वर्ग चल रहा है. ठीक उसी समय मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने मध्य प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले वीर शासकों को याद करते हुए ये एलान कर रहे हैं कि अब चौराहों पर राजाभोज और राजा विक्रमादित्य के नाम पर द्वारा बनाए जाएंगे. अब तक इतिहास के पन्नों में कैद रहे इन जननायकों को जनमानस की स्मृतियों में जीवंत करने के साथ क्या सीएम डॉ मोहन यादव संघ के एजेंडे पर ही आगे बढ़ रहे हैं. इस समय लिए गए इस निर्णय की गूंज देर तक और दूर होगी.
चौराहे पर जननायक के नाम के बुलंद दरवाजें
चौराहों के नाम और उन पर नेताओं के जननायकों की मूर्तियों को लेकर लंबे समय से राजनीति गर्माती रही है, लेकिन अब इस राजनीति में सीएम डॉ मोहन यादव ने नया अध्याय जोड़ दिया है. सीएम डॉ मोहन यादव ने कहा है कि "राजधानी भोपाल के प्रमुख मार्गों पर द्वार सजाए जाएंगे. ये द्वार राजा भोज और राजा विक्रमादित्य जैसे भारत वर्ष के उन शासकों के नाम पर होंगे. जिन्होंने अपनी प्रजा के सामने आदर्श प्रस्तुत किए. उन्होंने कहा कि राजधानी का जो गौरवशाली इतिहास है, उसका अहम हिस्सा है, राजाभोज जिन्होंने बड़े तालाब की सौगात राजधानी को दी है.
उन्होंने कहा कि इसके माध्यम से भोपाल और मध्य प्रदेश का गौरवशाली इतिहास एक बार फिर दुनिया के सामने आएगा. उन्होंने कहा कि राजा विक्रमादित्य और राजा भोज मध्य प्रदेश की पहचान हैं. 2100 वर्ष पहले राजा विक्रमादित्य ने शासन किया था. इन शासकों ने जिस तरह से न्याय प्रियता से अपने पराक्रम से अपनी वीरता से मानदंड स्थापित किए, वो अतुलनीय है. उन्होंने राजा भोज का उल्लेख करते हुए कहा कि "राजा भोज ने भोपाल में बड़े तालाब जैसी संरचना बनाई, जो उनके समृद्ध इतिहास का साक्षी है. जब राजधानी के प्रमुख प्रवेश द्वार इनके नाम पर होंगे, तो ये राजधानी के गौरव की बात होगी."

आरएसएस की बैठक के दौरान इस निर्णय के मायने
अब सवाल ये कि इस निर्णय के पीछे की प्रासंगिकता क्या है. जानकार मानते हैं कि जिस समय मध्य प्रदेश में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का प्रशिक्षण वर्ग चल रहा है. जब स्वयं संघ प्रमुख डॉ मोहन भागवत भोपाल में हैं. उस समय मुख्यमंत्री का ये निर्णय दूर तक सुना जाएगा. वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक प्रकाश भटनागर कहते हैं, "डॉ मोहन यादव को समय भले अभी कम हुआ है, लेकिन पिच पर जमे रहना और खेलना वो जानते हैं. कौन सी बात कब सामयिक है. ये निर्णय डॉ मोहन यादव यूं भी लेते ही, लेकिन इस समय इस निर्णय के मायने बहुत गहरे हो गए. उन्होंने संदेश भी दे दिया कि संघ के विचार पर ही वे किस तरह आगे बढ़ रहे हैं."

तो भोपाल में दोस्त मोहम्मद खान ने फिर क्या किया
उधर मध्य प्रदेश सरकार के इस फैसले पर सवाल उठने लगे हैं. अब तक शहरों के चौराहों पर देशभक्त शहीदों की मूर्तियां लगती थी. या शहरों के चौराहे के नाम उनके नाम पर रखे जाते थे, लेकिन अब सरकार राजधानी भोपाल में चौराहों पर वीर शहीदों के नाम पर द्वार होंगे. मुस्लिम विकास परिषद ने चौराहों पर जो द्वार सजेंगे, उनमें निश्चित राजाओं के नाम पर उन्हें समर्पित किए जाने को लेकर सवाल उठाया है. इस मुद्दे पर खुलकर विरोध दर्ज कराया है.
मंच के प्रमुख मोहम्मद माहिर का कहना है कि "तो क्या सरकार अब शासकों में भी भेदभाव करेगी. राजा विक्रमादित्य और राजा भोज का बेशक स्वर्णिम इतिहास रहा है, लेकिन क्या भोपाल को बसाने में दोस्त मोहम्मद खान की कोई भूमिका नहीं थी. सवाल ये है कि आप इतिहास से शासकों के सिलेक्शन में सिलेक्टिव कैसे हो सकते हैं."
