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माह ए रमजान का नजर आया चांद, रहमतों और बरकतों वाले महीने का आगाज, क्यों रखा जाता है रोजा
BHOPAL, MP
शनिवार को रमजान का चांद नजर आया. रविवार से पहला रोजा शुरु हुआ. पूरे महीने इस्लाम धर्म के लोग शिद्दत से अल्लाह की इबादत करेंगे.
इस्लामिक माह के मुताबिक शाबान (इस्लामिक माह) के बाद आने वाला महीना रमजानुल मुबारक (इस्लामिक माह) का महीना है. जिसे सभी माह से अफजल (पवित्र) माह माना जाता है. जिसकी शुरुआत 1 मार्च 2025 की देर शाम मगरीब (सूर्यास्त के समय) की नमाज के बाद नजर आने वाले चांद के बाद हो गई. जिसके बाद सभी मस्जिदों में तरावीह की नमाज का दौर भी शुरू हो गया. 2 मार्च से पहला रोजा शुरु हुआ.
पूरे महीने रोजा रखेंगे अल्लाह के नेक बंदे
इस्लाम धर्म का अनुसरण करने वाले लोग 29 से 30 दिनों तक रोजा रखेंगे और ईद का चांद नजर आने तक ये सिलसिला जारी रहेगा. हालांकि भारत के अलावा अन्य देशों में ये चांद दिखाई देने पर निर्भर करता है. इस्लाम को मानने वाले लोग रमजान के दौरान सुबह सहरी करते हैं और फिर पूरे दिन रोजे रखने के बाद शाम को अपना रोजा खोलते हैं.

पवित्र माह रमजान के मुताल्लिक (संबंधित) फजीलत (श्रेष्ठता) को लेकर ईटीवी भारत की टीम ने राजगढ़ के उलेमा (इस्लाम धर्म के विद्वान) से बात की है. जिन्होंने इस्लामिक माह रमजान और उससे जुड़ी बारीकियों से रूबरू कराया. राजगढ़ शहर काजी सैयद नाजिम अली ईटीवी भारत से बात करते हुए कहते हैं, ''रमजान का महीना बड़ा ही अफजल है, जिसके रोजे इस्लाम धर्म का अनुसरण करने वाले पुरुष और महिलाओं पर फर्ज यानी कि अनिवार्य है.''
''जिसका मकसद यह है कि, जिस तरह से रोजा रखकर बन्दा अल्लाह (ईश्वर) से डरकर तय वक्त से पहले न खाता है न पीता है और बुराइयों से भी महफूज (बचता) होता है, तो रमजान के महीने के अलावा वह पूरे साल, या यू कहे कि पूरी जिंदगी इंसान दुनिया में रहकर बुराइयों का त्याग करे और अच्छाइयों को अपनाते हुए अपनी जिंदगी गुजारे. जिसका फल स्वयं अल्लाह (ईश्वर ) बंदों को अता फरमाता है. क्योंकि रोजा सिर्फ अल्लाह (ईश्वर) के लिए रखा जाता है.''
रमजान में ही दुनिया में आया था कुरआन
साथ ही शहर काजी आलिम सैयद नाजिम अली बताते हैं कि, ''इसी माह में कुरआन उतारा गया, जो कि दुनिया के तमाम इंसानों के लिए जिंदगी गुजारने का एक बेहतरीन नमूना है. इसमें पाक किताब में बताया गया है कि, एक इंसान को अपनी जिंदगी किस तरह से गुजारनी चाहिए. इसलिए इस माह में कुरआन की भी ज्यादा से ज्यादा तिलावत (पढ़ाई) की जाती है और तरावीह की नमाज में भी कुरआन सुना जाता है.''
रहमतों और बख्शिश का महीना रमजान
इसके अतिरिक्त उन्होंने विस्तार पूर्वक रमजान माह की तमाम फजीलते (श्रेष्ठता) बतलाई हैं. अंत में वे कहते हैं कि, ''ये पूरा महीना रहमत का दुआओं का और बख्शिश का महीना है, इसलिए इस माह की कद्र करें और जैसे इसे गुजराने का हुक्म है उस तरह से गुजारें. अपने बड़ों और बच्चों से अच्छे से पेश आएं. जिन कामों को इस्लाम में मना किया है उसे करने से बचना चाहिए.''
रविवार से पहला रोजा
शनिवार शाम को चांद नजर आने के बाद से ही ईशा की नमाज के बाद तरावीह की नमाज का सिलसिला शुरू हो गया. उसी रात के आखिरी हिस्से में मुस्लिम लोग सेहरी करने के लिए उठे और दिन भर भूखे प्यासे रहकर अपना रोजा मुकम्मल (पूरा) कर रहे हैं. रविवार शाम को मगरिब की नमाज से पहले रोजेदार अपना रोखा तोड़ेंगे. इस बार रोजा करीब 14 घंटे का रहेगा. इसलिए इफ्तारी में कोशिश करें की रसीलें फल खाएं. जिससे शरीर में दिनभर भूखे प्यासे रहने के बाद भी एनर्जी बनी रहे और शरीर को जरूरत के मुताबिक मिनरल्स मिलते रहें.
खजूर से रोजा खोलना पैगंबर साहब की सुन्नत
ईटीवी भारत से बात करते हुए सैयद नाजिम अली बताते हैं कि, खजूर से रोजा इफ्तार (उपवास तोड़ना) हमारे नबी ए पाक की सुन्नत है, और इससे रोजा इसलिए इफ्तार करना चाहिए, क्योंकि इससे बदन के अंदर ताकत आती है, और शरीर में एनर्जी बनी रहती है. रोजा रखने वाला व्यक्ति इससे तंदुरुस्त रहता है. इफ्तार में अधिक ठंडी चीजें खाने से बचें क्योंकि इसका असर हमारे लीवर पर होता है. इसलिए खजूर का इस्तेमाल हमारे लिए ज्यादा फायदेमंद है. जिससे सुन्नत (पैगंबर साहब द्वारा दी गई शिक्षा) भी जिंदा होगी.
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माह ए रमजान का नजर आया चांद, रहमतों और बरकतों वाले महीने का आगाज, क्यों रखा जाता है रोजा
BHOPAL, MP
इस्लामिक माह के मुताबिक शाबान (इस्लामिक माह) के बाद आने वाला महीना रमजानुल मुबारक (इस्लामिक माह) का महीना है. जिसे सभी माह से अफजल (पवित्र) माह माना जाता है. जिसकी शुरुआत 1 मार्च 2025 की देर शाम मगरीब (सूर्यास्त के समय) की नमाज के बाद नजर आने वाले चांद के बाद हो गई. जिसके बाद सभी मस्जिदों में तरावीह की नमाज का दौर भी शुरू हो गया. 2 मार्च से पहला रोजा शुरु हुआ.
पूरे महीने रोजा रखेंगे अल्लाह के नेक बंदे
इस्लाम धर्म का अनुसरण करने वाले लोग 29 से 30 दिनों तक रोजा रखेंगे और ईद का चांद नजर आने तक ये सिलसिला जारी रहेगा. हालांकि भारत के अलावा अन्य देशों में ये चांद दिखाई देने पर निर्भर करता है. इस्लाम को मानने वाले लोग रमजान के दौरान सुबह सहरी करते हैं और फिर पूरे दिन रोजे रखने के बाद शाम को अपना रोजा खोलते हैं.

पवित्र माह रमजान के मुताल्लिक (संबंधित) फजीलत (श्रेष्ठता) को लेकर ईटीवी भारत की टीम ने राजगढ़ के उलेमा (इस्लाम धर्म के विद्वान) से बात की है. जिन्होंने इस्लामिक माह रमजान और उससे जुड़ी बारीकियों से रूबरू कराया. राजगढ़ शहर काजी सैयद नाजिम अली ईटीवी भारत से बात करते हुए कहते हैं, ''रमजान का महीना बड़ा ही अफजल है, जिसके रोजे इस्लाम धर्म का अनुसरण करने वाले पुरुष और महिलाओं पर फर्ज यानी कि अनिवार्य है.''
''जिसका मकसद यह है कि, जिस तरह से रोजा रखकर बन्दा अल्लाह (ईश्वर) से डरकर तय वक्त से पहले न खाता है न पीता है और बुराइयों से भी महफूज (बचता) होता है, तो रमजान के महीने के अलावा वह पूरे साल, या यू कहे कि पूरी जिंदगी इंसान दुनिया में रहकर बुराइयों का त्याग करे और अच्छाइयों को अपनाते हुए अपनी जिंदगी गुजारे. जिसका फल स्वयं अल्लाह (ईश्वर ) बंदों को अता फरमाता है. क्योंकि रोजा सिर्फ अल्लाह (ईश्वर) के लिए रखा जाता है.''
रमजान में ही दुनिया में आया था कुरआन
साथ ही शहर काजी आलिम सैयद नाजिम अली बताते हैं कि, ''इसी माह में कुरआन उतारा गया, जो कि दुनिया के तमाम इंसानों के लिए जिंदगी गुजारने का एक बेहतरीन नमूना है. इसमें पाक किताब में बताया गया है कि, एक इंसान को अपनी जिंदगी किस तरह से गुजारनी चाहिए. इसलिए इस माह में कुरआन की भी ज्यादा से ज्यादा तिलावत (पढ़ाई) की जाती है और तरावीह की नमाज में भी कुरआन सुना जाता है.''
रहमतों और बख्शिश का महीना रमजान
इसके अतिरिक्त उन्होंने विस्तार पूर्वक रमजान माह की तमाम फजीलते (श्रेष्ठता) बतलाई हैं. अंत में वे कहते हैं कि, ''ये पूरा महीना रहमत का दुआओं का और बख्शिश का महीना है, इसलिए इस माह की कद्र करें और जैसे इसे गुजराने का हुक्म है उस तरह से गुजारें. अपने बड़ों और बच्चों से अच्छे से पेश आएं. जिन कामों को इस्लाम में मना किया है उसे करने से बचना चाहिए.''
रविवार से पहला रोजा
शनिवार शाम को चांद नजर आने के बाद से ही ईशा की नमाज के बाद तरावीह की नमाज का सिलसिला शुरू हो गया. उसी रात के आखिरी हिस्से में मुस्लिम लोग सेहरी करने के लिए उठे और दिन भर भूखे प्यासे रहकर अपना रोजा मुकम्मल (पूरा) कर रहे हैं. रविवार शाम को मगरिब की नमाज से पहले रोजेदार अपना रोखा तोड़ेंगे. इस बार रोजा करीब 14 घंटे का रहेगा. इसलिए इफ्तारी में कोशिश करें की रसीलें फल खाएं. जिससे शरीर में दिनभर भूखे प्यासे रहने के बाद भी एनर्जी बनी रहे और शरीर को जरूरत के मुताबिक मिनरल्स मिलते रहें.
खजूर से रोजा खोलना पैगंबर साहब की सुन्नत
ईटीवी भारत से बात करते हुए सैयद नाजिम अली बताते हैं कि, खजूर से रोजा इफ्तार (उपवास तोड़ना) हमारे नबी ए पाक की सुन्नत है, और इससे रोजा इसलिए इफ्तार करना चाहिए, क्योंकि इससे बदन के अंदर ताकत आती है, और शरीर में एनर्जी बनी रहती है. रोजा रखने वाला व्यक्ति इससे तंदुरुस्त रहता है. इफ्तार में अधिक ठंडी चीजें खाने से बचें क्योंकि इसका असर हमारे लीवर पर होता है. इसलिए खजूर का इस्तेमाल हमारे लिए ज्यादा फायदेमंद है. जिससे सुन्नत (पैगंबर साहब द्वारा दी गई शिक्षा) भी जिंदा होगी.
