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पंचायत सचिवों के तबादलों पर नई सख्त गाइडलाइन जारी, गृहग्राम में पोस्टिंग पर रोक
मध्य प्रदेश
मध्य प्रदेश में 23 हजार से अधिक पंचायत सचिवों के लिए नई स्थानांतरण नीति लागू, 10 साल से अधिक पदस्थ कर्मचारियों का प्राथमिकता से होगा ट्रांसफर
मध्य प्रदेश में पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने पंचायत सचिवों के स्थानांतरण को लेकर नई और सख्त गाइडलाइन जारी कर दी है। तबादला सीजन के बीच जारी इस आदेश के बाद अब राज्य की हजारों पंचायतों में कार्यरत सचिवों की तैनाती व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। नई नीति के अनुसार अब कोई भी पंचायत सचिव अपने गृहग्राम या ससुराल की पंचायत में पदस्थ नहीं रह सकेगा। इसके साथ ही यदि किसी सचिव के रिश्तेदार सरपंच या उपसरपंच चुने जाते हैं तो ऐसी स्थिति में संबंधित सचिव का तबादला अनिवार्य रूप से किया जाएगा।
प्रदेश में यह निर्णय सामान्य प्रशासन विभाग के निर्देशों के आधार पर लिया गया है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने सभी जिला कलेक्टरों और जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि स्थानांतरण प्रक्रिया निर्धारित समय सीमा के भीतर पूरी की जाए। राज्य में वर्तमान में 23 हजार से अधिक पंचायत सचिव कार्यरत हैं, जिन पर इस नई नीति का सीधा असर पड़ेगा।
जारी आदेश के अनुसार 15 जून तक केवल जिले के भीतर ही पंचायत सचिवों के स्थानांतरण किए जा सकेंगे। इस पूरी प्रक्रिया में स्थानांतरण प्रस्ताव जिला कलेक्टर की अनुशंसा और प्रभारी मंत्री की स्वीकृति के बाद ही लागू होंगे। विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह प्रक्रिया 1 जून से प्रभावी मानी जाएगी। सभी स्थानांतरण आदेश जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी द्वारा जारी किए जाएंगे। इसके साथ ही जिला और अंतरजिला स्तर पर स्थानांतरण की विस्तृत प्रक्रिया भी तय कर दी गई है।
सरकार के इस निर्णय के पीछे लंबे समय से चली आ रही प्रशासनिक और स्थानीय स्तर की समस्याएं प्रमुख कारण बताई जा रही हैं। विभागीय जानकारी के अनुसार वर्ष 1994 से 1996 के बीच पंचायत कर्मियों की नियुक्ति ग्राम सभा के अनुमोदन से की गई थी, जो आज पंचायत सचिव के रूप में कार्यरत हैं। उस समय कई मामलों में सरपंच, उपसरपंच या प्रभावशाली व्यक्तियों के रिश्तेदारों को ही नियुक्त किया गया था। इसके कारण कई जगहों पर हितों के टकराव और प्रशासनिक गड़बड़ियों की शिकायतें सामने आती रही हैं।
प्रशासन का मानना है कि कई मामलों में जनप्रतिनिधि और सचिवों के बीच पारिवारिक संबंधों या व्यक्तिगत समीकरणों के कारण कार्य निष्पक्ष तरीके से प्रभावित हुआ है। जांचों में भी कई बार यह पाया गया कि कुछ स्थानों पर सरपंच, उपसरपंच और सचिवों की मिलीभगत से वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताएं हुई हैं। इसी को देखते हुए सरकार ने यह सख्त नीति लागू करने का निर्णय लिया है ताकि पंचायत स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।
नई गाइडलाइन के अनुसार कुछ परिस्थितियों में स्थानांतरण को अनिवार्य किया गया है। यदि किसी ग्राम पंचायत में सचिव का कोई रिश्तेदार सरपंच या उपसरपंच बन जाता है, तो वहां से तत्काल स्थानांतरण किया जाएगा। इसके अलावा किसी भी सचिव को उसके गृहग्राम या ससुराल की पंचायत में पदस्थ नहीं रखा जाएगा। साथ ही जो सचिव 10 वर्ष या उससे अधिक समय से एक ही पंचायत में कार्यरत हैं, उनका प्राथमिकता के आधार पर तबादला किया जाएगा। यदि स्थानांतरण की सीमा से अधिक ऐसे सचिव पाए जाते हैं जो लंबे समय से एक ही जगह कार्यरत हैं, तो सबसे अधिक अवधि से पदस्थ सचिव का पहले स्थानांतरण किया जाएगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य प्रशासनिक स्थिरता के साथ-साथ निष्पक्ष कार्य प्रणाली को बढ़ावा देना बताया गया है।
हालांकि कुछ विशेष परिस्थितियों में प्रतिबंध अवधि के दौरान भी स्थानांतरण संभव होगा। इनमें भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितता या गंभीर शिकायतों से जुड़े मामले शामिल हैं। इसके अलावा अनुशासनात्मक कार्रवाई लंबित होने, लोकायुक्त या ईओडब्ल्यू जैसी जांच एजेंसियों की कार्रवाई से जुड़े मामलों में भी सचिवों का स्थानांतरण किया जा सकेगा। उच्च प्राथमिकता वाले प्रशासनिक मामलों में शासन स्तर से निर्देश मिलने पर भी तबादला किया जा सकता है। ऐसे सभी मामलों में विभागीय मंत्री की स्वीकृति के बाद आयुक्त या पंचायत राज संचालनालय द्वारा आदेश जारी किए जाएंगे। इससे यह सुनिश्चित किया जाएगा कि गंभीर मामलों में प्रशासनिक कार्रवाई में कोई देरी न हो।
अंतरजिला स्थानांतरण को लेकर नीति में स्पष्ट किया गया है कि यह केवल स्वैच्छिक आधार पर ही किया जाएगा। महिला पंचायत सचिवों को विशेष सुविधा दी गई है, जिसके तहत विवाहित, विधवा और तलाकशुदा महिलाएं अपने पति, ससुराल या माता-पिता के जिले में स्थानांतरण के लिए आवेदन कर सकती हैं। इसके अलावा अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त सचिव भी अपने मूल जिले में स्थानांतरण के लिए पात्र होंगे।
स्थानांतरण के लिए आवेदन वर्तमान पदस्थ जिले के मुख्य कार्यपालन अधिकारी को देना होगा। इसके बाद रिक्त पदों की उपलब्धता की जांच की जाएगी। यदि संबंधित जिले में पद खाली होता है तो प्रस्ताव पंचायत राज संचालनालय भोपाल भेजा जाएगा। प्रशासनिक स्वीकृति के बाद अंतिम आदेश जारी किए जाएंगे। स्थानांतरण के बाद संबंधित सचिव को वरिष्ठता सूची में सबसे नीचे रखा जाएगा और यह सुविधा केवल एक बार ही दी जाएगी। नई नीति के लागू होने के बाद पंचायत स्तर पर प्रशासनिक व्यवस्था में बड़े बदलाव की उम्मीद की जा रही है। सरकार का मानना है कि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और स्थानीय स्तर पर होने वाली अनियमितताओं पर अंकुश लगाया जा सकेगा।
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पंचायत सचिवों के तबादलों पर नई सख्त गाइडलाइन जारी, गृहग्राम में पोस्टिंग पर रोक
मध्य प्रदेश
मध्य प्रदेश में पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने पंचायत सचिवों के स्थानांतरण को लेकर नई और सख्त गाइडलाइन जारी कर दी है। तबादला सीजन के बीच जारी इस आदेश के बाद अब राज्य की हजारों पंचायतों में कार्यरत सचिवों की तैनाती व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। नई नीति के अनुसार अब कोई भी पंचायत सचिव अपने गृहग्राम या ससुराल की पंचायत में पदस्थ नहीं रह सकेगा। इसके साथ ही यदि किसी सचिव के रिश्तेदार सरपंच या उपसरपंच चुने जाते हैं तो ऐसी स्थिति में संबंधित सचिव का तबादला अनिवार्य रूप से किया जाएगा।
प्रदेश में यह निर्णय सामान्य प्रशासन विभाग के निर्देशों के आधार पर लिया गया है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने सभी जिला कलेक्टरों और जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि स्थानांतरण प्रक्रिया निर्धारित समय सीमा के भीतर पूरी की जाए। राज्य में वर्तमान में 23 हजार से अधिक पंचायत सचिव कार्यरत हैं, जिन पर इस नई नीति का सीधा असर पड़ेगा।
जारी आदेश के अनुसार 15 जून तक केवल जिले के भीतर ही पंचायत सचिवों के स्थानांतरण किए जा सकेंगे। इस पूरी प्रक्रिया में स्थानांतरण प्रस्ताव जिला कलेक्टर की अनुशंसा और प्रभारी मंत्री की स्वीकृति के बाद ही लागू होंगे। विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह प्रक्रिया 1 जून से प्रभावी मानी जाएगी। सभी स्थानांतरण आदेश जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी द्वारा जारी किए जाएंगे। इसके साथ ही जिला और अंतरजिला स्तर पर स्थानांतरण की विस्तृत प्रक्रिया भी तय कर दी गई है।
सरकार के इस निर्णय के पीछे लंबे समय से चली आ रही प्रशासनिक और स्थानीय स्तर की समस्याएं प्रमुख कारण बताई जा रही हैं। विभागीय जानकारी के अनुसार वर्ष 1994 से 1996 के बीच पंचायत कर्मियों की नियुक्ति ग्राम सभा के अनुमोदन से की गई थी, जो आज पंचायत सचिव के रूप में कार्यरत हैं। उस समय कई मामलों में सरपंच, उपसरपंच या प्रभावशाली व्यक्तियों के रिश्तेदारों को ही नियुक्त किया गया था। इसके कारण कई जगहों पर हितों के टकराव और प्रशासनिक गड़बड़ियों की शिकायतें सामने आती रही हैं।
प्रशासन का मानना है कि कई मामलों में जनप्रतिनिधि और सचिवों के बीच पारिवारिक संबंधों या व्यक्तिगत समीकरणों के कारण कार्य निष्पक्ष तरीके से प्रभावित हुआ है। जांचों में भी कई बार यह पाया गया कि कुछ स्थानों पर सरपंच, उपसरपंच और सचिवों की मिलीभगत से वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताएं हुई हैं। इसी को देखते हुए सरकार ने यह सख्त नीति लागू करने का निर्णय लिया है ताकि पंचायत स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।
नई गाइडलाइन के अनुसार कुछ परिस्थितियों में स्थानांतरण को अनिवार्य किया गया है। यदि किसी ग्राम पंचायत में सचिव का कोई रिश्तेदार सरपंच या उपसरपंच बन जाता है, तो वहां से तत्काल स्थानांतरण किया जाएगा। इसके अलावा किसी भी सचिव को उसके गृहग्राम या ससुराल की पंचायत में पदस्थ नहीं रखा जाएगा। साथ ही जो सचिव 10 वर्ष या उससे अधिक समय से एक ही पंचायत में कार्यरत हैं, उनका प्राथमिकता के आधार पर तबादला किया जाएगा। यदि स्थानांतरण की सीमा से अधिक ऐसे सचिव पाए जाते हैं जो लंबे समय से एक ही जगह कार्यरत हैं, तो सबसे अधिक अवधि से पदस्थ सचिव का पहले स्थानांतरण किया जाएगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य प्रशासनिक स्थिरता के साथ-साथ निष्पक्ष कार्य प्रणाली को बढ़ावा देना बताया गया है।
हालांकि कुछ विशेष परिस्थितियों में प्रतिबंध अवधि के दौरान भी स्थानांतरण संभव होगा। इनमें भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितता या गंभीर शिकायतों से जुड़े मामले शामिल हैं। इसके अलावा अनुशासनात्मक कार्रवाई लंबित होने, लोकायुक्त या ईओडब्ल्यू जैसी जांच एजेंसियों की कार्रवाई से जुड़े मामलों में भी सचिवों का स्थानांतरण किया जा सकेगा। उच्च प्राथमिकता वाले प्रशासनिक मामलों में शासन स्तर से निर्देश मिलने पर भी तबादला किया जा सकता है। ऐसे सभी मामलों में विभागीय मंत्री की स्वीकृति के बाद आयुक्त या पंचायत राज संचालनालय द्वारा आदेश जारी किए जाएंगे। इससे यह सुनिश्चित किया जाएगा कि गंभीर मामलों में प्रशासनिक कार्रवाई में कोई देरी न हो।
अंतरजिला स्थानांतरण को लेकर नीति में स्पष्ट किया गया है कि यह केवल स्वैच्छिक आधार पर ही किया जाएगा। महिला पंचायत सचिवों को विशेष सुविधा दी गई है, जिसके तहत विवाहित, विधवा और तलाकशुदा महिलाएं अपने पति, ससुराल या माता-पिता के जिले में स्थानांतरण के लिए आवेदन कर सकती हैं। इसके अलावा अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त सचिव भी अपने मूल जिले में स्थानांतरण के लिए पात्र होंगे।
स्थानांतरण के लिए आवेदन वर्तमान पदस्थ जिले के मुख्य कार्यपालन अधिकारी को देना होगा। इसके बाद रिक्त पदों की उपलब्धता की जांच की जाएगी। यदि संबंधित जिले में पद खाली होता है तो प्रस्ताव पंचायत राज संचालनालय भोपाल भेजा जाएगा। प्रशासनिक स्वीकृति के बाद अंतिम आदेश जारी किए जाएंगे। स्थानांतरण के बाद संबंधित सचिव को वरिष्ठता सूची में सबसे नीचे रखा जाएगा और यह सुविधा केवल एक बार ही दी जाएगी। नई नीति के लागू होने के बाद पंचायत स्तर पर प्रशासनिक व्यवस्था में बड़े बदलाव की उम्मीद की जा रही है। सरकार का मानना है कि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और स्थानीय स्तर पर होने वाली अनियमितताओं पर अंकुश लगाया जा सकेगा।
