पेपर किसी और से लिखवाया, मैदान में भी दूसरे दौड़े, CBI की स्पेशल कोर्ट ने 7 'पुलिसवालों' को सुनाई सजा

JAGRAN DESK

मध्य प्रदेश में व्यापमं के मामलों की सुनवाई करते हुए सीबीआई की विशेष अदालत ने 7 आरोपियों को 7 साल की सजा सुनाई है। इन आरोपियों की जगह परीक्षा में कोई और बैठा, फिजिकल भी किसी और ने दिया। मामले में लगभग 9 साल बाद शिकायत के बाद कार्रवाई हुई है।

व्यापमं कांड में सीबीआई की विशेष अदालत ने एक और फैसला दिया है। 7 आरोपियों को सात—सात साल की सजा सुनाई गई है। व्यापमं मामले में बनाई गई सीबीआई की विशेष जिला कोर्ट के विशेष न्यायाधीश नीतिराज सिंह सिसोदिया ने यह फैसला सुनाया है। यह मामला 9 साल पुराना है। सातों आरोपियों पर 10-10 हजार रुपये अर्थदंड भी लगाया गया है.

क्या है पूरा मामला

सीबीआई के लोक अभियोजक सुशील कुमार पांडेय के अनुसार 7 अप्रैल 2013 में व्यापमं ने मध्य प्रदेश पुलिस आरक्षक भर्ती परीक्षा आयोजित की थी। इसकी लिखित परीक्षा में तीन प्रतियोगी विवेक त्यागी, चरण सिंह सिकरवार तथा सुनील रावत ने अपने स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति (प्रतिरूपक) को बैठा दिया। शारीरिक दक्षता परीक्षा में भी इन्होंने ऐसा ही किया। बाद में यह परीक्षा पास कर ली। बताया जाता है कि विवेक त्यागी की जगह संदीप नायक, चरण सिंह सिकरवार के स्थान पर बृजेंद्र सिंह रावत और सुनील रावत के स्थान पर लेखराज रावत उर्फ़ बंटी रावत और हरिओम रावत ने परीक्षा दी थी। यह तीनों आरोपी पुलिस आरक्षक भर्ती परीक्षा 2013 प्रथम में पास हो गए थे। बाद में जांच में यह पकड़े गए। न्यायालय ने 61 गवाहों, 300 दस्तावेजों और धाराओं के आधार पर सभी सात आरोपित को सजा सुनाई गई। जिसमें एक आरोपित लेखराज रावत उर्फ़ बंटी रावत की पूर्व में मृत्यु हो चुकी है।

क्या है व्यापमं घोटाला?

व्यापमं घोटाले की शुरुआत साल 2007-08 में मानी जाती है। जब स्थानीय निधि लेखा परीक्षक कार्यालय की रिपोर्ट में अनियमितताओं का पता चला। साल 2013 में इंदौर पुलिस ने शहर के कई होटलों में से 20 लोगों को गिरफ़्तार किया था, जिनमें से 17 लोग उत्तर प्रदेश से थे और ये असली परीक्षार्थियों के बदले खुद केंद्र में बैठकर परीक्षा देने आए थे। इस मामले में पहले एमपी पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स ने इसकी जांच की। बाद में 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने व्यापमं केस की जांच सीबीआई को सौंपी थी। बाद में सरकार ने इसका नाम बदलकर प्रोफेशनल एग्जामिनेशन बोर्ड कर दिया। इसके बाद इसकी संरचना में बदलाव करके इसे एम्पलाई सिलेक्शन बोर्ड कहा जाने लगा।

2024 में सुप्रीम कोर्ट ने दिया नोटिस

सितंबर 2024 में ही सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को व्यापमं घोटाले पर नोटिस जारी किया है। कांग्रेस नेता, पूर्व निर्दलीय विधायक और व्यापमं मामले के व्हिसलब्लोअर कांग्रेस नेता पारस सकलेचा ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। वर्ष 2009 में व्यापमं घोटाला सामने आने के बाद सकलेचा ने एसटीएफ को दस्तावेज के साथ आवेदन सौंपकर कुछ बिंदुओं पर जांच की मांग की थी। लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। इस आवेदन पर जांच के लिए उन्होंने पिछले वर्ष हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में याचिका दायर की। इस पर एसटीएफ को दिए आवेदन पर कार्यवाही की मांग की।

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27 Nov 2024 By दैनिक जागरण

पेपर किसी और से लिखवाया, मैदान में भी दूसरे दौड़े, CBI की स्पेशल कोर्ट ने 7 'पुलिसवालों' को सुनाई सजा

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व्यापमं कांड में सीबीआई की विशेष अदालत ने एक और फैसला दिया है। 7 आरोपियों को सात—सात साल की सजा सुनाई गई है। व्यापमं मामले में बनाई गई सीबीआई की विशेष जिला कोर्ट के विशेष न्यायाधीश नीतिराज सिंह सिसोदिया ने यह फैसला सुनाया है। यह मामला 9 साल पुराना है। सातों आरोपियों पर 10-10 हजार रुपये अर्थदंड भी लगाया गया है.

क्या है पूरा मामला

सीबीआई के लोक अभियोजक सुशील कुमार पांडेय के अनुसार 7 अप्रैल 2013 में व्यापमं ने मध्य प्रदेश पुलिस आरक्षक भर्ती परीक्षा आयोजित की थी। इसकी लिखित परीक्षा में तीन प्रतियोगी विवेक त्यागी, चरण सिंह सिकरवार तथा सुनील रावत ने अपने स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति (प्रतिरूपक) को बैठा दिया। शारीरिक दक्षता परीक्षा में भी इन्होंने ऐसा ही किया। बाद में यह परीक्षा पास कर ली। बताया जाता है कि विवेक त्यागी की जगह संदीप नायक, चरण सिंह सिकरवार के स्थान पर बृजेंद्र सिंह रावत और सुनील रावत के स्थान पर लेखराज रावत उर्फ़ बंटी रावत और हरिओम रावत ने परीक्षा दी थी। यह तीनों आरोपी पुलिस आरक्षक भर्ती परीक्षा 2013 प्रथम में पास हो गए थे। बाद में जांच में यह पकड़े गए। न्यायालय ने 61 गवाहों, 300 दस्तावेजों और धाराओं के आधार पर सभी सात आरोपित को सजा सुनाई गई। जिसमें एक आरोपित लेखराज रावत उर्फ़ बंटी रावत की पूर्व में मृत्यु हो चुकी है।

क्या है व्यापमं घोटाला?

व्यापमं घोटाले की शुरुआत साल 2007-08 में मानी जाती है। जब स्थानीय निधि लेखा परीक्षक कार्यालय की रिपोर्ट में अनियमितताओं का पता चला। साल 2013 में इंदौर पुलिस ने शहर के कई होटलों में से 20 लोगों को गिरफ़्तार किया था, जिनमें से 17 लोग उत्तर प्रदेश से थे और ये असली परीक्षार्थियों के बदले खुद केंद्र में बैठकर परीक्षा देने आए थे। इस मामले में पहले एमपी पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स ने इसकी जांच की। बाद में 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने व्यापमं केस की जांच सीबीआई को सौंपी थी। बाद में सरकार ने इसका नाम बदलकर प्रोफेशनल एग्जामिनेशन बोर्ड कर दिया। इसके बाद इसकी संरचना में बदलाव करके इसे एम्पलाई सिलेक्शन बोर्ड कहा जाने लगा।

2024 में सुप्रीम कोर्ट ने दिया नोटिस

सितंबर 2024 में ही सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को व्यापमं घोटाले पर नोटिस जारी किया है। कांग्रेस नेता, पूर्व निर्दलीय विधायक और व्यापमं मामले के व्हिसलब्लोअर कांग्रेस नेता पारस सकलेचा ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। वर्ष 2009 में व्यापमं घोटाला सामने आने के बाद सकलेचा ने एसटीएफ को दस्तावेज के साथ आवेदन सौंपकर कुछ बिंदुओं पर जांच की मांग की थी। लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। इस आवेदन पर जांच के लिए उन्होंने पिछले वर्ष हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में याचिका दायर की। इस पर एसटीएफ को दिए आवेदन पर कार्यवाही की मांग की।

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