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भोपाल का नामी नर्मदा अस्पताल निकला भरोसे के नाकाबिल.... मरीज को पहुंचाया अपंगता की दहलीज तक..... आयोग ने ठोका 10 लाख का हर्जाना"
Bhopal, MP
मध्य प्रदेश राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक निर्णय में भोपाल के नर्मदा एडवांस ट्रॉमा एंड क्रिटिकल केयर इंस्टीट्यूट,(नर्मदा अस्पताल) भोपाल को करारा झटका देते हुए 10 लाख रुपये हर्जाने की सजा बरकरार रखी है। यह फैसला एक ऐसे मामले में सुनाया गया, जिसमें अस्पताल की लापरवाही के कारण एक युवक को अपना दाहिना पैर घुटने के नीचे से गवांना पड़ा।
पीड़ित सुरजीत सिंह ने जिला उपभोक्ता विवाद निवारण फोरम में 783/2011 क्रमांक से शिकायत दर्ज कराई थी। प्रारंभ में इलाज की व्यवस्था जिला अस्पताल विदिशा द्वारा की गई थी, लेकिन उपचार से संतुष्ट नहीं होने पर मरीज को नर्मदा अस्पताल में भर्ती कराया गया। नर्मदा अस्पताल में डॉक्टरों की टीम ने जांच-पड़ताल के बावजूद संवहनी सर्जन की सलाह नहीं ली, जिससे मरीज के निचले अंग की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती गई। अत्यंत लापरवाही के चलते समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए। परिणामस्वरूप, दो माह के लंबे संघर्ष के बाद मरीज का दाहिना पैर विच्छेद करना पड़ा।
क्या था मामला?
शिकायतकर्ता सुरजीत सिंह, जो विदिशा जिले के कुरवाई गांव के निवासी हैं, उन्होंने जिला उपभोक्ता विवाद निवारण फोरम में 783/2011 क्रमांक से शिकायत दर्ज कराई थी, की उनका फरवरी 2011 में मोटरसाइकिल दुर्घटना हो गई थी. प्रारंभिक उपचार जिला अस्पताल, विदिशा में हुआ लेकिन स्थिति की गंभीरता को देखते हुए वे खुद भोपाल के नर्मदा ट्रॉमा अस्पताल में रेफर हो गए। यहां 20 फरवरी को भर्ती के बाद डॉक्टरों की टीम ने जांच की, लेकिन रक्त प्रवाह में रुकावट की जानकारी होने के बावजूद किसी वैस्कुलर सर्जन की राय नहीं ली गई और न ही तत्काल कोई जरूरी सर्जिकल हस्तक्षेप किया गया।
नतीजा?
दो दिन बाद रक्त प्रवाह पूरी तरह बंद हो गया, और उनका दाहिना पैर काटना पड़ा। बाद में भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर (BMHRC) की रिपोर्ट ने स्पष्ट किया कि मरीज की प्रमुख धमनी में चोट थी, और अगर सही समय पर वैस्कुलर सर्जन की सलाह ली जाती, तो पैर को बचाया जा सकता था।
अस्पताल की चालें और आयोग की फटकार
नर्मदा अस्पताल ने डिस्चार्ज टिकट में झूठी प्रविष्टि कर दी कि मरीज पर 'वैस्कुलर थ्रोम्बेक्टोमी' की गई थी। लेकिन आयोग ने पाया कि ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं हुई थी। इलाज में हुई चूक और गलत रिकॉर्ड दर्ज करने की इस दोहरी लापरवाही को आयोग ने बेहद गंभीर माना।
जब अपील की गई तो अस्पताल के वकील ने 8 साल बाद कुछ नए दस्तावेज पेश करने की कोशिश की, जिनमें एक कार्डियोथोरेसिक सर्जन का हलफनामा भी शामिल था। लेकिन आयोग ने इसे "कमी पूरी करने का असफल प्रयास" मानते हुए खारिज कर दिया।
शिकायतकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता राजकुमार जैन एवं आशीष चौधरी ने अपने सटीक और मजबूती से तैयार तर्कों द्वारा यह स्पष्ट कर दिया कि अस्पताल न केवल उपचार में लापरवाह था बल्कि उसने साक्ष्य को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की कोशिश भी की।
अंतिम फैसला:
राज्य उपभोक्ता आयोग की दो सदस्यीय पीठ – माननीय न्यायमूर्ति सुनीता यादव (अध्यक्ष) और डॉ. श्रीकांत पांडे (सदस्य) – ने जिला आयोग के आदेश को सही ठहराते हुए अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया। फोरम ने हाल ही में दिए अपने आदेश में अस्पताल प्रबंधन की अपील को खारिज करते हुए कहा कि जिला उपभोक्ता फोरम ने दिनांक 08/10/2015 को दिए आदेश में किसी प्रकार की गलती नहीं की है और अस्पताल प्रबंधन जिला उपभोक्ता फोरम में केस फाइल दिनांक 24/11/2011 से क्षतिपूर्ति राशि ब्याज सहित भुगतान करें। फोरम ने अस्पताल को 10 लाख रुपये हर्जाना, 6% वार्षिक ब्याज, मानसिक पीड़ा के लिए 20,000 रुपये और वाद व्यय के रूप में 2,000 रुपये का भुगतान करने का आदेश दोहराया।
अधिवक्ता की पेरवी साबित हुई मुकदमें की रीढ़
शिकायतकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता राजकुमार जैन एवं आशीष चौधरी ने जिस प्रभावशाली और तथ्यात्मक शैली में आयोग के समक्ष पक्ष रखा, वह इस पूरे मुकदमे की रीढ़ साबित हुआ। वहीँ इस फैसले ने स्पष्ट संदेश दिया है कि चिकित्सा क्षेत्र में सेवा में लापरवाही और रिकॉर्ड में हेराफेरी बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। मरीजों की ज़िंदगी से खिलवाड़ करने वाले संस्थानों को अब जवाबदेह होना पड़ेगा।
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पीड़ित सुरजीत सिंह ने जिला उपभोक्ता विवाद निवारण फोरम में 783/2011 क्रमांक से शिकायत दर्ज कराई थी। प्रारंभ में इलाज की व्यवस्था जिला अस्पताल विदिशा द्वारा की गई थी, लेकिन उपचार से संतुष्ट नहीं होने पर मरीज को नर्मदा अस्पताल में भर्ती कराया गया। नर्मदा अस्पताल में डॉक्टरों की टीम ने जांच-पड़ताल के बावजूद संवहनी सर्जन की सलाह नहीं ली, जिससे मरीज के निचले अंग की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती गई। अत्यंत लापरवाही के चलते समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए। परिणामस्वरूप, दो माह के लंबे संघर्ष के बाद मरीज का दाहिना पैर विच्छेद करना पड़ा।
क्या था मामला?
शिकायतकर्ता सुरजीत सिंह, जो विदिशा जिले के कुरवाई गांव के निवासी हैं, उन्होंने जिला उपभोक्ता विवाद निवारण फोरम में 783/2011 क्रमांक से शिकायत दर्ज कराई थी, की उनका फरवरी 2011 में मोटरसाइकिल दुर्घटना हो गई थी. प्रारंभिक उपचार जिला अस्पताल, विदिशा में हुआ लेकिन स्थिति की गंभीरता को देखते हुए वे खुद भोपाल के नर्मदा ट्रॉमा अस्पताल में रेफर हो गए। यहां 20 फरवरी को भर्ती के बाद डॉक्टरों की टीम ने जांच की, लेकिन रक्त प्रवाह में रुकावट की जानकारी होने के बावजूद किसी वैस्कुलर सर्जन की राय नहीं ली गई और न ही तत्काल कोई जरूरी सर्जिकल हस्तक्षेप किया गया।
नतीजा?
दो दिन बाद रक्त प्रवाह पूरी तरह बंद हो गया, और उनका दाहिना पैर काटना पड़ा। बाद में भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर (BMHRC) की रिपोर्ट ने स्पष्ट किया कि मरीज की प्रमुख धमनी में चोट थी, और अगर सही समय पर वैस्कुलर सर्जन की सलाह ली जाती, तो पैर को बचाया जा सकता था।
अस्पताल की चालें और आयोग की फटकार
नर्मदा अस्पताल ने डिस्चार्ज टिकट में झूठी प्रविष्टि कर दी कि मरीज पर 'वैस्कुलर थ्रोम्बेक्टोमी' की गई थी। लेकिन आयोग ने पाया कि ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं हुई थी। इलाज में हुई चूक और गलत रिकॉर्ड दर्ज करने की इस दोहरी लापरवाही को आयोग ने बेहद गंभीर माना।
जब अपील की गई तो अस्पताल के वकील ने 8 साल बाद कुछ नए दस्तावेज पेश करने की कोशिश की, जिनमें एक कार्डियोथोरेसिक सर्जन का हलफनामा भी शामिल था। लेकिन आयोग ने इसे "कमी पूरी करने का असफल प्रयास" मानते हुए खारिज कर दिया।
शिकायतकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता राजकुमार जैन एवं आशीष चौधरी ने अपने सटीक और मजबूती से तैयार तर्कों द्वारा यह स्पष्ट कर दिया कि अस्पताल न केवल उपचार में लापरवाह था बल्कि उसने साक्ष्य को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की कोशिश भी की।
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राज्य उपभोक्ता आयोग की दो सदस्यीय पीठ – माननीय न्यायमूर्ति सुनीता यादव (अध्यक्ष) और डॉ. श्रीकांत पांडे (सदस्य) – ने जिला आयोग के आदेश को सही ठहराते हुए अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया। फोरम ने हाल ही में दिए अपने आदेश में अस्पताल प्रबंधन की अपील को खारिज करते हुए कहा कि जिला उपभोक्ता फोरम ने दिनांक 08/10/2015 को दिए आदेश में किसी प्रकार की गलती नहीं की है और अस्पताल प्रबंधन जिला उपभोक्ता फोरम में केस फाइल दिनांक 24/11/2011 से क्षतिपूर्ति राशि ब्याज सहित भुगतान करें। फोरम ने अस्पताल को 10 लाख रुपये हर्जाना, 6% वार्षिक ब्याज, मानसिक पीड़ा के लिए 20,000 रुपये और वाद व्यय के रूप में 2,000 रुपये का भुगतान करने का आदेश दोहराया।
अधिवक्ता की पेरवी साबित हुई मुकदमें की रीढ़
शिकायतकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता राजकुमार जैन एवं आशीष चौधरी ने जिस प्रभावशाली और तथ्यात्मक शैली में आयोग के समक्ष पक्ष रखा, वह इस पूरे मुकदमे की रीढ़ साबित हुआ। वहीँ इस फैसले ने स्पष्ट संदेश दिया है कि चिकित्सा क्षेत्र में सेवा में लापरवाही और रिकॉर्ड में हेराफेरी बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। मरीजों की ज़िंदगी से खिलवाड़ करने वाले संस्थानों को अब जवाबदेह होना पड़ेगा।
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