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मध्यप्रदेश के इस गांव में नहीं है एक भी मुस्लिम परिवार, गांव वाले निभाते हैं अनोखी परंपरा
Burhanpur, MP
बोदरली गांव में हिंदू समाज हर साल बोदर शाह बाबा की दरगाह पर चादर चढ़ाकर उर्स मनाता है और अपने गांव की खुशहाली, फसलों की समृद्धि और परिवार की भलाई के लिए प्रार्थना करता है. यह अनोखी परंपरा हमें सांप्रदायिक सौहार्द्र और मानवता का महत्व सिखाती है और समाज को एक नई दिशा देने का संदेश देती है.
मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले का बोदरली गांव, सांप्रदायिक सौहार्द और धार्मिक समर्पण का एक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है. यह गांव पिछले 50 वर्षों से एक अनोखी परंपरा निभा रहा है, जहाँ सभी हिंदू परिवार मिलकर एक मुस्लिम दरगाह, बोदर शाह बाबा की दरगाह पर हर साल उर्स का आयोजन करते हैं. हैरानी की बात यह है कि इस गांव में एक भी मुस्लिम परिवार नहीं है, लेकिन इसके बावजूद हिंदू समुदाय की आस्था इस दरगाह के प्रति इतनी गहरी है कि वे खुद उर्स का आयोजन करते हैं और दरगाह पर चादर चढ़ाने की परंपरा को निभाते हैं.
300 साल पुरानी दरगाह, 50 वर्षों से हिंदू समाज द्वारा उर्स का आयोजन
बोदरली गांव में मौजूद बोदर शाह बाबा की दरगाह लगभग 300 साल पुरानी मानी जाती है. ग्रामीणों के अनुसार, यह दरगाह गांव के लिए आस्था और श्रद्धा का एक प्रमुख केंद्र है. यहां के लोग दरगाह पर जाकर सुख-समृद्धि, बच्चों के लिए मन्नतें और फसलों के लिए अच्छी उपज की कामना करते हैं. जिस किसी की मन्नतें पूरी होती हैं, वे पुनः दरगाह पर दर्शन और आभार व्यक्त करने आते हैं. ग्रामीणों का मानना है कि इस दरगाह पर चादर चढ़ाने से उनकी प्रार्थनाएं पूरी होती हैं और गांव में सुख-शांति बनी रहती है.
दीपावली के अवसर पर मनाया जाता है उर्स
बोदरली गांव के निवासी मनु सुगंधी ने बताया कि हर साल दीपावली के शुभ अवसर पर गांव के लोग मिलकर गाजे-बाजे के साथ दरगाह पर चादर चढ़ाने जाते हैं. इस मौके पर पूरा गांव एकत्रित होता है और एकता के प्रतीक के रूप में उर्स मनाया जाता है. इस उत्सव में बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी शामिल होते हैं. लोगों का कहना है कि यह उर्स उनके लिए सांस्कृतिक और धार्मिक जुड़ाव का एक महत्वपूर्ण अवसर होता है, जिसका उन्हें पूरे साल इंतजार रहता है.
उर्स में शामिल होते हैं आसपास के गांव के लोग भी
बोदरली के इस उर्स में केवल गांव के ही नहीं बल्कि आसपास के अन्य गांवों के लोग भी बड़ी संख्या में शामिल होते हैं. बैंड-बाजों के साथ, लोग दरगाह तक चादर लेकर जाते हैं और वहां जियारत करते हैं. चादर चढ़ाने के बाद, दरगाह पर सुख-शांति और समृद्धि की कामना की जाती है. ग्रामीणों का मानना है कि इस परंपरा से उनकी फसलों में भी बरकत होती है और गांव में खुशहाली बनी रहती है.
एकता और सौहार्द्र का प्रतीक
बोदरली गांव की यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था का उदाहरण है बल्कि सांप्रदायिक एकता का भी प्रतीक है. एक मुस्लिम दरगाह पर हिंदू समाज द्वारा उर्स का आयोजन करना अपने आप में एक अनूठा और प्रेरणादायक कदम है, जो समाज को एकता और भाईचारे का संदेश देता है. ऐसे समय में जब सांप्रदायिक मुद्दों को लेकर समाज में कई तरह के मतभेद उभरते हैं, बोदरली जैसे गांव हमें याद दिलाते हैं कि आस्था और परंपराएं किसी एक धर्म या समुदाय की बपौती नहीं होतीं.
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मध्यप्रदेश के इस गांव में नहीं है एक भी मुस्लिम परिवार, गांव वाले निभाते हैं अनोखी परंपरा
Burhanpur, MP
मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले का बोदरली गांव, सांप्रदायिक सौहार्द और धार्मिक समर्पण का एक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है. यह गांव पिछले 50 वर्षों से एक अनोखी परंपरा निभा रहा है, जहाँ सभी हिंदू परिवार मिलकर एक मुस्लिम दरगाह, बोदर शाह बाबा की दरगाह पर हर साल उर्स का आयोजन करते हैं. हैरानी की बात यह है कि इस गांव में एक भी मुस्लिम परिवार नहीं है, लेकिन इसके बावजूद हिंदू समुदाय की आस्था इस दरगाह के प्रति इतनी गहरी है कि वे खुद उर्स का आयोजन करते हैं और दरगाह पर चादर चढ़ाने की परंपरा को निभाते हैं.
300 साल पुरानी दरगाह, 50 वर्षों से हिंदू समाज द्वारा उर्स का आयोजन
बोदरली गांव में मौजूद बोदर शाह बाबा की दरगाह लगभग 300 साल पुरानी मानी जाती है. ग्रामीणों के अनुसार, यह दरगाह गांव के लिए आस्था और श्रद्धा का एक प्रमुख केंद्र है. यहां के लोग दरगाह पर जाकर सुख-समृद्धि, बच्चों के लिए मन्नतें और फसलों के लिए अच्छी उपज की कामना करते हैं. जिस किसी की मन्नतें पूरी होती हैं, वे पुनः दरगाह पर दर्शन और आभार व्यक्त करने आते हैं. ग्रामीणों का मानना है कि इस दरगाह पर चादर चढ़ाने से उनकी प्रार्थनाएं पूरी होती हैं और गांव में सुख-शांति बनी रहती है.
दीपावली के अवसर पर मनाया जाता है उर्स
बोदरली गांव के निवासी मनु सुगंधी ने बताया कि हर साल दीपावली के शुभ अवसर पर गांव के लोग मिलकर गाजे-बाजे के साथ दरगाह पर चादर चढ़ाने जाते हैं. इस मौके पर पूरा गांव एकत्रित होता है और एकता के प्रतीक के रूप में उर्स मनाया जाता है. इस उत्सव में बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी शामिल होते हैं. लोगों का कहना है कि यह उर्स उनके लिए सांस्कृतिक और धार्मिक जुड़ाव का एक महत्वपूर्ण अवसर होता है, जिसका उन्हें पूरे साल इंतजार रहता है.
उर्स में शामिल होते हैं आसपास के गांव के लोग भी
बोदरली के इस उर्स में केवल गांव के ही नहीं बल्कि आसपास के अन्य गांवों के लोग भी बड़ी संख्या में शामिल होते हैं. बैंड-बाजों के साथ, लोग दरगाह तक चादर लेकर जाते हैं और वहां जियारत करते हैं. चादर चढ़ाने के बाद, दरगाह पर सुख-शांति और समृद्धि की कामना की जाती है. ग्रामीणों का मानना है कि इस परंपरा से उनकी फसलों में भी बरकत होती है और गांव में खुशहाली बनी रहती है.
एकता और सौहार्द्र का प्रतीक
बोदरली गांव की यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था का उदाहरण है बल्कि सांप्रदायिक एकता का भी प्रतीक है. एक मुस्लिम दरगाह पर हिंदू समाज द्वारा उर्स का आयोजन करना अपने आप में एक अनूठा और प्रेरणादायक कदम है, जो समाज को एकता और भाईचारे का संदेश देता है. ऐसे समय में जब सांप्रदायिक मुद्दों को लेकर समाज में कई तरह के मतभेद उभरते हैं, बोदरली जैसे गांव हमें याद दिलाते हैं कि आस्था और परंपराएं किसी एक धर्म या समुदाय की बपौती नहीं होतीं.
