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पेपर लेस वोटिंग होगी चुनावी प्रक्रिया का नया भविष्य.... मप्र राज्य निर्वाचन अयोग का सरहानीय प्रयास
JAGRAN DESK
भारत में बैलेट पेपर से वोटिंग की शुरुआत, फिर ईवीएम मशीन ने रचा इतिहास, अब पेपरलेस वोटिंग है चुनावी प्रक्रिया का नया भविष्य
कल, आज और कल की कहानी में हमेशा एक बदलाव नजर आता है, क्योंकि बदलाव एक सतत प्रक्रिया है। यही प्रक्रिया भारतीय चुनाव प्रणाली में भी नजर आती है औऱ अब चर्चा में है… क्योंकि भारत में पहली बार पेपरलेस वोटिंग की गई है और देश के दिल मध्य प्रदेश पहला ऐसा राज्य हो गया है, जिसने पेपरलेस वोटिंग की शुरुआत की।
क्या है पेपर लेस वोटिंग, कैसे की जाती है वोटिंग?
- देश में पहली बार पेपरलेस वोटिंग की शुरुआत मध्यप्रदेश से एक पायलट प्रोजेक्ट (किसी भी नए काम का प्रारंभिक प्रयोग, जिसमें देखा जाता है कि यह परियोजना छोटे स्तर पर कितनी असरदार है। अच्छे रिजल्ट मिलने पर इसे बड़े पैमाने पर शुरू किया जाता है) के तहत की गई। राज्य चुनाव निर्वाचन आयोग ने इसकी पहल की।
- पेपर लेस वोटिंग में मतदाताओं की पहचान और रिकॉर्ड के लिए सिग्नेचर और अंगूठे के निशान को इलेक्ट्रॉनिक रूप से दर्ज किया जाता है।
- वोटिंग परसेंट और मतपत्रों के लेखा-जोखा का काम ऑनलाइन तरीके से किया जाता है।
- कुछ घंटों में ही वोटिंग परसेंट की जानकारी भी ऑनलाइन उपलब्ध हो जाती है।
- ईमेल के जरिए उम्मीदवारों को, मतदान एजेंट को वोटिंग परसेंटेज, बैलेट पेपर का लेखा-जोखा समेत कई जानकारी भेजी जाती है।
- कम समय, कम मानव संसाधन और सटीक रिजल्ट पेपरलेस वोटिंग प्रक्रिया की खासियत है.
पेपरलेस बूथ प्रणाली
मध्य प्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा विकसित की जा रही पेपर लेस बूथ प्रणाली से भविष्य में निर्वाचन कार्यो में निम्नांकित लाभ लोकतांत्रिक व्यवस्था को प्राप्त होंगे :-
- निर्वाचन प्रक्रिया में शत प्रतिशत पारदर्शिता ।
2. मतदान प्रतिशत की जानकारी सभी राजनीतिक दल प्रत्याशियों मीडिया हाउस एवं आमजन के बीच रियल टाइम डाटा शेयरिंग के माध्यम से ।
3. पीठासीन अधिकारियों के लिए कार्य का अत्यंत सरलीकरण एवं सुगमता ।
4. शासन के ऊपर निर्वाचन व्यय का भार अत्यंत कम होना।
5. निर्वाचन कार्यो के सरलीकरण होने से शासकीय कर्मचारियों का निर्वाचन कार्य के प्रति घबराहट एवं बचने की प्रवत्ति से मुक्ति ।
6. निर्वाचन मतदान प्रक्रिया के 100% पारदर्शी होने से राजनीतिक दल एवं अभ्यर्थियों को निर्वाचन एवं लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति विश्वास में वृद्धि जिसके कारण अनावश्यक विवादों में कमी आना ।
7. किसी भी प्रकार के गड़बड़ी की आशंका को शत प्रतिशत समाप्त किया जाना ।
पूरे राज्य में करेंगे लागू
राज्य निर्वाचान आयोग के सचिव अभिषेक सिंह ने बताया कि, ‘अभी तक हमने इसे एक बूथ पर संचालित किया है और आने वाले दिनों में धीरे-धीरे इन बूथों की संख्या बढ़ाई जाएगी। कुछ साल में हम इसे राज्य में 100 प्रतिशत लागू करेंगे। यह एक विकसित प्रक्रिया है, हमने इसे पहली बार किया है।
पहली बार मध्य प्रदेश में पेपरलेस वोटिंग
राजधानी भोपाल की बैरसिया तहसील के ग्राम पंचायत रतुआ रतनपुर में [SEP 2024] पायलट प्रोजेक्ट के रूप में एक बूथ पर पेपरलेस वोटिंग की शुरूआत की गई और पहला पेपरलेस वोट डाला गया. पूर्व सरपंच की मौत के बाद खाली हुई सीट पर यहां वोटिंग करवाई गई.
पहली बार यहां की गई थी ईवीएम से वोटिंग

देश में पहली बार 1982 में ईवीएम से वोटिंग की गई थी। केरल विधानसभा की पारुर सीट पर हुए उपचुनाव के दौरान बैलेटिंग यूनिट और कंट्रोल यूनिट वाली ईवीएम इस्तेमाल की गई। लेकिन इस मशीन के इस्तेमाल को लेकर कोई कानून न होने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने उस चुनाव को खारिज कर दिया। इसके बाद, साल 1989 में संसद ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में संशोधन करते हुए चुनाव में ईवीएम के इस्तेमाल का प्रावधान किया।
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पेपर लेस वोटिंग होगी चुनावी प्रक्रिया का नया भविष्य.... मप्र राज्य निर्वाचन अयोग का सरहानीय प्रयास
JAGRAN DESK
कल, आज और कल की कहानी में हमेशा एक बदलाव नजर आता है, क्योंकि बदलाव एक सतत प्रक्रिया है। यही प्रक्रिया भारतीय चुनाव प्रणाली में भी नजर आती है औऱ अब चर्चा में है… क्योंकि भारत में पहली बार पेपरलेस वोटिंग की गई है और देश के दिल मध्य प्रदेश पहला ऐसा राज्य हो गया है, जिसने पेपरलेस वोटिंग की शुरुआत की।
क्या है पेपर लेस वोटिंग, कैसे की जाती है वोटिंग?
- देश में पहली बार पेपरलेस वोटिंग की शुरुआत मध्यप्रदेश से एक पायलट प्रोजेक्ट (किसी भी नए काम का प्रारंभिक प्रयोग, जिसमें देखा जाता है कि यह परियोजना छोटे स्तर पर कितनी असरदार है। अच्छे रिजल्ट मिलने पर इसे बड़े पैमाने पर शुरू किया जाता है) के तहत की गई। राज्य चुनाव निर्वाचन आयोग ने इसकी पहल की।
- पेपर लेस वोटिंग में मतदाताओं की पहचान और रिकॉर्ड के लिए सिग्नेचर और अंगूठे के निशान को इलेक्ट्रॉनिक रूप से दर्ज किया जाता है।
- वोटिंग परसेंट और मतपत्रों के लेखा-जोखा का काम ऑनलाइन तरीके से किया जाता है।
- कुछ घंटों में ही वोटिंग परसेंट की जानकारी भी ऑनलाइन उपलब्ध हो जाती है।
- ईमेल के जरिए उम्मीदवारों को, मतदान एजेंट को वोटिंग परसेंटेज, बैलेट पेपर का लेखा-जोखा समेत कई जानकारी भेजी जाती है।
- कम समय, कम मानव संसाधन और सटीक रिजल्ट पेपरलेस वोटिंग प्रक्रिया की खासियत है.
पेपरलेस बूथ प्रणाली
मध्य प्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा विकसित की जा रही पेपर लेस बूथ प्रणाली से भविष्य में निर्वाचन कार्यो में निम्नांकित लाभ लोकतांत्रिक व्यवस्था को प्राप्त होंगे :-
- निर्वाचन प्रक्रिया में शत प्रतिशत पारदर्शिता ।
2. मतदान प्रतिशत की जानकारी सभी राजनीतिक दल प्रत्याशियों मीडिया हाउस एवं आमजन के बीच रियल टाइम डाटा शेयरिंग के माध्यम से ।
3. पीठासीन अधिकारियों के लिए कार्य का अत्यंत सरलीकरण एवं सुगमता ।
4. शासन के ऊपर निर्वाचन व्यय का भार अत्यंत कम होना।
5. निर्वाचन कार्यो के सरलीकरण होने से शासकीय कर्मचारियों का निर्वाचन कार्य के प्रति घबराहट एवं बचने की प्रवत्ति से मुक्ति ।
6. निर्वाचन मतदान प्रक्रिया के 100% पारदर्शी होने से राजनीतिक दल एवं अभ्यर्थियों को निर्वाचन एवं लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति विश्वास में वृद्धि जिसके कारण अनावश्यक विवादों में कमी आना ।
7. किसी भी प्रकार के गड़बड़ी की आशंका को शत प्रतिशत समाप्त किया जाना ।
पूरे राज्य में करेंगे लागू
राज्य निर्वाचान आयोग के सचिव अभिषेक सिंह ने बताया कि, ‘अभी तक हमने इसे एक बूथ पर संचालित किया है और आने वाले दिनों में धीरे-धीरे इन बूथों की संख्या बढ़ाई जाएगी। कुछ साल में हम इसे राज्य में 100 प्रतिशत लागू करेंगे। यह एक विकसित प्रक्रिया है, हमने इसे पहली बार किया है।
पहली बार मध्य प्रदेश में पेपरलेस वोटिंग
राजधानी भोपाल की बैरसिया तहसील के ग्राम पंचायत रतुआ रतनपुर में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में एक बूथ पर पेपरलेस वोटिंग की शुरूआत की गई और पहला पेपरलेस वोट डाला गया. पूर्व सरपंच की मौत के बाद खाली हुई सीट पर यहां वोटिंग करवाई गई.
पहली बार यहां की गई थी ईवीएम से वोटिंग

देश में पहली बार 1982 में ईवीएम से वोटिंग की गई थी। केरल विधानसभा की पारुर सीट पर हुए उपचुनाव के दौरान बैलेटिंग यूनिट और कंट्रोल यूनिट वाली ईवीएम इस्तेमाल की गई। लेकिन इस मशीन के इस्तेमाल को लेकर कोई कानून न होने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने उस चुनाव को खारिज कर दिया। इसके बाद, साल 1989 में संसद ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में संशोधन करते हुए चुनाव में ईवीएम के इस्तेमाल का प्रावधान किया।
