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MP के इस गांव का नाम सुन नहीं रोक पाएंगे अपनी हंसी, बच्चे बोले; नाम बताने में आती है शर्म
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मध्य प्रदेश में 21वीं सदी की नई पीढ़ी अपने गांव के नाम को अजीबो गरीब बताते हैं. कभी अनजान कॉल आने पर लोग जब गांव का नाम बताते हैं तो सामने वाला मजाक समझता है. इतना ही नहीं वह कभी-कभी कहता है कि हम मछली से बोल रहे बकरा से बोल रहे, या फिर गालियां भी सुननी पड़ती है.
कोई भी व्यक्ति हमेशा अपनी जन्मभूमि कर्मभूमि का नाम बताते हुए हमेशा खुद को गौरवान्वित महसूस करता है. अपने गांव अपने शहर का नाम जुबां पर आते ही उसका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है. लेकिन बुंदेलखंड के सागर जिले में एक गांव ऐसा है जिसका नाम तक लेने में लोगों को शर्म आती है. बड़े लोगों को तो फिर भी इसकी आदत सी हो गई है. कैमरे पर बुरा भला कुछ भी नहीं बोलते, लेकिन 21वीं सदी की नई पीढ़ी इस गांव के नाम को अजीबो गरीब बताते हैं. इस गांव का नाम “मुर्गा” है. कभी अनजान कॉल आने पर लोग जब गांव का नाम बताते हैं तो सामने वाला मजाक समझता है और वह कभी कभी कहता है कि हम मछली से बोल रहे, बकरा से बोल रहे. या फिर गालियां भी सुननी पड़ती है.
यहां के बुजुर्ग बताते हैं कि गांव में पहले देसी मुर्गा पाए जाते थे. हर घर में इन्हीं से परिवार का गुजर बसर होता था, आसपास के लोग मुर्गा खरीदने भी आते थे, हो सकता है इसीलिए इसका नाम मुर्गा प्रचलन में आ गया. हम लोगों के दादा परदादा के समय से गांव का नाम मुर्गा सुनते आ रहे हैं. लेकिन अब इस गांव के किसी भी घर में मुर्गी पालन नहीं होता, यहां लोग सब्जियां उगाने लगे हैं, खेती करने लगे हैं.
13 साल का नीरज बताता है कि जब तक गांव में पढ़ते थे, तो गांव के नाम को लेकर कभी कोई ख्याल नहीं आया, लेकिन जब छठवीं कक्षा से यहां से दूर दूसरे स्कूल पढ़ने या परीक्षा केंद्र पर पेपर देने जाते और लोग नाम पूछते तब शर्म लगती है. वह भी गांव का नाम सुनकर चौंक जाते हैं और पूछने लगते हैं कि यह नाम किसने रख दिया तो हम लोग कह देते हैं, बाप दादाओं ने रखा है वही चल रहा.
सागर जिले की गढ़ाकोटा तहसील में यह गांव आता है इस गांव करीब 400 मतदाता हैं, यहां पांचवीं तक सरकारी स्कूल आंगनवाड़ी भवन भी हैं, जो मुर्गा के नाम से ही संचालित होते हैं.
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MP के इस गांव का नाम सुन नहीं रोक पाएंगे अपनी हंसी, बच्चे बोले; नाम बताने में आती है शर्म
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कोई भी व्यक्ति हमेशा अपनी जन्मभूमि कर्मभूमि का नाम बताते हुए हमेशा खुद को गौरवान्वित महसूस करता है. अपने गांव अपने शहर का नाम जुबां पर आते ही उसका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है. लेकिन बुंदेलखंड के सागर जिले में एक गांव ऐसा है जिसका नाम तक लेने में लोगों को शर्म आती है. बड़े लोगों को तो फिर भी इसकी आदत सी हो गई है. कैमरे पर बुरा भला कुछ भी नहीं बोलते, लेकिन 21वीं सदी की नई पीढ़ी इस गांव के नाम को अजीबो गरीब बताते हैं. इस गांव का नाम “मुर्गा” है. कभी अनजान कॉल आने पर लोग जब गांव का नाम बताते हैं तो सामने वाला मजाक समझता है और वह कभी कभी कहता है कि हम मछली से बोल रहे, बकरा से बोल रहे. या फिर गालियां भी सुननी पड़ती है.
यहां के बुजुर्ग बताते हैं कि गांव में पहले देसी मुर्गा पाए जाते थे. हर घर में इन्हीं से परिवार का गुजर बसर होता था, आसपास के लोग मुर्गा खरीदने भी आते थे, हो सकता है इसीलिए इसका नाम मुर्गा प्रचलन में आ गया. हम लोगों के दादा परदादा के समय से गांव का नाम मुर्गा सुनते आ रहे हैं. लेकिन अब इस गांव के किसी भी घर में मुर्गी पालन नहीं होता, यहां लोग सब्जियां उगाने लगे हैं, खेती करने लगे हैं.
13 साल का नीरज बताता है कि जब तक गांव में पढ़ते थे, तो गांव के नाम को लेकर कभी कोई ख्याल नहीं आया, लेकिन जब छठवीं कक्षा से यहां से दूर दूसरे स्कूल पढ़ने या परीक्षा केंद्र पर पेपर देने जाते और लोग नाम पूछते तब शर्म लगती है. वह भी गांव का नाम सुनकर चौंक जाते हैं और पूछने लगते हैं कि यह नाम किसने रख दिया तो हम लोग कह देते हैं, बाप दादाओं ने रखा है वही चल रहा.
सागर जिले की गढ़ाकोटा तहसील में यह गांव आता है इस गांव करीब 400 मतदाता हैं, यहां पांचवीं तक सरकारी स्कूल आंगनवाड़ी भवन भी हैं, जो मुर्गा के नाम से ही संचालित होते हैं.
