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दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा आदेश: उत्पीड़न केस में डिजिटल सबूतों की तत्काल सुरक्षा के निर्देश
Jagran Desk
एक महिला सीनियर आईपीएस अधिकारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम आदेश जारी किया है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि आईपीएस अफसर एचजीएस धालीवाल, डीएएनआईपीएस अधिकारी दीपक यादव और जांच अधिकारी रश्मि शर्मा यादव से जुड़े डिजिटल साक्ष्यों को फौरन संरक्षित किया जाए।
यह निर्देश न्यायमूर्ति स्वरना कांत शर्मा ने 15 जुलाई को जारी किया। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि उन्हें व्हाट्सएप के जरिए धमकाया गया, पीछा किया गया और मानसिक उत्पीड़न झेलना पड़ा। शुरुआत में उन्होंने आरोपी का नाम सार्वजनिक नहीं किया, लेकिन बाद में उन्होंने धारा 161 और 164 सीआरपीसी के तहत दर्ज बयानों में पहचान उजागर की।
कोर्ट ने टेलीकॉम कंपनियों की डिजिटल डेटा स्टोरेज नीति का हवाला देते हुए कहा कि कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR), आईपी डिटेल रिकॉर्ड (IPDR) और अन्य डिजिटल डाटा अधिकतम दो साल तक ही संरक्षित रहते हैं। ऐसे में इन साक्ष्यों को जल्द से जल्द संरक्षित करना जरूरी है, ताकि भविष्य में यदि इनकी जरूरत हो तो वे उपलब्ध रहें।
याचिका में 28 जुलाई 2023 की एक व्हाट्सएप बातचीत का उल्लेख भी किया गया है, जिससे यह आशंका जताई गई कि जांच अधिकारी और आरोपी के बीच मिलीभगत हो सकती है। कोर्ट ने इस संदेह को गंभीर मानते हुए कहा कि ऐसे डिजिटल सबूतों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
हालांकि, निचली अदालत पहले ही मामले में क्लोज़र रिपोर्ट स्वीकार कर चुकी है और याचिकाकर्ता की आपत्ति को खारिज कर चुकी है, फिर भी हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आदेश केवल डिजिटल साक्ष्यों के संरक्षण से जुड़ा है और इसका प्रभाव मामले की मेरिट पर नहीं पड़ेगा। अगली सुनवाई अब 30 अक्टूबर 2025 को तय की गई है।
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यह निर्देश न्यायमूर्ति स्वरना कांत शर्मा ने 15 जुलाई को जारी किया। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि उन्हें व्हाट्सएप के जरिए धमकाया गया, पीछा किया गया और मानसिक उत्पीड़न झेलना पड़ा। शुरुआत में उन्होंने आरोपी का नाम सार्वजनिक नहीं किया, लेकिन बाद में उन्होंने धारा 161 और 164 सीआरपीसी के तहत दर्ज बयानों में पहचान उजागर की।
कोर्ट ने टेलीकॉम कंपनियों की डिजिटल डेटा स्टोरेज नीति का हवाला देते हुए कहा कि कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR), आईपी डिटेल रिकॉर्ड (IPDR) और अन्य डिजिटल डाटा अधिकतम दो साल तक ही संरक्षित रहते हैं। ऐसे में इन साक्ष्यों को जल्द से जल्द संरक्षित करना जरूरी है, ताकि भविष्य में यदि इनकी जरूरत हो तो वे उपलब्ध रहें।
याचिका में 28 जुलाई 2023 की एक व्हाट्सएप बातचीत का उल्लेख भी किया गया है, जिससे यह आशंका जताई गई कि जांच अधिकारी और आरोपी के बीच मिलीभगत हो सकती है। कोर्ट ने इस संदेह को गंभीर मानते हुए कहा कि ऐसे डिजिटल सबूतों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
हालांकि, निचली अदालत पहले ही मामले में क्लोज़र रिपोर्ट स्वीकार कर चुकी है और याचिकाकर्ता की आपत्ति को खारिज कर चुकी है, फिर भी हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आदेश केवल डिजिटल साक्ष्यों के संरक्षण से जुड़ा है और इसका प्रभाव मामले की मेरिट पर नहीं पड़ेगा। अगली सुनवाई अब 30 अक्टूबर 2025 को तय की गई है।
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