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राष्ट्रपति के 14 संवैधानिक सवालों पर SC ने केंद्र और राज्यों से मांगा जवाब, 29 जुलाई को अगली सुनवाई
Digital Desk
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा भेजे गए 14 अहम संवैधानिक सवालों पर केंद्र सरकार और सभी राज्यों को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने सभी पक्षों से एक हफ्ते के भीतर जवाब मांगा है और मामले की अगली सुनवाई 29 जुलाई को तय की है।
सीजेआई बी. आर. गवई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ में जस्टिस सूर्यकांत, विक्रम नाथ, पी. एस. नरसिम्हा और अतुल चंदुरकर शामिल हैं। कोर्ट ने कहा है कि अगली सुनवाई में समयसीमा तय की जाएगी, ताकि मामले को उचित गति मिल सके।
राष्ट्रपति ने क्या मांगा है?
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी है। सवाल इस बात पर केंद्रित हैं कि:
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जब कोई विधेयक राज्यपाल के पास भेजा जाता है तो क्या वे कैबिनेट की सलाह से बाध्य हैं?
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क्या अनुच्छेद 361 राज्यपाल के फैसलों पर न्यायिक समीक्षा को पूरी तरह रोकता है?
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क्या राष्ट्रपति को अनुच्छेद 201 के तहत विवेकाधिकार है और क्या कोर्ट इसमें हस्तक्षेप कर सकता है?
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क्या राज्यपाल "पॉकेट वीटो" का इस्तेमाल कर सकते हैं?
राष्ट्रपति ने इन सवालों को संघीय ढांचे, विधायी समानता, राष्ट्र की अखंडता और शक्तियों के पृथक्करण से जोड़ते हुए इन पर कोर्ट से स्पष्ट राय मांगी है।
सुनवाई के दौरान क्या हुआ?
केरल सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील के. के. वेणुगोपाल ने राष्ट्रपति के रेफरेंस को "सुनवाई योग्य नहीं" करार दिया। तमिलनाडु की ओर से भी इसी तरह की आपत्ति जताई गई। वहीं, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि अभी यह मुद्दा उठाना जल्दबाज़ी होगी।
कहां से शुरू हुआ मामला?
8 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के एक मामले में कहा था कि राज्यपाल को विधानसभा से पारित विधेयकों पर अनिश्चितकालीन देरी नहीं करनी चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्यपाल किसी राजनीतिक या निजी असहमति के आधार पर विधेयक पर निर्णय टाल नहीं सकते। साथ ही, राष्ट्रपति को भी तीन महीने के भीतर फैसला देना होगा।
राष्ट्रपति ने उसी फैसले के आलोक में संवैधानिक प्रक्रिया की स्पष्टता के लिए सुप्रीम कोर्ट से मार्गदर्शन मांगा है।
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राष्ट्रपति के 14 संवैधानिक सवालों पर SC ने केंद्र और राज्यों से मांगा जवाब, 29 जुलाई को अगली सुनवाई
Digital Desk
सीजेआई बी. आर. गवई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ में जस्टिस सूर्यकांत, विक्रम नाथ, पी. एस. नरसिम्हा और अतुल चंदुरकर शामिल हैं। कोर्ट ने कहा है कि अगली सुनवाई में समयसीमा तय की जाएगी, ताकि मामले को उचित गति मिल सके।
राष्ट्रपति ने क्या मांगा है?
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी है। सवाल इस बात पर केंद्रित हैं कि:
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जब कोई विधेयक राज्यपाल के पास भेजा जाता है तो क्या वे कैबिनेट की सलाह से बाध्य हैं?
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क्या अनुच्छेद 361 राज्यपाल के फैसलों पर न्यायिक समीक्षा को पूरी तरह रोकता है?
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क्या राष्ट्रपति को अनुच्छेद 201 के तहत विवेकाधिकार है और क्या कोर्ट इसमें हस्तक्षेप कर सकता है?
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क्या राज्यपाल "पॉकेट वीटो" का इस्तेमाल कर सकते हैं?
राष्ट्रपति ने इन सवालों को संघीय ढांचे, विधायी समानता, राष्ट्र की अखंडता और शक्तियों के पृथक्करण से जोड़ते हुए इन पर कोर्ट से स्पष्ट राय मांगी है।
सुनवाई के दौरान क्या हुआ?
केरल सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील के. के. वेणुगोपाल ने राष्ट्रपति के रेफरेंस को "सुनवाई योग्य नहीं" करार दिया। तमिलनाडु की ओर से भी इसी तरह की आपत्ति जताई गई। वहीं, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि अभी यह मुद्दा उठाना जल्दबाज़ी होगी।
कहां से शुरू हुआ मामला?
8 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के एक मामले में कहा था कि राज्यपाल को विधानसभा से पारित विधेयकों पर अनिश्चितकालीन देरी नहीं करनी चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्यपाल किसी राजनीतिक या निजी असहमति के आधार पर विधेयक पर निर्णय टाल नहीं सकते। साथ ही, राष्ट्रपति को भी तीन महीने के भीतर फैसला देना होगा।
राष्ट्रपति ने उसी फैसले के आलोक में संवैधानिक प्रक्रिया की स्पष्टता के लिए सुप्रीम कोर्ट से मार्गदर्शन मांगा है।
