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Truecaller अलर्ट से नाकाम डिजिटल अरेस्ट ठगी, कानपुर में ₹90 लाख बचाए
कानपुर (उत्तर प्रदेश)
कानपुर के किदवई नगर इलाके में मंगलवार दोपहर एक रिटायर्ड शिक्षक के साथ ऐसी घटना हुई, जिसने एक बार फिर साइबर ठगी के नए तरीके को सामने ला दिया। 67 वर्षीय रामेश्वर दयाल (बदला हुआ नाम) को व्हाट्सएप पर एक वीडियो कॉल आई और कुछ ही मिनटों में हालात ऐसे बने कि वे खुद को “डिजिटल अरेस्ट” में समझने लगे। सामने स्क्रीन पर एक शख्स पुलिस की वर्दी में दिख रहा था, पीछे का सेटअप किसी सरकारी कंट्रोल रूम जैसा लग रहा था। आरोप सीधे तौर पर यह लगाया गया कि उनके आधार कार्ड का इस्तेमाल ड्रग्स की शिपमेंट में हुआ है और उन्हें तुरंत सहयोग करना होगा, वरना गिरफ्तारी तय है। बताया जा रहा है कि कॉल के दौरान लगातार दबाव बनाया गया, फोन काटने से मना किया गया और परिवार को भी कार्रवाई में घसीटने की धमकी दी गई।
धीरे-धीरे मामला उस मोड़ पर पहुंच गया जहां रामेश्वर दयाल अपनी पूरी जमा पूंजी, करीब 90 लाख रुपए, ट्रांसफर करने की तैयारी में थे। सूत्रों के अनुसार, स्कैमर्स उन्हें बैंक डिटेल्स और ट्रांजैक्शन प्रक्रिया समझा रहे थे, माहौल ऐसा बनाया गया कि उन्हें सोचने का मौका ही न मिले। इसी बीच उनके मोबाइल में इंस्टॉल Truecaller ने एक रेड अलर्ट दिखाया। स्क्रीन पर नंबर के साथ साफ लिखा था—“Scammer - Digital Arrest Fraud”। यही एक पल था जिसने पूरा खेल बदल दिया। रामेश्वर दयाल ने बाद में बताया कि उस अलर्ट को देखते ही उन्हें शक हुआ और उन्होंने तुरंत कॉल काट दी। अगर कुछ सेकंड और बीत जाते, तो शायद रकम ट्रांसफर हो चुकी होती।
इस घटना ने यह भी दिखाया कि अब साइबर ठगी के तरीके छोटे शहरों तक तेजी से पहुंच रहे हैं। पहले ऐसे मामले बड़े शहरों तक सीमित थे, लेकिन अब कानपुर, लखनऊ, इंदौर जैसे शहर भी निशाने पर हैं। पुलिस सूत्रों का कहना है कि ठग खासतौर पर बुजुर्गों को टारगेट कर रहे हैं, क्योंकि वे सरकारी अधिकारियों के नाम और वर्दी से जल्दी प्रभावित हो जाते हैं। डिजिटल अरेस्ट का यह तरीका दरअसल मनोवैज्ञानिक दबाव पर आधारित होता है, जिसमें व्यक्ति को इतना डरा दिया जाता है कि वह बिना सोचे-समझे पैसे ट्रांसफर कर दे।
साइबर एक्सपर्ट्स का कहना है कि ऐसी कॉल्स से सतर्क रहना बेहद जरूरी है। भारत में कोई भी जांच एजेंसी व्हाट्सएप वीडियो कॉल के जरिए गिरफ्तारी या पूछताछ नहीं करती। अगर किसी कॉल में इस तरह की धमकी दी जा रही है, तो समझ लेना चाहिए कि मामला संदिग्ध है। साथ ही, ऐसे नंबरों को तुरंत रिपोर्ट करने की सलाह दी जा रही है, ताकि दूसरे लोग भी बच सकें। यह मामला इस बात का उदाहरण बन गया है कि जहां तकनीक ठगी का जरिया बन रही है, वहीं सही इस्तेमाल से वही तकनीक सुरक्षा की ढाल भी बन सकती है।
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Truecaller अलर्ट से नाकाम डिजिटल अरेस्ट ठगी, कानपुर में ₹90 लाख बचाए
कानपुर (उत्तर प्रदेश)
कानपुर के किदवई नगर इलाके में मंगलवार दोपहर एक रिटायर्ड शिक्षक के साथ ऐसी घटना हुई, जिसने एक बार फिर साइबर ठगी के नए तरीके को सामने ला दिया। 67 वर्षीय रामेश्वर दयाल (बदला हुआ नाम) को व्हाट्सएप पर एक वीडियो कॉल आई और कुछ ही मिनटों में हालात ऐसे बने कि वे खुद को “डिजिटल अरेस्ट” में समझने लगे। सामने स्क्रीन पर एक शख्स पुलिस की वर्दी में दिख रहा था, पीछे का सेटअप किसी सरकारी कंट्रोल रूम जैसा लग रहा था। आरोप सीधे तौर पर यह लगाया गया कि उनके आधार कार्ड का इस्तेमाल ड्रग्स की शिपमेंट में हुआ है और उन्हें तुरंत सहयोग करना होगा, वरना गिरफ्तारी तय है। बताया जा रहा है कि कॉल के दौरान लगातार दबाव बनाया गया, फोन काटने से मना किया गया और परिवार को भी कार्रवाई में घसीटने की धमकी दी गई।
धीरे-धीरे मामला उस मोड़ पर पहुंच गया जहां रामेश्वर दयाल अपनी पूरी जमा पूंजी, करीब 90 लाख रुपए, ट्रांसफर करने की तैयारी में थे। सूत्रों के अनुसार, स्कैमर्स उन्हें बैंक डिटेल्स और ट्रांजैक्शन प्रक्रिया समझा रहे थे, माहौल ऐसा बनाया गया कि उन्हें सोचने का मौका ही न मिले। इसी बीच उनके मोबाइल में इंस्टॉल Truecaller ने एक रेड अलर्ट दिखाया। स्क्रीन पर नंबर के साथ साफ लिखा था—“Scammer - Digital Arrest Fraud”। यही एक पल था जिसने पूरा खेल बदल दिया। रामेश्वर दयाल ने बाद में बताया कि उस अलर्ट को देखते ही उन्हें शक हुआ और उन्होंने तुरंत कॉल काट दी। अगर कुछ सेकंड और बीत जाते, तो शायद रकम ट्रांसफर हो चुकी होती।
इस घटना ने यह भी दिखाया कि अब साइबर ठगी के तरीके छोटे शहरों तक तेजी से पहुंच रहे हैं। पहले ऐसे मामले बड़े शहरों तक सीमित थे, लेकिन अब कानपुर, लखनऊ, इंदौर जैसे शहर भी निशाने पर हैं। पुलिस सूत्रों का कहना है कि ठग खासतौर पर बुजुर्गों को टारगेट कर रहे हैं, क्योंकि वे सरकारी अधिकारियों के नाम और वर्दी से जल्दी प्रभावित हो जाते हैं। डिजिटल अरेस्ट का यह तरीका दरअसल मनोवैज्ञानिक दबाव पर आधारित होता है, जिसमें व्यक्ति को इतना डरा दिया जाता है कि वह बिना सोचे-समझे पैसे ट्रांसफर कर दे।
साइबर एक्सपर्ट्स का कहना है कि ऐसी कॉल्स से सतर्क रहना बेहद जरूरी है। भारत में कोई भी जांच एजेंसी व्हाट्सएप वीडियो कॉल के जरिए गिरफ्तारी या पूछताछ नहीं करती। अगर किसी कॉल में इस तरह की धमकी दी जा रही है, तो समझ लेना चाहिए कि मामला संदिग्ध है। साथ ही, ऐसे नंबरों को तुरंत रिपोर्ट करने की सलाह दी जा रही है, ताकि दूसरे लोग भी बच सकें। यह मामला इस बात का उदाहरण बन गया है कि जहां तकनीक ठगी का जरिया बन रही है, वहीं सही इस्तेमाल से वही तकनीक सुरक्षा की ढाल भी बन सकती है।
