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मुकेश खन्ना ने जन गण मन हटाने की मांग की, बयान पर विवाद बढ़ा
बालीवुड न्यूज़
वंदे मातरम को राष्ट्रगान बनाने की बात कही, वहीं मौजूदा राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत को लेकर उनके बयान में कई तथ्यात्मक गलतियां भी सामने आईं
अभिनेता मुकेश खन्ना के एक बयान ने राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत को लेकर नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने ‘जन गण मन’ को हटाकर ‘वंदे मातरम’ को देश का राष्ट्रगान बनाने की मांग की है। खन्ना ने हाल ही में आईएएनएस को दिए इंटरव्यू में कहा कि ‘जन गण मन’ को जल्द से जल्द हटाया जाना चाहिए और उसकी जगह ‘वंदे मातरम’ को लाया जाना चाहिए। उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक और सार्वजनिक चर्चा तक मामला पहुंच गया है। खास बात यह है कि बयान में उन्होंने ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत बनाने की बात कही, जबकि भारत में ‘वंदे मातरम’ पहले से ही राष्ट्रगीत है और ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान है। भारत सरकार के राष्ट्रीय पोर्टल पर भी दोनों की अलग-अलग पहचान दर्ज है।
खन्ना ने अपने बयान में ‘जन गण मन’ को लेकर कई दावे किए। उन्होंने कहा कि यह भारत का मूल राष्ट्रगान नहीं है और इसके बजाय ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान का दर्जा दिया जाना चाहिए। उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर का जिक्र करते हुए यह दावा भी किया कि ‘जन गण मन’ ब्रिटिश शासक के सम्मान में लिखा गया था। इसके अलावा उन्होंने गीत की पंक्ति ‘पंजाब सिंध’ को भी अलग तरह से उच्चारित किया। उनके बयान का एक हिस्सा इसी वजह से चर्चा में है, क्योंकि ‘जन गण मन’ और उसके इतिहास को लेकर लंबे समय से अलग-अलग दावे किए जाते रहे हैं। खन्ना ने यह भी बताया कि वह खुद ‘वंदे मातरम’ रिकॉर्ड कर रहे हैं और इसे आने वाले महीनों में रिलीज करने की तैयारी में हैं।
वहीं, इस पूरे मामले में मौजूदा आधिकारिक स्थिति भी समझना जरूरी है। भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ है, जबकि ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त है। यानी दोनों की संवैधानिक और आधिकारिक पहचान अलग है। हाल में केंद्र सरकार ने भी दोनों को लेकर नए निर्देश जारी किए हैं। गृह मंत्रालय ने 9 जुलाई 2026 को राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और केंद्रीय मंत्रालयों को राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान के गायन या वादन से संबंधित आदेश जारी किया। मंत्रालय की वेबसाइट पर इसे बाकायदा ‘भारत के राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान को गाने या बजाने के संबंध में आदेश’ के तौर पर सूचीबद्ध किया गया है।
नए निर्देशों के मुताबिक जिन औपचारिक कार्यक्रमों में दोनों की प्रस्तुति होनी है, वहां ‘वंदे मातरम’ के बाद ‘जन गण मन’ का क्रम रखा गया है। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ केंद्रीय मंत्रालयों को भी तय नियमों का पालन करने को कहा गया है। गृह मंत्रालय ने दोनों के सही शब्दों और उच्चारण पर भी जोर दिया है और आधिकारिक प्रतियां उपलब्ध कराई हैं। इसका मतलब यह है कि ‘वंदे मातरम’ की भूमिका को लेकर सरकार की ओर से जोर जरूर बढ़ा है, लेकिन इससे ‘जन गण मन’ का राष्ट्रगान का दर्जा बदला नहीं है। दोनों को लेकर सरकारी व्यवस्था फिलहाल अलग-अलग है।
‘वंदे मातरम’ का इतिहास भी काफी पुराना है। इसे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा था और यह उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ से जुड़ा हुआ है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत राष्ट्रीय चेतना और आंदोलन से जुड़े प्रमुख प्रतीकों में शामिल हुआ। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने ‘वंदे मातरम’ गाया था। बाद के वर्षों में भी यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बड़े स्तर पर इस्तेमाल होता रहा। इसी ऐतिहासिक भूमिका के कारण आजाद भारत में इसे राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया। भारत सरकार के राष्ट्रीय पोर्टल पर भी ‘राष्ट्रीय गीत’ और ‘राष्ट्र-गीत’ के लिए अलग-अलग सामग्री उपलब्ध है।
मुकेश खन्ना ने अपने बयान में हाल में केंद्र की ओर से वंदे मातरम को लेकर उठाए गए कदमों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि स्कूलों में वंदे मातरम को लेकर पहल शुरू हो चुकी है और वह इससे खुश हैं। उनका कहना था कि वह इस विषय पर पहले भी अपनी राय रख चुके हैं। दूसरी ओर, गृह मंत्रालय के हालिया आदेश से यह जरूर स्पष्ट है कि सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान के इस्तेमाल को लेकर एक निर्धारित क्रम और नियम मौजूद हैं। मंत्रालय ने राज्यों और केंद्रीय विभागों को यह सुनिश्चित करने को कहा है कि दोनों की प्रस्तुति तय शब्दों और सही उच्चारण के साथ हो। ऐसे में खन्ना की मांग और सरकार की मौजूदा व्यवस्था के बीच फर्क साफ दिखाई देता है।
मुकेश खन्ना ने जन गण मन हटाने की मांग की, बयान पर विवाद बढ़ा
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अभिनेता मुकेश खन्ना के एक बयान ने राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत को लेकर नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने ‘जन गण मन’ को हटाकर ‘वंदे मातरम’ को देश का राष्ट्रगान बनाने की मांग की है। खन्ना ने हाल ही में आईएएनएस को दिए इंटरव्यू में कहा कि ‘जन गण मन’ को जल्द से जल्द हटाया जाना चाहिए और उसकी जगह ‘वंदे मातरम’ को लाया जाना चाहिए। उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक और सार्वजनिक चर्चा तक मामला पहुंच गया है। खास बात यह है कि बयान में उन्होंने ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत बनाने की बात कही, जबकि भारत में ‘वंदे मातरम’ पहले से ही राष्ट्रगीत है और ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान है। भारत सरकार के राष्ट्रीय पोर्टल पर भी दोनों की अलग-अलग पहचान दर्ज है।
खन्ना ने अपने बयान में ‘जन गण मन’ को लेकर कई दावे किए। उन्होंने कहा कि यह भारत का मूल राष्ट्रगान नहीं है और इसके बजाय ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान का दर्जा दिया जाना चाहिए। उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर का जिक्र करते हुए यह दावा भी किया कि ‘जन गण मन’ ब्रिटिश शासक के सम्मान में लिखा गया था। इसके अलावा उन्होंने गीत की पंक्ति ‘पंजाब सिंध’ को भी अलग तरह से उच्चारित किया। उनके बयान का एक हिस्सा इसी वजह से चर्चा में है, क्योंकि ‘जन गण मन’ और उसके इतिहास को लेकर लंबे समय से अलग-अलग दावे किए जाते रहे हैं। खन्ना ने यह भी बताया कि वह खुद ‘वंदे मातरम’ रिकॉर्ड कर रहे हैं और इसे आने वाले महीनों में रिलीज करने की तैयारी में हैं।
वहीं, इस पूरे मामले में मौजूदा आधिकारिक स्थिति भी समझना जरूरी है। भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ है, जबकि ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त है। यानी दोनों की संवैधानिक और आधिकारिक पहचान अलग है। हाल में केंद्र सरकार ने भी दोनों को लेकर नए निर्देश जारी किए हैं। गृह मंत्रालय ने 9 जुलाई 2026 को राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और केंद्रीय मंत्रालयों को राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान के गायन या वादन से संबंधित आदेश जारी किया। मंत्रालय की वेबसाइट पर इसे बाकायदा ‘भारत के राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान को गाने या बजाने के संबंध में आदेश’ के तौर पर सूचीबद्ध किया गया है।
नए निर्देशों के मुताबिक जिन औपचारिक कार्यक्रमों में दोनों की प्रस्तुति होनी है, वहां ‘वंदे मातरम’ के बाद ‘जन गण मन’ का क्रम रखा गया है। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ केंद्रीय मंत्रालयों को भी तय नियमों का पालन करने को कहा गया है। गृह मंत्रालय ने दोनों के सही शब्दों और उच्चारण पर भी जोर दिया है और आधिकारिक प्रतियां उपलब्ध कराई हैं। इसका मतलब यह है कि ‘वंदे मातरम’ की भूमिका को लेकर सरकार की ओर से जोर जरूर बढ़ा है, लेकिन इससे ‘जन गण मन’ का राष्ट्रगान का दर्जा बदला नहीं है। दोनों को लेकर सरकारी व्यवस्था फिलहाल अलग-अलग है।
‘वंदे मातरम’ का इतिहास भी काफी पुराना है। इसे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा था और यह उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ से जुड़ा हुआ है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत राष्ट्रीय चेतना और आंदोलन से जुड़े प्रमुख प्रतीकों में शामिल हुआ। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने ‘वंदे मातरम’ गाया था। बाद के वर्षों में भी यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बड़े स्तर पर इस्तेमाल होता रहा। इसी ऐतिहासिक भूमिका के कारण आजाद भारत में इसे राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया। भारत सरकार के राष्ट्रीय पोर्टल पर भी ‘राष्ट्रीय गीत’ और ‘राष्ट्र-गीत’ के लिए अलग-अलग सामग्री उपलब्ध है।
मुकेश खन्ना ने अपने बयान में हाल में केंद्र की ओर से वंदे मातरम को लेकर उठाए गए कदमों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि स्कूलों में वंदे मातरम को लेकर पहल शुरू हो चुकी है और वह इससे खुश हैं। उनका कहना था कि वह इस विषय पर पहले भी अपनी राय रख चुके हैं। दूसरी ओर, गृह मंत्रालय के हालिया आदेश से यह जरूर स्पष्ट है कि सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान के इस्तेमाल को लेकर एक निर्धारित क्रम और नियम मौजूद हैं। मंत्रालय ने राज्यों और केंद्रीय विभागों को यह सुनिश्चित करने को कहा है कि दोनों की प्रस्तुति तय शब्दों और सही उच्चारण के साथ हो। ऐसे में खन्ना की मांग और सरकार की मौजूदा व्यवस्था के बीच फर्क साफ दिखाई देता है।
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