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लैटिन अमेरिका में ट्रंप की ड्रग्स के खिलाफ मुहिम का नया चरण
अंतराष्ट्रीय न्यूज
समुद्र में संदिग्ध नावों पर हमलों के बाद अब जमीन पर सैन्य कार्रवाई की तैयारी, सहयोगी देशों के साथ मिलकर ऑपरेशन पर जोर
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन लैटिन अमेरिका में ड्रग तस्करी और संगठित अपराध के खिलाफ चलाए जा रहे सैन्य अभियान को अब समुद्र से जमीन तक ले जाने की तैयारी में है। अब तक अमेरिकी सेना की कार्रवाई मुख्य रूप से कैरेबियन और पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में संदिग्ध ड्रग बोट्स को निशाना बनाने तक सीमित रही थी। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, इन अभियानों में 60 से ज्यादा हमले किए जा चुके हैं और 200 से अधिक लोगों की मौत हुई है। अब वॉशिंगटन की कोशिश है कि लैटिन अमेरिकी देशों की सेनाओं के साथ मिलकर उनकी जमीन पर सक्रिय आपराधिक और सशस्त्र समूहों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। इससे अमेरिकी सुरक्षा नीति में बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है, लेकिन इसके साथ ही क्षेत्र के देशों की संप्रभुता और अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को लेकर राजनीतिक सवाल भी उठने लगे हैं।
अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने हाल ही में पनामा में एक सैन्य अभ्यास के दौरान कहा था कि कोलंबिया, इक्वाडोर, ग्वाटेमाला और होंडुरास जैसे देश वॉशिंगटन के साथ आपराधिक संगठनों के खिलाफ काम कर रहे हैं। हालांकि ग्वाटेमाला ने अमेरिकी दावे पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि उसने इस तरह के संयुक्त सैन्य अभियान के लिए कोई सहमति नहीं दी है। इससे साफ है कि अमेरिकी प्रशासन जिस सहयोग की बात कर रहा है, उस पर सभी देशों का नजरिया एक जैसा नहीं है। कुछ सरकारें अमेरिकी खुफिया जानकारी, हथियार और प्रशिक्षण का फायदा उठाना चाहती हैं, लेकिन अपने इलाके में अमेरिकी सैनिकों की प्रत्यक्ष लड़ाकू भूमिका को लेकर ज्यादा सतर्क हैं।
अमेरिका पहले से ही लैटिन अमेरिकी देशों को ड्रग तस्करी से निपटने के लिए सैन्य उपकरण, खुफिया सूचनाएं, प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता देता रहा है। लेकिन अगर अमेरिकी सैनिक स्थानीय सेनाओं के साथ जमीन पर सीधे अभियान में हिस्सा लेते हैं, तो यह पुराने मॉडल से काफी अलग होगा। ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद वॉशिंगटन ने इस दिशा में ज्यादा आक्रामक रुख अपनाया है। प्रशासन ने लैटिन अमेरिका के 20 आपराधिक समूहों को विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित किया है। इसके बाद सैन्य और खुफिया सहयोग बढ़ाने की कोशिश भी तेज हुई है। समुद्र में की गई अमेरिकी कार्रवाई इसी रणनीति का सबसे विवादित हिस्सा बनी हुई है।
संदिग्ध ड्रग नौकाओं पर अमेरिकी हमलों को लेकर भी कई सवाल उठे हैं। वॉशिंगटन का दावा है कि इन नावों का इस्तेमाल मादक पदार्थों की तस्करी के लिए किया जा रहा था और इनमें शामिल लोग कथित ‘नार्को-टेररिस्ट’ संगठनों से जुड़े थे। दूसरी तरफ आलोचकों ने कहा है कि अमेरिकी सरकार ने हर हमले के बारे में पर्याप्त सार्वजनिक सबूत नहीं दिए हैं। मौतों की संख्या और सैन्य कार्रवाई की कानूनी वैधता को लेकर भी सवाल उठे हैं। अब यही विवाद जमीन पर संभावित अभियानों के साथ और बड़ा हो सकता है, क्योंकि शहरों, गांवों और ग्रामीण इलाकों में सक्रिय आपराधिक समूहों के खिलाफ कार्रवाई में आम नागरिकों के प्रभावित होने का खतरा ज्यादा रहता है।
कोलंबिया इस नई रणनीति के लिए खास तौर पर अहम हो सकता है। अमेरिकी रक्षा मंत्री ने दावा किया है कि कोलंबियाई राष्ट्रपति अबेलार्दो दे ला एस्प्रिएला ने सशस्त्र समूहों के खिलाफ अमेरिकी सैन्य सहयोग बढ़ाने की इच्छा जताई है। इनमें नेशनल लिबरेशन आर्मी यानी ELN भी शामिल है। अगर अमेरिकी सेना कोलंबियाई बलों के साथ ऐसे अभियानों में सीधे उतरती है तो यह दोनों देशों के पुराने सुरक्षा सहयोग से एक अलग कदम होगा। अभी तक अमेरिका की भूमिका मुख्य रूप से प्रशिक्षण, हथियार, खुफिया मदद और रणनीतिक समर्थन तक रही है। जमीन पर संयुक्त लड़ाकू अभियान शुरू होने की स्थिति में सैन्य कार्रवाई की जिम्मेदारी और उसके राजनीतिक असर दोनों बढ़ेंगे।
इस रणनीति में सबसे बड़ी चुनौती शायद लैटिन अमेरिकी देशों की संप्रभुता से जुड़ी होगी। इक्वाडोर पहले से अमेरिका के साथ सुरक्षा सहयोग कर रहा है, लेकिन 2025 में वहां हुए जनमत संग्रह में विदेशी सैन्य अड्डे की अनुमति देने का प्रस्ताव मतदाताओं ने खारिज कर दिया था। ग्वाटेमाला में भी राष्ट्रपति बर्नार्डो एरेवालो ने संयुक्त अमेरिकी सैन्य अभियान पर सहमति से इनकार किया है और कहा है कि इस तरह की व्यवस्था के लिए कांग्रेस की मंजूरी जरूरी होगी। मेक्सिको भी लंबे समय से अपने क्षेत्र में अमेरिकी सैनिकों की सीधी कार्रवाई के विचार का विरोध करता रहा है। यानी अमेरिकी मदद स्वीकार करने और अमेरिकी सेना को अपने देश में लड़ने की अनुमति देने के बीच बड़ा राजनीतिक अंतर है।
ड्रग नेटवर्क के खिलाफ सैन्य दबाव बढ़ाने से तत्काल कार्रवाई तो तेज हो सकती है, लेकिन इससे तस्करी और संगठित अपराध पूरी तरह खत्म होंगे, यह तय नहीं है। ऐसे समूह अक्सर सैन्य दबाव के बाद अपनी रणनीति बदलते हैं, ठिकाने बदलते हैं और आबादी वाले इलाकों में छिपने की कोशिश करते हैं। इससे सुरक्षा बलों के सामने नई मुश्किलें पैदा हो सकती हैं और आम लोगों के लिए खतरा भी बढ़ सकता है। लैटिन अमेरिकी सरकारों के सामने भी दोहरी चुनौती है—एक तरफ उन्हें अपराध के खिलाफ सख्त कार्रवाई दिखानी है, दूसरी तरफ अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को लेकर अपने देश में उठने वाले राजनीतिक और राष्ट्रवादी विरोध से निपटना होगा। ट्रंप प्रशासन के लिए यह अभियान केवल ड्रग तस्करी रोकने की कोशिश नहीं है, बल्कि पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी प्रभाव को फिर से मजबूत करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है।
लैटिन अमेरिका में ट्रंप की ड्रग्स के खिलाफ मुहिम का नया चरण
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन लैटिन अमेरिका में ड्रग तस्करी और संगठित अपराध के खिलाफ चलाए जा रहे सैन्य अभियान को अब समुद्र से जमीन तक ले जाने की तैयारी में है। अब तक अमेरिकी सेना की कार्रवाई मुख्य रूप से कैरेबियन और पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में संदिग्ध ड्रग बोट्स को निशाना बनाने तक सीमित रही थी। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, इन अभियानों में 60 से ज्यादा हमले किए जा चुके हैं और 200 से अधिक लोगों की मौत हुई है। अब वॉशिंगटन की कोशिश है कि लैटिन अमेरिकी देशों की सेनाओं के साथ मिलकर उनकी जमीन पर सक्रिय आपराधिक और सशस्त्र समूहों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। इससे अमेरिकी सुरक्षा नीति में बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है, लेकिन इसके साथ ही क्षेत्र के देशों की संप्रभुता और अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को लेकर राजनीतिक सवाल भी उठने लगे हैं।
अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने हाल ही में पनामा में एक सैन्य अभ्यास के दौरान कहा था कि कोलंबिया, इक्वाडोर, ग्वाटेमाला और होंडुरास जैसे देश वॉशिंगटन के साथ आपराधिक संगठनों के खिलाफ काम कर रहे हैं। हालांकि ग्वाटेमाला ने अमेरिकी दावे पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि उसने इस तरह के संयुक्त सैन्य अभियान के लिए कोई सहमति नहीं दी है। इससे साफ है कि अमेरिकी प्रशासन जिस सहयोग की बात कर रहा है, उस पर सभी देशों का नजरिया एक जैसा नहीं है। कुछ सरकारें अमेरिकी खुफिया जानकारी, हथियार और प्रशिक्षण का फायदा उठाना चाहती हैं, लेकिन अपने इलाके में अमेरिकी सैनिकों की प्रत्यक्ष लड़ाकू भूमिका को लेकर ज्यादा सतर्क हैं।
अमेरिका पहले से ही लैटिन अमेरिकी देशों को ड्रग तस्करी से निपटने के लिए सैन्य उपकरण, खुफिया सूचनाएं, प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता देता रहा है। लेकिन अगर अमेरिकी सैनिक स्थानीय सेनाओं के साथ जमीन पर सीधे अभियान में हिस्सा लेते हैं, तो यह पुराने मॉडल से काफी अलग होगा। ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद वॉशिंगटन ने इस दिशा में ज्यादा आक्रामक रुख अपनाया है। प्रशासन ने लैटिन अमेरिका के 20 आपराधिक समूहों को विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित किया है। इसके बाद सैन्य और खुफिया सहयोग बढ़ाने की कोशिश भी तेज हुई है। समुद्र में की गई अमेरिकी कार्रवाई इसी रणनीति का सबसे विवादित हिस्सा बनी हुई है।
संदिग्ध ड्रग नौकाओं पर अमेरिकी हमलों को लेकर भी कई सवाल उठे हैं। वॉशिंगटन का दावा है कि इन नावों का इस्तेमाल मादक पदार्थों की तस्करी के लिए किया जा रहा था और इनमें शामिल लोग कथित ‘नार्को-टेररिस्ट’ संगठनों से जुड़े थे। दूसरी तरफ आलोचकों ने कहा है कि अमेरिकी सरकार ने हर हमले के बारे में पर्याप्त सार्वजनिक सबूत नहीं दिए हैं। मौतों की संख्या और सैन्य कार्रवाई की कानूनी वैधता को लेकर भी सवाल उठे हैं। अब यही विवाद जमीन पर संभावित अभियानों के साथ और बड़ा हो सकता है, क्योंकि शहरों, गांवों और ग्रामीण इलाकों में सक्रिय आपराधिक समूहों के खिलाफ कार्रवाई में आम नागरिकों के प्रभावित होने का खतरा ज्यादा रहता है।
कोलंबिया इस नई रणनीति के लिए खास तौर पर अहम हो सकता है। अमेरिकी रक्षा मंत्री ने दावा किया है कि कोलंबियाई राष्ट्रपति अबेलार्दो दे ला एस्प्रिएला ने सशस्त्र समूहों के खिलाफ अमेरिकी सैन्य सहयोग बढ़ाने की इच्छा जताई है। इनमें नेशनल लिबरेशन आर्मी यानी ELN भी शामिल है। अगर अमेरिकी सेना कोलंबियाई बलों के साथ ऐसे अभियानों में सीधे उतरती है तो यह दोनों देशों के पुराने सुरक्षा सहयोग से एक अलग कदम होगा। अभी तक अमेरिका की भूमिका मुख्य रूप से प्रशिक्षण, हथियार, खुफिया मदद और रणनीतिक समर्थन तक रही है। जमीन पर संयुक्त लड़ाकू अभियान शुरू होने की स्थिति में सैन्य कार्रवाई की जिम्मेदारी और उसके राजनीतिक असर दोनों बढ़ेंगे।
इस रणनीति में सबसे बड़ी चुनौती शायद लैटिन अमेरिकी देशों की संप्रभुता से जुड़ी होगी। इक्वाडोर पहले से अमेरिका के साथ सुरक्षा सहयोग कर रहा है, लेकिन 2025 में वहां हुए जनमत संग्रह में विदेशी सैन्य अड्डे की अनुमति देने का प्रस्ताव मतदाताओं ने खारिज कर दिया था। ग्वाटेमाला में भी राष्ट्रपति बर्नार्डो एरेवालो ने संयुक्त अमेरिकी सैन्य अभियान पर सहमति से इनकार किया है और कहा है कि इस तरह की व्यवस्था के लिए कांग्रेस की मंजूरी जरूरी होगी। मेक्सिको भी लंबे समय से अपने क्षेत्र में अमेरिकी सैनिकों की सीधी कार्रवाई के विचार का विरोध करता रहा है। यानी अमेरिकी मदद स्वीकार करने और अमेरिकी सेना को अपने देश में लड़ने की अनुमति देने के बीच बड़ा राजनीतिक अंतर है।
ड्रग नेटवर्क के खिलाफ सैन्य दबाव बढ़ाने से तत्काल कार्रवाई तो तेज हो सकती है, लेकिन इससे तस्करी और संगठित अपराध पूरी तरह खत्म होंगे, यह तय नहीं है। ऐसे समूह अक्सर सैन्य दबाव के बाद अपनी रणनीति बदलते हैं, ठिकाने बदलते हैं और आबादी वाले इलाकों में छिपने की कोशिश करते हैं। इससे सुरक्षा बलों के सामने नई मुश्किलें पैदा हो सकती हैं और आम लोगों के लिए खतरा भी बढ़ सकता है। लैटिन अमेरिकी सरकारों के सामने भी दोहरी चुनौती है—एक तरफ उन्हें अपराध के खिलाफ सख्त कार्रवाई दिखानी है, दूसरी तरफ अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को लेकर अपने देश में उठने वाले राजनीतिक और राष्ट्रवादी विरोध से निपटना होगा। ट्रंप प्रशासन के लिए यह अभियान केवल ड्रग तस्करी रोकने की कोशिश नहीं है, बल्कि पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी प्रभाव को फिर से मजबूत करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है।
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