सात साल तक किसी ने नहीं अपनाया ‘ब्रीथलेस’, जावेद अख्तर ने बताया कैसे हकीकत बना यह आइडिया

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बड़े गायकों और म्यूजिक कंपनियों ने किया इनकार, शंकर महादेवन की हामी से बदली गाने की किस्मत

बॉलीवुड और इंडिपेंडेंट म्यूजिक की दुनिया में अलग पहचान बनाने वाला सुपरहिट गाना ‘ब्रीथलेस’ एक समय पर सिर्फ एक अधूरा आइडिया बनकर रह गया था। गीतकार जावेद अख्तर ने खुलासा किया है कि इस अनोखे कॉन्सेप्ट को हकीकत बनने में पूरे सात साल लग गए, क्योंकि शुरुआती दौर में किसी भी बड़े गायक, संगीतकार या म्यूजिक कंपनी ने इस गाने पर भरोसा नहीं जताया।

जावेद अख्तर के मुताबिक, ‘ब्रीथलेस’ का विचार उनके दिमाग में बहुत पहले आ गया था, लेकिन जब उन्होंने इसे संगीत की दुनिया के दिग्गजों के सामने रखा, तो लगभग सभी ने इसे गाने योग्य मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि कई प्रसिद्ध शास्त्रीय गायकों और संगीतकारों ने साफ कह दिया कि बिना सांस लिए गाने जैसी रचना को व्यवहारिक रूप देना संभव नहीं है।

वैरायटी इंडिया को दिए इंटरव्यू में जावेद अख्तर ने बताया कि उन्होंने कई कलाकारों से धुनें तक मांगीं, लेकिन जवाब में सिर्फ मुस्कान और तारीफ मिली, कोई ठोस समर्थन नहीं। उनके अनुसार, यह गाना पूरे सात साल तक अटका रहा और इस दौरान उन्होंने लगभग हर संभावित दरवाजा खटखटाया, लेकिन नतीजा शून्य रहा।

हालात तब बदले, जब जावेद अख्तर की मुलाकात शंकर महादेवन से हुई। उन्होंने जब यह आइडिया शंकर को सुनाया, तो शंकर ने बिना झिझक इसे स्वीकार कर लिया। जावेद अख्तर का मानना है कि अगर उस वक्त शंकर महादेवन नहीं मिलते, तो ‘ब्रीथलेस’ शायद कभी बन ही नहीं पाता और वे खुद इस आइडिया को असफल मान लेते।

हालांकि, गाना रिकॉर्ड होने के बाद भी चुनौतियां खत्म नहीं हुईं। शंकर महादेवन ने खुद बताया कि म्यूजिक कंपनी और मार्केटिंग टीम इस गाने को रिलीज करने को लेकर आशंकित थी। उन्हें डर था कि न तो यह गाना समझ में आएगा और न ही दर्शकों को पसंद आएगा। यहां तक कि यह सवाल भी उठाया गया कि इसे गाएगा कौन और यह लोकप्रिय कैसे होगा।

इन तमाम शंकाओं के बावजूद, 15 अक्टूबर 1998 को ‘ब्रीथलेस’ आधिकारिक तौर पर रिलीज हुआ और देखते ही देखते यह चार्टबस्टर बन गया। गाने ने न सिर्फ शंकर महादेवन को देशभर में पहचान दिलाई, बल्कि उन्हें बेस्ट नॉन-फिल्म एल्बम के लिए स्क्रीन अवॉर्ड भी मिला। आज ‘ब्रीथलेस’ भारतीय म्यूजिक इतिहास के सबसे यादगार और प्रयोगधर्मी गानों में गिना जाता है।

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09 Feb 2026 By Nitin Trivedi

सात साल तक किसी ने नहीं अपनाया ‘ब्रीथलेस’, जावेद अख्तर ने बताया कैसे हकीकत बना यह आइडिया

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बॉलीवुड और इंडिपेंडेंट म्यूजिक की दुनिया में अलग पहचान बनाने वाला सुपरहिट गाना ‘ब्रीथलेस’ एक समय पर सिर्फ एक अधूरा आइडिया बनकर रह गया था। गीतकार जावेद अख्तर ने खुलासा किया है कि इस अनोखे कॉन्सेप्ट को हकीकत बनने में पूरे सात साल लग गए, क्योंकि शुरुआती दौर में किसी भी बड़े गायक, संगीतकार या म्यूजिक कंपनी ने इस गाने पर भरोसा नहीं जताया।

जावेद अख्तर के मुताबिक, ‘ब्रीथलेस’ का विचार उनके दिमाग में बहुत पहले आ गया था, लेकिन जब उन्होंने इसे संगीत की दुनिया के दिग्गजों के सामने रखा, तो लगभग सभी ने इसे गाने योग्य मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि कई प्रसिद्ध शास्त्रीय गायकों और संगीतकारों ने साफ कह दिया कि बिना सांस लिए गाने जैसी रचना को व्यवहारिक रूप देना संभव नहीं है।

वैरायटी इंडिया को दिए इंटरव्यू में जावेद अख्तर ने बताया कि उन्होंने कई कलाकारों से धुनें तक मांगीं, लेकिन जवाब में सिर्फ मुस्कान और तारीफ मिली, कोई ठोस समर्थन नहीं। उनके अनुसार, यह गाना पूरे सात साल तक अटका रहा और इस दौरान उन्होंने लगभग हर संभावित दरवाजा खटखटाया, लेकिन नतीजा शून्य रहा।

हालात तब बदले, जब जावेद अख्तर की मुलाकात शंकर महादेवन से हुई। उन्होंने जब यह आइडिया शंकर को सुनाया, तो शंकर ने बिना झिझक इसे स्वीकार कर लिया। जावेद अख्तर का मानना है कि अगर उस वक्त शंकर महादेवन नहीं मिलते, तो ‘ब्रीथलेस’ शायद कभी बन ही नहीं पाता और वे खुद इस आइडिया को असफल मान लेते।

हालांकि, गाना रिकॉर्ड होने के बाद भी चुनौतियां खत्म नहीं हुईं। शंकर महादेवन ने खुद बताया कि म्यूजिक कंपनी और मार्केटिंग टीम इस गाने को रिलीज करने को लेकर आशंकित थी। उन्हें डर था कि न तो यह गाना समझ में आएगा और न ही दर्शकों को पसंद आएगा। यहां तक कि यह सवाल भी उठाया गया कि इसे गाएगा कौन और यह लोकप्रिय कैसे होगा।

इन तमाम शंकाओं के बावजूद, 15 अक्टूबर 1998 को ‘ब्रीथलेस’ आधिकारिक तौर पर रिलीज हुआ और देखते ही देखते यह चार्टबस्टर बन गया। गाने ने न सिर्फ शंकर महादेवन को देशभर में पहचान दिलाई, बल्कि उन्हें बेस्ट नॉन-फिल्म एल्बम के लिए स्क्रीन अवॉर्ड भी मिला। आज ‘ब्रीथलेस’ भारतीय म्यूजिक इतिहास के सबसे यादगार और प्रयोगधर्मी गानों में गिना जाता है।

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