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नंदन नीलेकणि का अनुमान, 7-8 साल में $19 ट्रिलियन होगा टोकनाइज्ड एसेट मार्केट
Digital Desk
नंदन नीलेकणि ने कहा कि टोकनाइज्ड एसेट्स का बाजार अगले सात से आठ वर्षों में 19 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। भारत बड़े पैमाने पर इसे अपनाने के लिए बुनियादी ढांचा तैयार कर रहा है।
Infosys के सह-संस्थापक और पूर्व UIDAI चेयरमैन नंदन नीलेकणि ने कहा है कि अगले सात से आठ वर्षों में वैश्विक स्तर पर करीब 19 ट्रिलियन डॉलर मूल्य की परिसंपत्तियां डिजिटल टोकन के रूप में प्रस्तुत की जा सकती हैं। उन्होंने मुंबई में आयोजित Global Fintech Festival 2026 में टोकनाइजेशन की संभावनाओं पर बात की।
नीलेकणि के मुताबिक टोकनाइजेशन अब केवल एक उभरती वित्तीय तकनीक नहीं रह गई है। रेगुलेटर्स, बैंक और वित्तीय संस्थान इसके विभिन्न इस्तेमाल की संभावनाओं पर काम कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि भारत को केवल अलग-अलग डिजिटल टोकन जारी करने के बजाय ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना होगा, जो इंडस्ट्रियल और पॉपुलेशन स्केल पर टोकनाइज्ड एसेट्स को संभाल सके।
$19 ट्रिलियन तक पहुंच सकता है बाजार
नीलेकणि ने बताया कि वर्तमान में दुनिया भर में करीब 600 अरब डॉलर मूल्य के टोकन मौजूद हैं, जिनमें बड़ी हिस्सेदारी stablecoins की है।
उन्होंने एक अनुमान का हवाला देते हुए कहा कि वित्तीय बाजारों और अन्य परिसंपत्ति वर्गों में टोकनाइजेशन का विस्तार होने पर अगले सात से आठ वर्षों में टोकनाइज्ड एसेट्स का मूल्य 19 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है।
टोकनाइजेशन का अर्थ किसी परिसंपत्ति—जैसे बॉन्ड, शेयर, संपत्ति से जुड़ा दावा या अन्य वित्तीय साधन—को डिजिटल प्रतिनिधित्व में बदलना है, जिसे इलेक्ट्रॉनिक रूप से रखा और ट्रांसफर किया जा सकता है।
हालांकि, 19 ट्रिलियन डॉलर का आंकड़ा एक industry estimate है और इसे निश्चित बाजार पूर्वानुमान नहीं माना जाना चाहिए।
भारत का फोकस बड़े पैमाने के इंफ्रास्ट्रक्चर पर
नीलेकणि ने कहा कि भारत की प्राथमिकता ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना होनी चाहिए जो अलग-अलग तरह की परिसंपत्तियों से जुड़े अरबों लेनदेन को संभाल सके।
उनके अनुसार केवल टोकन जारी करना पर्याप्त नहीं होगा। टोकनाइजेशन को मुख्यधारा में लाने के लिए interoperability, liquidity, security और high transaction capacity जैसी क्षमताएं जरूरी होंगी।
यह दृष्टिकोण भारत के Digital Public Infrastructure के अनुभव से भी जुड़ा है, जहां साझा तकनीकी प्रणालियों को बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के लिए विकसित किया गया है।
तीन टोकनाइजेशन पायलट पर काम
नीलेकणि ने तीन लाइव टोकनाइजेशन पायलट का उल्लेख किया, जो पारंपरिक वित्तीय प्रतिभूतियों से आगे इसके संभावित इस्तेमाल को दिखाते हैं।
पहला पायलट डेयरी एसेट्स पर केंद्रित है। इसमें गाय की पहचान, स्वामित्व और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी को एक डिजिटल टोकन के साथ जोड़ा जा सकता है। इसका इस्तेमाल संभावित रूप से क्रेडिट हासिल करने में मदद के लिए किया जा सकता है।
दूसरे पायलट में warehouse receipts शामिल हैं। इसमें गोदाम में रखी वस्तुओं से जुड़ी जानकारी को डिजिटल रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है, जिससे उधारकर्ता वित्तपोषण हासिल करने के लिए इन परिसंपत्तियों का इस्तेमाल कर सके।
तीसरा पायलट assets securitisation से जुड़ा है। इसका उद्देश्य ऐसा मार्केटप्लेस तैयार करना है जहां टोकनाइज्ड एसेट्स को ट्रांसफर और फाइनेंस किया जा सके।
कॉमन आर्किटेक्चर से आसान होगा विस्तार
नीलेकणि के अनुसार इन तीनों पायलट को एक साझा तकनीकी आर्किटेक्चर के आधार पर तैयार किया जा रहा है, जो अलग-अलग एसेट क्लास और उपयोग के मामलों में काम कर सके।
इसका व्यापक उद्देश्य एक ऐसा खुला सिस्टम तैयार करना है जिसमें परिसंपत्तियों के डिजिटल प्रतिनिधित्व को अलग-अलग प्लेटफॉर्म के बीच स्थानांतरित किया जा सके और लेनदेन के लिए जरूरी जानकारी सुरक्षित रहे।
ऐसी interoperability से संभावित रूप से उधारकर्ताओं और एसेट मालिकों को ज्यादा संख्या में lenders और buyers तक पहुंच मिल सकती है। इससे उन्हें किसी एक संस्था या marketplace पर निर्भर रहने की जरूरत कम हो सकती है।
साइबर सिक्योरिटी और Quantum Safety जरूरी
नीलेकणि ने कहा कि बड़े पैमाने पर टोकनाइजेशन के लिए तैयार किए जाने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर में high transaction capacity के साथ मजबूत cybersecurity भी जरूरी होगी।
उन्होंने quantum safety को भी महत्वपूर्ण बताया। जैसे-जैसे टोकनाइजेशन का इस्तेमाल बढ़ेगा, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों को ध्यान में रखकर तैयार करना होगा।
वित्तीय संस्थान और रेगुलेटर्स डिजिटल एसेट्स को मौजूदा वित्तीय व्यवस्था में शामिल करने की संभावनाएं तलाश रहे हैं। ऐसे में वित्तीय स्थिरता और उपभोक्ता सुरक्षा को बनाए रखना भी अहम होगा।
RBI और SEBI कर रहे टोकनाइज्ड फाइनेंस की टेस्टिंग
भारत में वित्तीय नियामक भी टोकनाइज्ड एसेट्स से जुड़े प्रयोग कर रहे हैं।
Reserve Bank of India (RBI) और Securities and Exchange Board of India (SEBI) ने टोकनाइज्ड कॉरपोरेट बॉन्ड, तेज सेटलमेंट और e-rupee तथा distributed-ledger technology के इस्तेमाल को परखने के लिए “Demat 2.0” pilot शुरू किया है। इसमें depositories, exchanges, banks और NPCI जैसे संस्थान शामिल हैं।
यह पायलट भविष्य के अधिक डिजिटल वित्तीय बाजार के लिए जरूरी तकनीकी और संस्थागत इंफ्रास्ट्रक्चर की व्यावहारिक टेस्टिंग का अवसर देता है।
Finternet विजन को मिल रहा विस्तार
नीलेकणि की टोकनाइजेशन संबंधी सोच उनके व्यापक “Finternet” विजन का हिस्सा है। इसका उद्देश्य एक ऐसे interconnected financial system की कल्पना करना है, जिसमें tokenised assets अलग-अलग नेटवर्क पर ट्रांसफर किए जा सकें और विभिन्न वित्तीय लेनदेन में इस्तेमाल हों।
उनके अनुसार भविष्य में टोकनाइजेशन केवल पारंपरिक वित्तीय साधनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। पशुधन, कृषि उत्पाद, ऋण और invoices जैसी real-world assets को भी डिजिटल रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
AI agents के इस्तेमाल से इस व्यवस्था में ऑटोमेशन की एक और परत जुड़ सकती है, जहां स्वचालित सिस्टम टोकनाइज्ड एसेट्स से जुड़े लेनदेन शुरू कर सकें।
यदि आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर, नियामकीय ढांचा और liquidity विकसित होती है, तो टोकनाइजेशन भविष्य के वित्तीय बाजारों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। भारत के सामने तत्काल चुनौती ऐसे trusted और interoperable systems तैयार करने की है, जो बड़े पैमाने पर इस तकनीक को सुरक्षित रूप से अपनाने में सक्षम हों।
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