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ईरान तनाव से वैश्विक महंगाई घटने की रफ्तार पर खतरा, रेट कट की उम्मीदें कमजोर
Digital Desk
ईरान तनाव के बाद तेल कीमतों में तेजी और बॉन्ड यील्ड बढ़ने से वैश्विक महंगाई घटने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है और ब्याज दरों में कटौती टल सकती है।
तेल की बढ़ती कीमतों, ऊंची बॉन्ड यील्ड और नए भू-राजनीतिक जोखिमों ने वैश्विक महंगाई के अनुमान को जटिल बना दिया है। केंद्रीय बैंकों के सामने अब ब्याज दरों में कटौती टालने की चुनौती बढ़ सकती है|
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में महंगाई कम होने की प्रक्रिया यानी डिसइन्फ्लेशन पर नए दबाव की आशंका पैदा कर दी है। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड के ऊंचे स्तर पर बने रहने से निवेशकों को चिंता है कि दुनिया के प्रमुख केंद्रीय बैंक अपेक्षित ब्याज दर कटौती को आगे टाल सकते हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी सेना ने रविवार को हॉर्मुज जलडमरूमध्य में लारक द्वीप पर दो ईरानी लॉन्चरों को निशाना बनाया। इसके बाद ईरान ने जॉर्डन स्थित दो अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर जवाबी कार्रवाई की। सैन्य तनाव बढ़ने के बाद ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत में तेजी आई, जबकि अमेरिकी WTI भी ऊपर चढ़ा।
यह ऊर्जा झटका ऐसे समय आया है जब निवेशक वैश्विक स्तर पर मौद्रिक नीति में धीरे-धीरे ढील की उम्मीद कर रहे थे। यदि हॉर्मुज जलडमरूमध्य में लंबे समय तक तेल आपूर्ति प्रभावित रहती है, तो केंद्रीय बैंकों के सामने महंगाई और कमजोर आर्थिक वृद्धि के बीच संतुलन बनाना और कठिन हो सकता है।
तेल की कीमतों से बढ़ी चिंता
बाजार की प्रतिक्रिया में कच्चा तेल सबसे महत्वपूर्ण कारक बना हुआ है।
नए सैन्य तनाव के बाद ब्रेंट क्रूड 1 प्रतिशत से अधिक चढ़कर करीब 89 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया। अमेरिकी WTI भी बढ़कर 84 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चला गया।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। संघर्ष शुरू होने से पहले दुनिया के कुल तेल प्रवाह का करीब पांचवां हिस्सा इस समुद्री मार्ग से गुजरता था। सुरक्षा जोखिम बढ़ने के कारण इस रास्ते से वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही में तेज गिरावट आई है।
अगर व्यवधान थोड़े समय तक रहता है तो महंगाई पर असर सीमित रह सकता है। लेकिन लंबे समय तक तेल आपूर्ति घटने पर ईंधन, परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ सकती है।
इससे प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में महंगाई को केंद्रीय बैंकों के लक्ष्य तक वापस लाना मुश्किल हो सकता है।
केंद्रीय बैंकों के सामने दुविधा
तेल की कीमतों में बढ़ोतरी केंद्रीय बैंकों के लिए एक जटिल स्थिति पैदा करती है।
कच्चा तेल सीधे पेट्रोल और परिवहन लागत को प्रभावित करता है। यदि कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो इसका असर विनिर्माण, लॉजिस्टिक्स और सेवाओं की लागत पर भी पड़ सकता है। इससे मूल महंगाई यानी कोर इन्फ्लेशन में गिरावट की रफ्तार धीमी हो सकती है।
ऐसे में जिन केंद्रीय बैंकों ने ब्याज दरों में कटौती की तैयारी शुरू की थी, उन्हें दरों को लंबे समय तक ऊंचा बनाए रखने का दबाव झेलना पड़ सकता है।
अमेरिकी फेडरल रिजर्व के सामने भी महंगाई को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। बाजार में सितंबर में ब्याज दर बढ़ने की संभावना को लेकर उम्मीदें बढ़ी हैं और अमेरिकी ट्रेजरी की छोटी अवधि वाली यील्ड भी ऊपर गई है।
फेड की नीति पर अनिश्चितता
ऊर्जा कीमतों और महंगाई के जोखिम को देखते हुए अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति को लेकर बाजार की धारणा बदल रही है।
रिपोर्ट में उद्धृत आंकड़ों के अनुसार, बाजार सितंबर में ब्याज दर बढ़ने की 57 प्रतिशत संभावना देख रहा था।
जेपी मॉर्गन के मुख्य अमेरिकी अर्थशास्त्री माइकल फेरोली ने कहा कि सितंबर की बैठक अभी भी महत्वपूर्ण बनी हुई है। हालांकि, बैंक दिसंबर में दर बढ़ोतरी की अपनी उम्मीद पर कायम है।
अगर तेल का झटका लंबे समय तक बना रहता है और महंगाई में अपेक्षित गिरावट नहीं आती, तो फेड के सामने मौद्रिक नीति को और सख्त रखने का विकल्प खुला रह सकता है।
अब बाजार का सवाल केवल यह नहीं है कि ब्याज दरों में कटौती कब शुरू होगी, बल्कि यह भी है कि क्या केंद्रीय बैंक दरों को लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनाए रखेंगे।
बॉन्ड यील्ड भी ऊंची
तेल की कीमतों का दबाव ऐसे समय बढ़ा है जब अमेरिकी बॉन्ड बाजार पहले से ही चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है।
दो साल की अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड करीब 4.36 प्रतिशत रही। शुक्रवार को इसमें लगभग 12 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी हुई थी। वहीं 30 साल की ट्रेजरी यील्ड 5.2 प्रतिशत से ऊपर बनी रही।
ऊंची बॉन्ड यील्ड सरकारों, कंपनियों और उपभोक्ताओं के लिए कर्ज की लागत बढ़ाती है। साथ ही, इससे शेयर बाजारों के मूल्यांकन पर भी दबाव पड़ सकता है क्योंकि निवेशक जोखिम वाले परिसंपत्तियों की तुलना सुरक्षित निवेश से करते हैं।
ऊंची ऊर्जा कीमतों और बढ़ती बॉन्ड यील्ड का संयोजन अर्थव्यवस्था के लिए खास तौर पर चुनौतीपूर्ण है। इससे आर्थिक वृद्धि कमजोर पड़ सकती है, जबकि महंगाई ऊंची बनी रह सकती है।
एशियाई बाजारों पर दबाव
नए भू-राजनीतिक तनाव का असर एशियाई शेयर बाजारों पर भी दिखाई दिया।
जापान का निक्केई सूचकांक 2.1 प्रतिशत गिरा, जबकि दक्षिण कोरिया के प्रमुख शेयर सूचकांक में 2.4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई। जापान को छोड़कर एशिया-प्रशांत क्षेत्र के शेयरों का MSCI सूचकांक भी करीब 0.7 प्रतिशत नीचे आया।
निवेशकों ने तेल की संभावित तेजी और दुनिया भर में लंबे समय तक ऊंची ब्याज दरों की आशंका के बीच जोखिम वाले निवेश से दूरी बनाई।
अगर ऊर्जा संकट अमेरिकी डॉलर को और मजबूत करता है या वैश्विक ब्याज दरें ऊंची बनी रहती हैं, तो उभरते बाजारों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
हॉर्मुज पर टिकी नजर
हॉर्मुज जलडमरूमध्य अब वैश्विक आर्थिक परिदृश्य के सबसे महत्वपूर्ण जोखिमों में शामिल हो गया है।
इस मार्ग में लंबे समय तक व्यवधान से कच्चे तेल की उपलब्धता घट सकती है और समुद्री परिवहन तथा बीमा लागत बढ़ सकती है। इसका असर केवल तेल बाजार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि महंगाई, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और औद्योगिक गतिविधियों पर भी पड़ सकता है।
सुरक्षा चिंताओं के कारण शिपिंग कंपनियों ने इस जलमार्ग से अपनी गतिविधियां कम की हैं। सैन्य तनाव जारी रहने के बीच सामान्य समुद्री यातायात कब पूरी तरह बहाल होगा, इसे लेकर अभी अनिश्चितता बनी हुई है।
केंद्रीय बैंकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल तेल की कीमत में शुरुआती उछाल से अधिक यह होगा कि आपूर्ति में व्यवधान कितने समय तक रहता है।
रेट कट पर नई चुनौती
महंगाई में गिरावट के साथ बाजारों को उम्मीद थी कि दुनिया के प्रमुख केंद्रीय बैंक धीरे-धीरे ब्याज दरों में कटौती की ओर बढ़ेंगे। ईरान के साथ बढ़ते तनाव ने इस उम्मीद को जटिल बना दिया है।
अगर तेल की कीमतों में तेजी कुछ समय के लिए रहती है तो इससे वैश्विक डिसइन्फ्लेशन की व्यापक प्रक्रिया पर बड़ा असर नहीं पड़ सकता। लेकिन यदि ऊर्जा कीमतें कई सप्ताह या महीनों तक ऊंची बनी रहती हैं, तो केंद्रीय बैंकों को आर्थिक वृद्धि की तुलना में महंगाई नियंत्रण को प्राथमिकता देनी पड़ सकती है।
इसका मतलब कुछ अर्थव्यवस्थाओं में कम रेट कट, कटौती में देरी या अतिरिक्त ब्याज दर बढ़ोतरी भी हो सकता है।
आने वाले दिनों में अमेरिका के रोजगार और महंगाई से जुड़े आंकड़े बाजार के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे। शुक्रवार को आने वाली अमेरिकी पेरोल रिपोर्ट और 11 सितंबर को जारी होने वाले उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आंकड़ों पर निवेशकों की नजर रहेगी।
इसके साथ ही हॉर्मुज जलडमरूमध्य में सैन्य और समुद्री गतिविधियों पर भी करीबी नजर रखी जाएगी। यदि मौजूदा ऊर्जा झटका अस्थायी साबित होता है तो केंद्रीय बैंकों की दर कटौती की योजनाएं बच सकती हैं। लेकिन लंबे व्यवधान की स्थिति में वैश्विक महंगाई और ब्याज दरों का दौर अपेक्षा से अधिक लंबा खिंच सकता है।
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