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क्या ई-स्पोर्ट्स को मिलना चाहिए पारंपरिक खेलों जैसा सम्मान? गेमिंग अब सिर्फ मनोरंजन नहीं, बन रहा प्रोफेशन
Priyanka Mathur
प्रोफेशनल गेमर्स की ट्रेनिंग, टूर्नामेंट और कमाई ने बदली तस्वीर; लेकिन शारीरिक फिटनेस, स्वास्थ्य और खेल की परिभाषा को लेकर अब भी बहस जारी
ऑनलाइन गेमिंग की दुनिया पिछले कुछ वर्षों में काफी बदल चुकी है। पहले जहां वीडियो गेम को मुख्य रूप से मनोरंजन का साधन माना जाता था, वहीं अब ई-स्पोर्ट्स में खिलाड़ी नियमित अभ्यास, रणनीति, टीमवर्क और प्रतियोगिताओं के जरिए पेशेवर करियर बना रहे हैं। इसी बदलाव के बीच यह सवाल तेजी से चर्चा में है कि क्या ई-स्पोर्ट्स को क्रिकेट, फुटबॉल, बैडमिंटन और दूसरे पारंपरिक खेलों की तरह ही पेशेवर सम्मान और पहचान मिलनी चाहिए। ई-स्पोर्ट्स में खिलाड़ी किसी वीडियो गेम को सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं खेलते। प्रतियोगी स्तर पर एक टीम या खिलाड़ी को रणनीति बनाने, विरोधी की चाल समझने, बेहद कम समय में निर्णय लेने और लगातार अभ्यास करने की जरूरत होती है। बड़े टूर्नामेंटों में खिलाड़ियों के साथ कोच, विश्लेषक और सपोर्ट स्टाफ भी काम करते हैं।
गेमिंग से प्रोफेशन तक पहुंचा सफर
पेशेवर गेमिंग में सफलता के लिए केवल अच्छा खिलाड़ी होना पर्याप्त नहीं है। खिलाड़ियों को लंबे अभ्यास सत्र, टीम के साथ तालमेल, मानसिक दबाव को संभालने और प्रतियोगिता के दौरान तेजी से निर्णय लेने की क्षमता विकसित करनी पड़ती है। कई ई-स्पोर्ट्स टीमें खिलाड़ियों के लिए नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम बनाती हैं। प्रतियोगिताओं की तैयारी में गेमप्ले का विश्लेषण, विरोधी टीम की रणनीति का अध्ययन और टीम के भीतर भूमिकाओं का अभ्यास शामिल होता है। इस लिहाज से इसकी संरचना कई दूसरे प्रतिस्पर्धी खेलों से मिलती-जुलती दिखाई देती है।
क्या ई-स्पोर्ट्स को खेल माना जा सकता है?
यही इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। पारंपरिक खेलों में शारीरिक गतिविधि केंद्रीय भूमिका निभाती है, जबकि ई-स्पोर्ट्स में खिलाड़ी का प्रदर्शन मुख्य रूप से कंप्यूटर, कंसोल या मोबाइल पर होता है। हाथों की गति, आंखों और हाथ के बीच तालमेल, प्रतिक्रिया समय और मानसिक एकाग्रता यहां महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन इसमें क्रिकेट या फुटबॉल जैसी शारीरिक गतिविधि नहीं होती। इसी वजह से कुछ लोग ई-स्पोर्ट्स को पारंपरिक खेलों की श्रेणी में रखने से अलग राय रखते हैं। उनका तर्क है कि प्रतिस्पर्धा और कौशल होना जरूरी है, लेकिन किसी गतिविधि को खेल कहने के लिए शारीरिक प्रदर्शन भी महत्वपूर्ण होना चाहिए।
दूसरी ओर, ई-स्पोर्ट्स के समर्थकों का कहना है कि खेल की पहचान केवल शारीरिक मेहनत से नहीं होनी चाहिए। रणनीति, अभ्यास, प्रतिस्पर्धा, टीमवर्क और दबाव में प्रदर्शन जैसी खूबियां ई-स्पोर्ट्स में भी मौजूद हैं। उनके मुताबिक यही विशेषताएं इसे एक पेशेवर प्रतिस्पर्धी गतिविधि बनाती हैं।
कमाई और करियर ने बदली सोच
ई-स्पोर्ट्स के बढ़ते बाजार ने गेमिंग को करियर विकल्प के तौर पर देखने की सोच को भी बदला है। पेशेवर खिलाड़ी टूर्नामेंट पुरस्कार, टीम कॉन्ट्रैक्ट, प्रायोजन और कंटेंट से जुड़े अवसरों के जरिए कमाई कर सकते हैं। इसके साथ गेमिंग उद्योग में कोच, कमेंटेटर, टूर्नामेंट आयोजक, गेम एनालिस्ट, स्ट्रीमर और कंटेंट क्रिएटर जैसे दूसरे करियर विकल्प भी विकसित हुए हैं। यानी गेमिंग का पेशेवर इकोसिस्टम केवल खिलाड़ी तक सीमित नहीं है।
भारत में भी बढ़ रहा गेमिंग कल्चर
भारत में स्मार्टफोन और इंटरनेट की पहुंच बढ़ने के साथ ऑनलाइन गेमिंग का आधार काफी बड़ा हुआ है। युवा वर्ग में प्रतिस्पर्धी गेमिंग और गेम-स्ट्रीमिंग को लेकर रुचि बढ़ी है। इससे गेमिंग समुदाय के साथ-साथ ई-स्पोर्ट्स प्रतियोगिताओं और उससे जुड़े डिजिटल कंटेंट का भी विस्तार हुआ है। हालांकि भारत में ई-स्पोर्ट्स को लेकर एक बड़ी चुनौती अभी भी गेमिंग और ई-स्पोर्ट्स के बीच अंतर को समझना है। हर व्यक्ति जो ऑनलाइन गेम खेलता है, पेशेवर ई-स्पोर्ट्स खिलाड़ी नहीं होता। सामान्य गेमिंग मनोरंजन हो सकता है, जबकि ई-स्पोर्ट्स संगठित और प्रतिस्पर्धी स्तर पर खेला जाने वाला गेमिंग है।
स्वास्थ्य और अनुशासन भी जरूरी
ई-स्पोर्ट्स को पेशेवर पहचान देने की चर्चा के साथ स्वास्थ्य का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। लंबे समय तक स्क्रीन के सामने बैठना, कम शारीरिक गतिविधि और अनियमित नींद खिलाड़ियों के लिए चुनौती बन सकते हैं। इसीलिए प्रोफेशनल गेमिंग में फिटनेस, नींद, आंखों की देखभाल, सही पोस्चर और मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अगर ई-स्पोर्ट्स को दूसरे पेशेवर खेलों के बराबर खड़ा करना है तो खिलाड़ियों की ट्रेनिंग में इन पहलुओं को भी पर्याप्त महत्व देना होगा।
सिर्फ सम्मान नहीं, जिम्मेदारी भी
ई-स्पोर्ट्स को पारंपरिक खेलों जैसा सम्मान देने का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े हर व्यवहार को प्रोत्साहित किया जाए। प्रतिस्पर्धी गेमिंग और अनियंत्रित गेमिंग के बीच स्पष्ट अंतर जरूरी है। कम उम्र के खिलाड़ियों के लिए स्क्रीन टाइम, पढ़ाई, नींद और शारीरिक गतिविधि का संतुलन भी महत्वपूर्ण है। परिवार और संस्थानों की भूमिका यह सुनिश्चित करने में हो सकती है कि गेमिंग करियर की तैयारी स्वस्थ और अनुशासित तरीके से हो।
तो क्या ई-स्पोर्ट्स को बराबर पहचान मिलनी चाहिए?
ई-स्पोर्ट्स में प्रतिस्पर्धा, कौशल, रणनीति, अभ्यास और पेशेवर ढांचा मौजूद है। इसलिए इसे केवल समय बिताने वाली गतिविधि मानना अब इसकी पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। दूसरी तरफ, पारंपरिक खेलों से इसकी प्रकृति अलग है और इसे उसी कसौटी पर परखना भी जरूरी नहीं। बेहतर तरीका यह हो सकता है कि ई-स्पोर्ट्स को उसकी अपनी विशेषताओं के आधार पर पेशेवर प्रतिस्पर्धी गतिविधि के रूप में पहचान मिले। खिलाड़ियों की मेहनत और उपलब्धियों को सम्मान दिया जाए, लेकिन साथ ही स्वास्थ्य, अनुशासन और जिम्मेदार गेमिंग को भी उतनी ही प्राथमिकता दी जाए।
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