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ट्रम्प ने ड्रोन आयात पर 100% तक टैरिफ लगाया, चीन पर असर
Digital Desk
राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर फैसला, छोटे ड्रोन पर 25% और संवेदनशील ड्रोन व पुर्जों पर 100% शुल्क
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने विदेशी ड्रोन और उनसे जुड़े उपकरणों के आयात पर बड़ा शुल्क लगाने का फैसला किया है। नई नीति के तहत कुछ खास श्रेणी के ड्रोन और उनके संवेदनशील कंपोनेंट्स पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जाएगा, जबकि कम जोखिम वाले छोटे ड्रोन पर 25 प्रतिशत शुल्क रहेगा। अमेरिकी प्रशासन ने इस कदम के पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेशी सप्लाई चेन पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता को वजह बताया है। खासकर चीन से आने वाली ड्रोन तकनीक को लेकर अमेरिका लंबे समय से चिंता जताता रहा है। ट्रम्प प्रशासन का कहना है कि देश में ड्रोन निर्माण क्षमता को बढ़ाना जरूरी है, ताकि सैन्य और आर्थिक जरूरतों के समय विदेशी सप्लायरों पर निर्भरता कम की जा सके। नई व्यवस्था के तहत 25 किलोग्राम से अधिक वजन वाले ड्रोन या थर्मल इमेजिंग जैसी संवेदनशील क्षमता रखने वाले ड्रोन 100 प्रतिशत टैरिफ के दायरे में आएंगे। दूसरी तरफ 25 किलोग्राम या उससे कम वजन वाले ड्रोन पर 25 प्रतिशत शुल्क लगाया जाएगा। ड्रोन के साथ कुछ संबंधित कंपोनेंट्स और उपकरण भी नई टैरिफ नीति के दायरे में रखे गए हैं। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक मौजूदा घरेलू उत्पादन क्षमता राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। ऐसे में सरकार चाहती है कि कंपनियां अमेरिका में ही उत्पादन बढ़ाने के लिए निवेश करें।
नई टैरिफ व्यवस्था का असर सिर्फ चीन पर ही नहीं पड़ेगा। अमेरिका के कुछ सहयोगी देशों से आने वाले ड्रोन और उनके कंपोनेंट्स के लिए अलग दर तय की गई है। यूरोपीय संघ, जापान, लिकटेंस्टीन, दक्षिण कोरिया, स्विट्जरलैंड और ताइवान से आने वाले संबंधित उत्पादों पर 15 प्रतिशत टैरिफ लगाया जाएगा। वहीं ब्रिटेन से आने वाले ड्रोन पर 10 प्रतिशत शुल्क रखा गया है, हालांकि इसके लिए उत्पाद की हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर और तकनीकी उत्पत्ति से जुड़ी शर्तें भी हैं। नई व्यवस्था पूरी तरह एक साथ लागू नहीं होगी। संवेदनशील श्रेणी के ज्यादातर टैरिफ राष्ट्रपति के आदेश पर हस्ताक्षर होने के 21 दिन बाद प्रभावी होंगे। कम संवेदनशील कंपोनेंट्स के लिए 180 दिन की समय-सीमा रखी गई है। कुछ ऐसे उत्पाद जिन्हें अमेरिकी रक्षा विभाग की मंजूरी या निर्धारित छूट हासिल है, उनके लिए भी अलग प्रावधान किया गया है। अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि ड्रोन अब सिर्फ कैमरा उड़ाने या सामान पहुंचाने वाले उपकरण नहीं रह गए हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध में इनके बड़े पैमाने पर इस्तेमाल ने यह दिखाया है कि निगरानी, लक्ष्य की पहचान और सैन्य अभियानों में ड्रोन की भूमिका कितनी अहम हो चुकी है। इसी वजह से वॉशिंगटन ड्रोन तकनीक को सप्लाई चेन और सुरक्षा नीति का हिस्सा मानकर आगे बढ़ रहा है।
इस फैसले से चीनी ड्रोन कंपनियों पर दबाव और बढ़ने की संभावना है। चीन की कंपनियों का अमेरिकी कमर्शियल ड्रोन बाजार में लंबे समय से मजबूत प्रभाव रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, चीनी कंपनी DJI की अमेरिकी कमर्शियल ड्रोन मार्केट में हिस्सेदारी पिछले साल तक करीब 70 प्रतिशत थी। इसी वजह से अमेरिकी नीति में बदलाव का सबसे सीधा असर चीनी निर्माताओं और उनसे जुड़े सप्लायर्स पर पड़ सकता है। पिछले साल अमेरिकी फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन यानी FCC ने भी कुछ विदेशी ड्रोन तकनीकों को लेकर सख्त कदम उठाए थे। अब नए टैरिफ के जरिए प्रशासन घरेलू निर्माण को बढ़ावा देने के साथ चीन पर तकनीकी निर्भरता घटाने की कोशिश कर रहा है।
यह फैसला अमेरिका और चीन के बीच चल रही टेक्नोलॉजी प्रतिस्पर्धा के बीच आया है। चीन ने भी हाल के महीनों में ड्रोन और संबंधित तकनीक के निर्यात को लेकर अपने नियम कड़े किए हैं। ऐसे में ड्रोन उद्योग की सप्लाई चेन पर दोनों देशों की नीतियों का असर पड़ रहा है। कारोबार से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी खरीदारों को अब घरेलू या सहयोगी देशों के निर्माताओं की ओर जाना पड़ सकता है। इससे सप्लाई के विकल्प बढ़ सकते हैं, लेकिन कीमतों पर दबाव भी आ सकता है। अमेरिका की नई नीति में घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए निवेश को प्रोत्साहित करने की व्यवस्था भी शामिल है। ट्रम्प प्रशासन का यह कदम ऐसे समय आया है जब वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच तकनीक, व्यापार और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर तनाव बना हुआ है।
ट्रम्प ने ड्रोन आयात पर 100% तक टैरिफ लगाया, चीन पर असर
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने विदेशी ड्रोन और उनसे जुड़े उपकरणों के आयात पर बड़ा शुल्क लगाने का फैसला किया है। नई नीति के तहत कुछ खास श्रेणी के ड्रोन और उनके संवेदनशील कंपोनेंट्स पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जाएगा, जबकि कम जोखिम वाले छोटे ड्रोन पर 25 प्रतिशत शुल्क रहेगा। अमेरिकी प्रशासन ने इस कदम के पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेशी सप्लाई चेन पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता को वजह बताया है। खासकर चीन से आने वाली ड्रोन तकनीक को लेकर अमेरिका लंबे समय से चिंता जताता रहा है। ट्रम्प प्रशासन का कहना है कि देश में ड्रोन निर्माण क्षमता को बढ़ाना जरूरी है, ताकि सैन्य और आर्थिक जरूरतों के समय विदेशी सप्लायरों पर निर्भरता कम की जा सके। नई व्यवस्था के तहत 25 किलोग्राम से अधिक वजन वाले ड्रोन या थर्मल इमेजिंग जैसी संवेदनशील क्षमता रखने वाले ड्रोन 100 प्रतिशत टैरिफ के दायरे में आएंगे। दूसरी तरफ 25 किलोग्राम या उससे कम वजन वाले ड्रोन पर 25 प्रतिशत शुल्क लगाया जाएगा। ड्रोन के साथ कुछ संबंधित कंपोनेंट्स और उपकरण भी नई टैरिफ नीति के दायरे में रखे गए हैं। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक मौजूदा घरेलू उत्पादन क्षमता राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। ऐसे में सरकार चाहती है कि कंपनियां अमेरिका में ही उत्पादन बढ़ाने के लिए निवेश करें।
नई टैरिफ व्यवस्था का असर सिर्फ चीन पर ही नहीं पड़ेगा। अमेरिका के कुछ सहयोगी देशों से आने वाले ड्रोन और उनके कंपोनेंट्स के लिए अलग दर तय की गई है। यूरोपीय संघ, जापान, लिकटेंस्टीन, दक्षिण कोरिया, स्विट्जरलैंड और ताइवान से आने वाले संबंधित उत्पादों पर 15 प्रतिशत टैरिफ लगाया जाएगा। वहीं ब्रिटेन से आने वाले ड्रोन पर 10 प्रतिशत शुल्क रखा गया है, हालांकि इसके लिए उत्पाद की हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर और तकनीकी उत्पत्ति से जुड़ी शर्तें भी हैं। नई व्यवस्था पूरी तरह एक साथ लागू नहीं होगी। संवेदनशील श्रेणी के ज्यादातर टैरिफ राष्ट्रपति के आदेश पर हस्ताक्षर होने के 21 दिन बाद प्रभावी होंगे। कम संवेदनशील कंपोनेंट्स के लिए 180 दिन की समय-सीमा रखी गई है। कुछ ऐसे उत्पाद जिन्हें अमेरिकी रक्षा विभाग की मंजूरी या निर्धारित छूट हासिल है, उनके लिए भी अलग प्रावधान किया गया है। अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि ड्रोन अब सिर्फ कैमरा उड़ाने या सामान पहुंचाने वाले उपकरण नहीं रह गए हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध में इनके बड़े पैमाने पर इस्तेमाल ने यह दिखाया है कि निगरानी, लक्ष्य की पहचान और सैन्य अभियानों में ड्रोन की भूमिका कितनी अहम हो चुकी है। इसी वजह से वॉशिंगटन ड्रोन तकनीक को सप्लाई चेन और सुरक्षा नीति का हिस्सा मानकर आगे बढ़ रहा है।
इस फैसले से चीनी ड्रोन कंपनियों पर दबाव और बढ़ने की संभावना है। चीन की कंपनियों का अमेरिकी कमर्शियल ड्रोन बाजार में लंबे समय से मजबूत प्रभाव रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, चीनी कंपनी DJI की अमेरिकी कमर्शियल ड्रोन मार्केट में हिस्सेदारी पिछले साल तक करीब 70 प्रतिशत थी। इसी वजह से अमेरिकी नीति में बदलाव का सबसे सीधा असर चीनी निर्माताओं और उनसे जुड़े सप्लायर्स पर पड़ सकता है। पिछले साल अमेरिकी फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन यानी FCC ने भी कुछ विदेशी ड्रोन तकनीकों को लेकर सख्त कदम उठाए थे। अब नए टैरिफ के जरिए प्रशासन घरेलू निर्माण को बढ़ावा देने के साथ चीन पर तकनीकी निर्भरता घटाने की कोशिश कर रहा है।
यह फैसला अमेरिका और चीन के बीच चल रही टेक्नोलॉजी प्रतिस्पर्धा के बीच आया है। चीन ने भी हाल के महीनों में ड्रोन और संबंधित तकनीक के निर्यात को लेकर अपने नियम कड़े किए हैं। ऐसे में ड्रोन उद्योग की सप्लाई चेन पर दोनों देशों की नीतियों का असर पड़ रहा है। कारोबार से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी खरीदारों को अब घरेलू या सहयोगी देशों के निर्माताओं की ओर जाना पड़ सकता है। इससे सप्लाई के विकल्प बढ़ सकते हैं, लेकिन कीमतों पर दबाव भी आ सकता है। अमेरिका की नई नीति में घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए निवेश को प्रोत्साहित करने की व्यवस्था भी शामिल है। ट्रम्प प्रशासन का यह कदम ऐसे समय आया है जब वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच तकनीक, व्यापार और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर तनाव बना हुआ है।
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